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बिलासपुर में दूसरी जगह बनेंगे आधा दर्जन जलमग्न मंदिर, मिलेगा हेरिटेज साइट का दर्जा

Sat, 29 Jun 2019 10:12 PM IST
Krishan Singh न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बिलासपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बिलासपुर Published by: Krishan Singh Updated Sat, 29 Jun 2019 10:12 PM IST
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Half a dozen submerged temples will be built in other place in Bilaspur
- फोटो : अमर उजाला

कहलूर रियासत के समय बने आधा दर्जन पौराणिक मंदिरों को दूसरी जगह बनाने की कवायद जल्द शुरू होगी। दशकों से गोबिंदसागर झील में जलमग्न शताब्दी पुराने मंदिर रंगनाथ, खुनमुखेश्वर, ठाकुरद्वारा, मुरली मनोहर, गोपाल मंदिर और हनुमान मंदिर को दनोह के पास तीस बीघा जमीन पर स्थानांतरित किया जाएगा। इन मंदिरों में लगे पत्थरों की जांच और गणना भी की जाएगी।

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यह पता लगाया जाएगा कि इस प्रकार का पत्थर भारत में और किस स्थान पर उपलब्ध है। दावा किया जा रहा है कि पौराणिक मंदिरों को स्थानांतरित करने की कवायद पूरे उत्तर भारत में पहली बार बिलासपुर जिला से शुरू हो रही है। ऐसा होने पर बिलासपुर सिटी को हेरिटेज साइट का भी दर्जा दिया जाएगा। भाषा एवं संस्कृति विभाग की यह कवायद पर्यटन की दृष्टि से हिमाचल को विकसित करने के लिए है।
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शनिवार को पहुंचे इंडियन ट्रस्ट फॉर रूरल हेरिटेज डेवलपमेंट टीम के इंजीनियर इंद्र सिंह ने बताया कि मंदिरों के स्थानांतरित होने से पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। जो पर्यटक मनाली जाने के लिए वाया बिलासपुर सफर करेगा, वह एक दिन यहां पर रुककर इन मंदिरों को जरूर देखेगा। इससे बिलासपुर जिला को पर्यटन की दृष्टि से एक अलग पहचान मिलेगी और लोगों के लिए व्यापार के साधन खुलेंगे। 

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आईटीआरएचडी की टीम ने जांचीं मंदिरों पर बनीं कलाकृतियां 

Half a dozen submerged temples will be built in other place in Bilaspur

कहलूर रियासत के समय बने पौराणिक मंदिरों का सर्वेक्षण 20 से अधिक टीमें करेंगी। भाषा एवं संस्कृति विभाग ने टीमों को पत्र लिखकर बिलासपुर आने के लिए कहा है। शनिवार को दिल्ली की टीम बिलासपुर पहुंची। आईटीआरएचडी (इंडियन ट्रस्ट फॉर रूलर हेरीटेज डेवलपमेंट) टीम ने गोबिंदसागर झील के किनारे सांडू मैदान में पहुंचकर मंदिरों का सर्वेक्षण शुरू कर दिया है।

शुरुआती चरण में मंदिरों पर बनी कलाकृति की जांच की। हर कलाकृति के फोटो लेकर उसकी ड्राइंग बनाने को फाइल तैयार की जा रही है। पांच सदस्यीय टीम ने निरीक्षण के दौरान पाया कि कई दशकों पहले मंदिरों में बनाई गई कलाकृति अभी तक दिखाई दे रही हैं। रंगनाथ मंदिर और गोपाल मंदिर में लगे पत्थरों की भी जांच की। भाषा एवं संस्कृति विभाग शिमला के इंजीनियर चुनी लाल कश्यप ने बताया कि मंदिरों के सर्वेक्षण को पहले भी केंद्र की एक टीम दौरा कर गई है।

किसी कारणवश यह कार्य सिरे नहीं चढ़ पाया। विभाग ने इस बार 20 से अधिक टीमों को पत्र लिखा है। उन्होंने बताया कि यहां मंदिरों को स्थानांतरित करना मुश्किल कार्य है, क्योंकि साल के सिर्फ तीन से चार माह यह मंदिर पानी के बाहर रहते हैं। उन्होंने बताया कि यह कार्य शुरू हो जाएगा, लेकिन अभी समय लगेगा। शनिवार को निरीक्षण टीम के साथ जिला भाषा अधिकारी बिलासपुर नीलम चंदेल भी मौजूद रहीं। 

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