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बड़ी खबर: हिमाचल में अब नहीं काटे जाएंगे सेब के बगीचे

Tue, 28 Jul 2015 08:37 AM IST
Updated Tue, 28 Jul 2015 08:37 AM IST
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high court decision on apple tree cutting.

हिमाचल में सरकारी भूमि पर अवैध रूप से लगाए गए सेब के बगीचे फिलहाल नहीं कटेंगे। प्रदेश हाईकोर्ट ने सेब के पेड़ों के तत्काल कटान पर राहत दे दी है, लेकिन अतिक्रमण कर लगाए सेब के पेड़ सरकार के हवाले कर दिए हैं।

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हाईकोर्ट ने सोमवार को इस मामले की सुनवाई कर सरकार को अवैध रूप से लगाए पेड़ों से खुद फल तुड़ान करने के आदेश दिए हैं। फल तोड़ने के बाद आगामी कार्रवाई होगी। प्रदेश सरकार के आवेदन पर पिछले आदेशों को संशोधित करने से हाईकोर्ट ने साफ इंकार कर दिया है।
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अदालत ने मुख्य सचिव और प्रधान सचिव वन को आदेश दिए हैं कि सरकार सेब को तोड़कर बेचे और इसकी आमदनी से सिर्फ जंगली फलदार पौधे लगाए जाएं। सेब तुड़ान के बाद इन पौधों की कांट छांट की जाए।

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सरकार को दिए ये आदेश

high court decision on apple tree cutting.

कोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिए हैं कि वे फसल को हटाने के बाद तुरंत जंगली पौधे लगाए और कांटेदार तारों से बाड़ लगाया जाए, ताकि भविष्य में अवैध कब्जे न किए जा सकें। कोर्ट ने उन सभी लोगों की जानकारी भी तलब की है, जिन्होंने सरकारी भूमि पर कब्जा किया है।

मुख्य सचिव, प्रधान सचिव वन और डीजीपी की इस मामले पर अदालत की ओर से समय-समय पर दिए गए आदेशों की पालना करने के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेवारी तय की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि आदेशों की अनुपालना में बरती गई लापरवाही को गंभीरता से लिया जाएगा।

अफसरों को भी लगाई लताड़

high court decision on apple tree cutting.

मुख्य न्यायाधीश मंसूर अहमद मीर और न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान की खंडपीठ ने सरकार के अधिकारियों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि वे अवैध कब्जाधारियों को सरकारी भूमि पर सेब के पौधे लगाते समय आंखें मूंद कर बैठे रहे। अब ये पौधे फल देने लायक हो गए हैं। अदालत ने कहा कि सरकार वास्तव में अदालत के पिछले आदेशों में संशोधन नहीं चाहती बल्कि अवैध कब्जाधारियों की फसल और फलों को बचाना चाहती है।

सरकार ने संशोधन की उठाई थी मांग

सरकारी भूमि पर कब्जा कर अवैध रूप से लगाए गए सेब के बगीचों को काटने के हाईकोर्ट के पिछले आदेशों में संशोधन के लिए प्रदेश सरकार ने आवेदन दायर किया था। हाईकोर्ट ने मामले में संज्ञान लिया था।

यह था मामला

high court decision on apple tree cutting.

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिए थे कि छह महीनों के भीतर सरकारी भूमि पर से सभी अवैध कब्जों को हटाया जाए। अवैध निर्माण पर बिजली और पानी के कनेक्शन तुरंत प्रभाव से काटने को कहा था। बिजली बोर्ड ने अदालत को बताया कि अतिक्रमणकारियों की बिजली काटी जा रही है। वन विभाग की ओर से बताया गया कि सरकारी भूमि पर लगाए पौधों को काटकर कब्जा छुड़वा लिया गया है।

इस कड़ी में वन विभाग के कर्मचारी इन दिनों एक के बाद एक सरकारी जमीन पर लगे बगीचों को भी काट रहे थे। इसका कई संस्‍थाओं ने विरोध किया था। राजनीतिक दलों ने भी इस कार्रवाई का विरोध किया था। तर्क दिया गया था कि पेड़ काटने की बजाए सरकार इनके फलों को तोड़कर बेचे।

और यहां मार्केट में उतारा अधपका सेब

high court decision on apple tree cutting.

वन भूमि पर सेब के पेड़ों के कटान के बीच मंडियों में अधपकी फसल उतार दी गई है। इन्हीं आधे पके और कम आकार के फलों ने मार्केट में सेब के रेट गिराने शुरू कर दिए हैं। अधिक पेड़ कटान होने से मंडियों में सेब की फसल का फ्लड आ गया है।

इससे मार्केट में सेब की फसल की औने-पौने भाव में बोलियां लग रही हैं। अच्छी पकी और सही आकार की फसल को भी इससे अच्छे रेट नहीं मिल पा रहे हैं। इससे कमीशन एजेंटों और लदानियों (खरीदारों) को भी कम रेट देने का अच्छा बहाना मिल गया है।

बागबानों के कब्जे की अवैध वन भूमि पर इन दिनों सेब के पेड़ों का खूब कटान चल रहा है। सेब के हजारों फलदार पेड़ों को काट डाला गया है। ऐसे में इस कटान से अब तक बचे अवैध कब्जे वाले बागबानों ने आधे पके और छोटे आकार के फलों को ही मंडियों में उतार दिया है।

ये है ताजा रेट

high court decision on apple tree cutting.

यह फसल प्रदेश की लोकल मंडियों सहित राज्य से बाहर चंडीगढ़, दिल्ली आदि तक भेजी जा रही है। रोजाना लगभग एक से डेढ़ लाख पेटियां (कार्टन) प्रदेश और बाहरी राज्यों की मंडियों में जा रहे हैं। अच्छे लाल रंग और सही आकार वाला सेब खासकर स्पर तो 1800 से 2200 रुपये प्रति कार्टन तक भी बिक रहा है।

रॉयल किस्म के रेट इससे भी कम हैं, जबकि रेड गोल्डन, टाइडमैन जैसे सेब की अन्य किस्में 700-800 रुपये तक ही बिक पा रही हैं। हिमाचल कृषि उत्पाद विपणन बोर्ड के प्रबंध निदेशक डा. एचएस बवेजा ने कहा है कि वीकली रिपोर्ट ही बोर्ड को मिलती है। मंडियों में कितना सेब आ रहा है? इस बारे में आगामी दिनों में ही कुछ कहा जा सकता है।

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