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कराहते पहाड़: हिमाचल में नदी-नालों के रास्तों में बस गए लोग, 13 साल में तय नहीं हो सके नो कंस्ट्रक्शन जोन

Sun, 07 Sep 2025 10:23 AM IST
Krishan Singh विश्वास भारद्वाज, शिमला।
विश्वास भारद्वाज, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Sun, 07 Sep 2025 10:23 AM IST
सार

 आपदा के उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में लोग बस गए हैं। केंद्र सरकार के निर्देशों के 13 साल बाद भी हिमाचल में नदी-नालों के आसपास नो कंस्ट्रक्शन जोन चिह्नित नहीं हो सके हैं। 

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Groaning mountains: People settled in the paths of rivers and streams, no construction zone could not be decid
कराहते पहाड़ - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिमाचल प्रदेश में नदी-नालों का रास्ता रोककर जगह-जगह निर्माण हो रहे हैं। आपदा के उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में लोग बस गए हैं। केंद्र सरकार के निर्देशों के 13 साल बाद भी हिमाचल में नदी-नालों के आसपास नो कंस्ट्रक्शन जोन चिह्नित नहीं हो सके हैं। आपदाओं से बचाव के लिए केंद्र ने बाढ़ प्रबंधन और नदी- नालों के तटों की सुरक्षा के लिए साल 2012 में फ्लड प्लेन जोन अधिनियम लागू करने के निर्देश दिए थे। इसके तहत आपदा को लेकर उच्च, मध्यम और कम जोखिम वाले क्षेत्र तय कर निर्माण पर प्रतिबंध लागू किए जाने थे, लेकिन केंद्र सरकार के निर्देश हिमाचल में अब तक लागू नहीं हो पाए। दूसरी ओर, हिमाचल की तरह मिलती-जुलती भौगोलिक स्थिति वाले पड़ोसी राज्य उत्तराखंड ने 2013 में ही उत्तराखंड बाढ़ मैदान परिक्षेत्रण अधिनियम लागू कर दिया है। बादल फटने, बाढ़ और भूस्खलन से ऐसे ही क्षेत्रों में जानमाल का सर्वाधिक नुकसान हो रहा है।

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क्या कहते हैं आंकड़े
राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एसडीएमए) के अधीन काम कर रहे राज्य आपदा प्रतिक्रिया केंद्र के आंकड़ों के अनुसार हिमाचल में नदी-नालों के किनारे बसे 69 अर्ध शहरी क्षेत्र आपदा के लिहाज से बेहद संवेदनशील हैं। इन क्षेत्रों में 541 गांवों के 91,399 घरों में करीब 4,75,962 लोग रह रहे हैं। इनमें से कई क्षेत्र व्यापारिक केंद्र और पर्यटन स्थल बन गए हैं। पर्यावरणविद डॉ. ओमप्रकाश भुवेटा का कहना है कि वर्ष 1997 में चिड़गांव में बादल फटने से लेकर अब तक करीब तीन दशकों में आपदा की दृष्टि से अहम बुनियादी ढांचे में कोई सुधार नहीं हुआ है। जलवायु परिवर्तन के साथ बढ़ते खतरे के बीच आपदा प्रबंधन प्रकोष्ठ को जनभागीदारी के साथ स्थायी विकल्प तलाशने होंगे।

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आईआईटी रोपड़ के अध्ययन में हुआ ये खुलासा
आईआईटी रोपड़ की अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार हिमाचल का 40 फीसदी क्षेत्र उच्च जोखिम क्षेत्र में आता है। नदी-नालों के किनारे बने भवन उच्च जोखिम में हैं। एसडीएमए की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में अनियंत्रित निर्माण और नदी तटों पर अतिक्रमण तेजी से बढ़ रहा है। कुल्लू-मनाली सहित अन्य पर्यटन स्थलों पर नियमों का सबसे अधिक उल्लंघन हो रहा है। आपदा प्रबंधन विभाग और लोक निर्माण विभाग के आंकड़ों के अनुसार बीते तीन साल में नदी-नालों के किनारे बने करीब 979 घर, दुकानें और व्यापारिक प्रतिष्ठान पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए हैं, जबकि 3,228 को आंशिक नुकसान हुआ है। 2023 में 420 मकान पूरी तरह, जबकि 2,300 आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हुए। 2024 में 127 मकान पूरी तरह क्षतिग्रस्त हुए। इस साल अब तक 432 मकान पूरी तरह, जबकि 928 आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हुए हैं।

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केस स्टडी
जुलाई 2025 में मंडी जिले में ब्यास नदी और पंडोह के किनारे हुआ निर्माण बाढ़ की भेंट चढ़ गया। इस आपदा से करीब 400 करोड़ से अधिक की संपत्ति का नुकसान हुआ है। मंडी के सराज और थुनाग में बादल फटने से भारी तबाही हुई। नाले के पानी ने सैकड़ों दुकानों और मकानों को तबाह कर दिया। रामपुर की गानवी खड्ड में आई बाढ़ से भी भारी तबाही हुई। मनाली में ब्यास नदी के किनारे बने घर, होटल और रेस्टोरेंट भी बाढ़ की चपेट में आ गए। चंबा जिले की स्यूल खड्ड में सीआईएसएफ का दो मंजिला भवन नदी की चपेट में आ गया। कुल्लू की पार्वती घाटी और मलाणा में अचानक आई बाढ़ से जल विद्युत परियोजनाओं और नदी के किनारे बने भवनों को भारी नुकसान पहुंचा है। मनाली से चार किलोमीटर दूर बाहंग में रेस्टोरेंट ब्यास नदी की चपेट में आ गया।

क्या कहते हैं नियम
टाउन एंड कंट्री प्लानिंग एक्ट (नदी-नाले से निर्माण दूरी) के 11वें संशोधन नियम 2024 के अनुसार नाले से निर्माण की न्यूनतम दूरी पांच और खड्ड से निर्माण की न्यूनतम दूरी सात मीटर तय की गई है। टाउन एंड कंट्री प्लानिंग एक्ट रूल्स (2014 और 2016 तक) के अनुसार निर्माण की दूरी क्षेत्र विशेष के डेवलपमेंट प्लान के अनुसार स्पष्ट की गई है। बाढ़ संभावित क्षेत्रों में निर्माण प्रतिबंधित है।

नदी-नालों के पुराने रास्ते न हों बंद
नदियां अपने पुराने रास्ते बदलकर फ्लड प्लेन और टेरेस बनाती हैं। नदी ने जहां से अपना रास्ता बदला है, वहां निर्माण हो गया है। ब्यास वैली इसका उदाहरण है। यहां होटल और सड़कें बन गई हैं। नदी जब रास्ता बदलती है तो यही निर्माण चपेट में आते हैं। रिवर टेरेस पर स्थित भरमौर के होली गांव में भी ऐसा ही हुआ। नदियों के पुराने रास्तों, फ्लड प्लेन और टेरेस पर निर्माण प्रतिबंधित करना होगा। - डॉ. एसएस रंधावा, पर्यावरणविद, सेवानिवृत्त प्रिंसिपल साइंटिफिक ऑफिस

सुरक्षित निर्माण के लिए उपयुक्त स्थान का चयन जरूरी
भूमि की सीमित उपलब्धता के चलते कई लोग नदियों और नालों के किनारे खतरा मोल लेकर बसने को मजबूर हो रहे हैं। ऐसे क्षेत्रों में बाढ़ और भूस्खलन का जोखिम अधिक है। बेहतर संपर्क और आजीविका के लिए ऊंचाई वाले क्षेत्रों से लोगों का निचले क्षेत्रों की ओर प्रवास बढ़ा है। सुरक्षित निर्माण के लिए उपयुक्त स्थान का चयन बेहद जरूरी है। - डॉ. ख्याल चंद, कोर्स डायरेक्टर, डीएमसी, हिप्पा

पंचायत सचिवों को देंगे टीसीपी निदेशक की शक्तियां
गांवों में टीसीपी के दिशा-निर्देश लागू करने के लिए पंचायती राज विभाग का सहयोग लिया जाएगा। नदी-नालों के किनारे निर्माण रोकने के लिए बनाए नियम लागू करने के लिए पंचायत सचिवों को निदेशक टीसीपी की शक्तियां दी जाएंगी। इसे लेकर ड्राफ्ट तैयार कर लिया गया है। इसे जल्द लागू कर देंगे। - राजेश धर्माणी, नगर एवं ग्राम नियोजन मंत्री
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