अवैध कब्जे रेगुलर कराने के मामले की सुनवाई टली, ये है सरकार का प्रस्ताव
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हाईकोर्ट में राज्य सरकार द्वारा सरकारी और वन भूमि पर अवैध कब्जा करने वालों को राहत देने के लिए बनाए गए प्रारूप नियमों के प्रकाशन की इजाजत मांगने के लिए दायर आवेदन पर सुनवाई 21 मार्च तक टल गई है।
मुख्य न्यायाधीश मंसूर अहमद मीर और न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान की खंडपीठ ने सरकार के इस आवेदन पर संबंधित पक्षकारों को एक सप्ताह के भीतर आपत्तियां दर्ज करने के आदेश जारी किए।
सरकार ने इस आवेदन के माध्यम से कोर्ट को बताया कि वह विधानसभा के संकल्प स्वरूप सरकारी और वन भूमि पर 5 बीघा भूमि तक के अतिक्रमण को मानवीय आधार पर मालिकाना हक में तब्दील करना चाहती है।
सरकार ने इस आवेदन के साथ भू राजस्व अधिनियम के तहत बनाए गए उन प्रारूप नियमों की प्रति भी पेश की जिसके तहत अतिक्रमणकारियों को राहत देने के नियम बनाए गए हैं। सरकार ने छोटे, गरीब और भूमिहीन किसानों द्वारा किए गए अवैध अतिक्रमण को मालिकाना हक में तबदील करने के लिए इन प्रारूप नियमों को राजपत्र में प्रकाशित करने की इजाजत मांगी है।
यह है सरकार के प्रस्ताव का प्रारूप
सरकार का कहना है कि इन प्रारूप नियमों का राजपत्र में प्रकाशन जरूरी है ताकि इन्हें अंतिम रूप देने से पहले संबंधित लोगों अथवा संस्थाओं से आपत्तियां आमंत्रित की जा सके। पिछले दिनों हुई सुनवाई के दौरान सरकार ने कोर्ट को बताया था कि विधानसभा ने छोटे व गरीब किसानों को राहत देने के लिए 28 अगस्त 2015 को एक संकल्प पारित किया था जिस पर अमल के लिए सरकार ने भू राजस्व अधिनियम के तहत प्रारूप नियम बनाए हैं।
यह है सरकार के प्रस्ताव का प्रारूप
सरकार की ओर से पेश प्रारूप के अनुसार शहरों में 2 बिस्वा तक कब्जाई गई भूमि व ग्रामीण इलाकों में अधिकतम 5 बीघा तक कब्जाई गई भूमि का मालिकाना हक दिए जाने का प्रस्ताव है। यह मालिकाना हक एसडीएम अथवा सहायक सेटलमेंट अधिकारी द्वारा दिया जाएगा। यह मालिकाना हक 28 अगस्त 2015 से पहले के पात्र कब्जाधारियों को दिया जाना है।
प्रारूप के अनुसार ग्रामीण इलाकों के कब्जाधारियों की कुल भूमि अवैध कब्जा मिलाकर 10 बीघा से अधिक नहीं होनी चाहिए। सरकार ने प्रारूप में 2 बीघा भूमि तक की भूमि के लिए 5000 रुपये प्रति बीघा व 2 से 5 बीघा तक की भूमि के लिए 10000 रुपये प्रति बीघा कीमत का निर्धारण भी किया है।