फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Himachal Pradesh ›   Dr. YS Parmar the architect of Himachal, the fabric of the hill state woven with efficient leadership and visi

हिमाचल के शिल्पकार: डॉ. वाईएस परमार ने कुशल नेतृत्व और दूरदर्शी सोच से बुना पहाड़ी राज्य का ताना-बाना

Thu, 01 Sep 2022 06:34 AM IST
Krishan Singh सुरेश शांडिल्य, शिमला
सुरेश शांडिल्य, शिमला Published by: Krishan Singh Updated Thu, 01 Sep 2022 06:34 AM IST
सार

अंग्रेजों और रियासती शासन के खिलाफ मुखर रहने वाले डॉ. परमार पहाड़ और पहाड़ियों के हितों के लिए भी हमेशा संजीदगी के साथ सक्रिय रहे। बात चाहे हिमाचल के गठन की हो या फिर पूर्ण राज्यत्व का दर्जा दिलाने की, उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। कुशल नेतृत्व, दूरदर्शी सोच और सूब-बूझ से उन्होंने  प्रदेश का इतिहास ही नहीं भूगोल बदलवा डाला। उनके योगदान से हिमाचल सरपट पटरी पर दौड़ता चला गया। 

विज्ञापन
Dr. YS Parmar the architect of Himachal, the fabric of the hill state woven with efficient leadership and visi
हिमाचल के शिल्पकार डॉ. वाईएस परमार - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कहते हैं कि कोई भी इंसान देश-समाज के लिए किए गए उत्कृष्ट कार्यों, त्याग और योगदान के दम पर ही अपनी सर्व स्वीकार्य पहचान बनाता है। जीवन के बाद भी उसकी यही पहचान लोगों के दिलों-दिमाग पर अमिट छाप की तरह ताजा रहती है। ऐसे ही पहाड़ी सपूत थे डॉ. यशवंत सिंह परमार। उन्हें हिमाचल का निर्माता यूं ही नहीं कहा जाता है। अंग्रेजों और रियासती शासन के खिलाफ मुखर रहने वाले डॉ. परमार पहाड़ और पहाड़ियों के हितों के लिए भी हमेशा संजीदगी के साथ सक्रिय रहे। बात चाहे हिमाचल के गठन की हो या फिर पूर्ण राज्यत्व का दर्जा दिलाने की, उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। कुशल नेतृत्व, दूरदर्शी सोच और सूब-बूझ से उन्होंने  प्रदेश का इतिहास ही नहीं भूगोल बदलवा डाला। उनके योगदान से हिमाचल सरपट पटरी पर दौड़ता चला गया। 

विज्ञापन


सिरमौर के चन्हालग गांव में जन्मे
डॉ. यशवंत सिंह परमार का जन्म चार अगस्त 1906 को प्रदेश के सिरमौर जिले (तत्कालीन सिरमौर रियासत) में बागथन क्षेत्र के चन्हालग गांव में भंडारी शिवानंद सिंह परमार के घर हुआ था। यह गांव अब ग्राम पंचायत लानाबांका के तहत आता है। उनके पिता सिरमौर के तत्कालीन महाराजा के बहुत करीबी थे और उर्दू व फारसी भाषा के विद्वान थे। वह सिरमौर रियासत के एक अधिकारी भी थे। डॉ. परमार की माता का नाम लक्ष्मी देवी था। लोक संस्कृति और पारंपरिक खानपान के प्रति डॉ. यशवंत सिंह परमार का विशेष लगाव रहा तो यह उनकी मां से मिले संस्कार की बदौलत संभव हुआ।
विज्ञापन


शमशेर हाई स्कूल नाहन से ली शुरुआती शिक्षा
डॉ. परमार की शुरुआती शिक्षा शमशेर हाई स्कूल नाहन से हुई। क्षेत्र में उच्च शिक्षा के लिए कोई कॉलेज नहीं था तो उन्होंने लाहौर के फोरमैन क्रिश्चियन कॉलेज दाखिला लिया। 1928 में बीए ऑनर्स किया। पंजाब यूनिवर्सिटी लाहौर से डिग्री लेने के बाद उन्होंने कैनिंग कॉलेज लखनऊ में प्रवेश लिया। लखनऊ के इस कॉलेज से समाज शास्त्र में एमए किया और एलएलबी की डिग्री भी ली। 1944 में समाज शास्त्र विषय में पीएचडी की। उनकी डॉक्टरेट की डिग्री का विषय ‘सोशल एंड इकोनामिक बैक ग्राउंड ऑफ हिमालयन पॉलीएंड्री’ था।
विज्ञापन
विज्ञापन


मजिस्ट्रेट के तौर पर शुरू किया कॅरिअर
पढ़ाई पूरी करने के बाद बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ. परमार ने सिरमौर राज्य सेवाओं में मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी के रूप में अपने कॅरिअर की शुरुआत की। 1937 से 1940 तक जिला एवं सत्र न्यायाधीश के रूप में कार्यभार ग्रहण किया। 1929 में थियोसोफिकल सोसायटी देहरादून के सदस्य रहे। 1937-38 में नाहन क्रिकेट क्लब के सचिव बने और 1938-40 से दक्षिणी पंजाब क्रिकेट संघ के कार्यकारी सदस्य भी बने। वर्ष 1941 में डॉ. परमार ने राज्य की सेवाओं से इस्तीफा दे दिया। इसके कारण राजनीतिक बताए। इसके बाद उन्हें सिरमौर राज्य से निर्वासित कर दिया गया।



प्रजा मंडल के सक्रिय सदस्य रहे

सिरमौर से निर्वासित होने के बाद डा. परमार प्रजा मंडल के सक्रिय सदस्य बन गए। हिमाचल प्रदेश में प्रजा मंडल रियासती और अंग्रेेजी शासन के खिलाफ लड़ाई लड़ रहा था। वह 1943 से 1946 तक दिल्ली में सिरमौर एसोसिएशन के सचिव बनाए गए। वह हिमालयन स्टेट रीजनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष भी बने।

15 अप्रैल 1948 को हुआ हिमाचल का गठन

Dr. YS Parmar the architect of Himachal, the fabric of the hill state woven with efficient leadership and visi
महिलाओं के साथ वाईएस परमार। - फोटो : अमर उजाला

डा. परमार ने 1948 में सुकेत सत्याग्रह का आयोजन किया। 15 अप्रैल 1948 को 31 रियासतों के विलय से हिमाचल प्रदेश का गठन हुआ। यह क्षेत्र पहले पंजाब हिल स्टेट्स और शिमला हिल स्टेट्स के रूप में जाना जाता था। वर्ष 1948 में डॉ. परमार को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का सदस्य मनोनीत किया गया। वह हिमाचल प्रदेश के मुख्य आयुक्तों की सलाहकार परिषद के सदस्य भी रहे। उन्हें भारत की संविधान सभा का सदस्य चुना गया। संविधान के प्रारूप के विभिन्न लेखों पर बहस के दौरान उनकी कुछ टिप्पणियों को आज भी उद्धृत किया जाता है। वह लोकसभा या उच्च सदन के सदस्य भी थे।

 

उन्होंने 1951 में इस्लामाबाद में इंटर पार्लियामेंटरी कांफ्रेंस में भारतीय संसदीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया। पहले आम चुनाव के बाद 1952 में वह राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने। 1957 में उन्होंने लोकसभा चुनाव जीता और 1963 में वे फिर से हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। उनके नेतृत्व में ही 1966 में हिमाचल पंजाब पहाड़ी क्षेत्रों के एकीकरण के साथ अपना उचित दर्जा हासिल कर पाया। उनके मुख्यमंत्री रहते ही 25 जनवरी 1971 को हिमाचल प्रदेश एक पूर्ण राज्य बना।  

हिमाचल के लिए मांगी तीन प्राथमिकताएं : सड़क, सड़क और सड़क

Dr. YS Parmar the architect of Himachal, the fabric of the hill state woven with efficient leadership and visi
सड़क - फोटो : अमर उजाला

डॉ. यशवंत सिंह परमार भविष्यद्रष्टा व्यक्तित्व के धनी थे। उनसे जब केंद्र सरकार ने पूछा कि हिमाचल के लिए उनकी तीन प्राथमिकताएं क्या-क्या हैं तो वह बोले-सड़क, सड़क और सड़क। वह मानते थे कि जब तक राज्य के गांवों की कनेक्टिविटी नहीं होगी, तब तक यहां पर विकास संभव नहीं है। यही नहीं, बाहर के लोग यहां कृषि भूमि को न खरीद पाए, इसके लिए उन्होंने भू सुधार अधिनियम बनाया और इसमें धारा 118 की बंदिश डाली। उन्होंने प्रदेश को ऊर्जा राज्य बनाने की नींव रखी।

75 साल पहले बना था हिमाचल प्रदेश पूर्ण राज्य का दर्जा मिले हो गए 51 साल

Dr. YS Parmar the architect of Himachal, the fabric of the hill state woven with efficient leadership and visi
डॉ. वाईएस परमार। - फोटो : अमर उजाला

 हिमाचल प्रदेश को बने हुए 75 वर्ष हो गए हैं, जबकि इसे पूर्ण राज्य का दर्जा मिले 51 वर्ष हो चुके हैं। देवभूमि हिमाचल प्रदेश का यह संपूर्ण भूभाग पहले पंजाब का हिस्सा था। आठ मार्च 1948 को शिमला हिल्स की 27 रियासतों को मिलाकर हिमाचल प्रदेश बनाने की प्रक्त्रिस्या शुरू हुई। भारत के आजाद होने के बाद हिमाचल प्रदेश 15 अप्रैल 1948 के दिन अस्तित्व में आया। 31 छोटी-बड़ी रियासतों को जोड़कर यह राज्य गठित किया गया। कई पहाड़ी रियासतों को इकट्ठा कर इस पहाड़ी प्रांत का नामकरण हिमाचल प्रदेश किया गया। इसका गठन शिमला हिल स्टेट्स और मंडी व चंबा रियासतों से किया गया।

इसमें चंबा, मंडी, सिरमौर, बुशहर और सुकेत की रियासतें थीं। पंजाब हिल स्टेट्स हिमाचल का हिस्सा नहीं थीं। कुल्लू, लाहौल स्पीति, कांगड़ा आदि क्षेत्र तक हिमाचल में नहीं आ पाए थे। बिलासपुर भी इसमें शामिल नहीं था। शुरू में इसे चीफ  कमिश्नर प्रांत का दर्जा दिया गया। 26 जनवरी 1950 में हिमाचल सी श्रेणी का राज्य बना। 28 मई 1954 को बिलासपुर को मिलाकर नए हिमाचल प्रदेश का गठन हुआ। मौजूदा हिमाचल प्रदेश के अन्य क्षेत्र भी लगातार इसमें जोडे़ गए। वर्तमान में हिमाचल पूर्व में उत्तराखंड, दक्षिण में हरियाणा, पश्चिम में पंजाब, उत्तर में जम्मू-कश्मीर और उत्तर-पूर्व में तिब्बत से घिरा हुआ है। राज्य का क्षेत्रफल 55.673 वर्ग किलोमीटर है।

डॉ. परमार चाहते थे हिमालय प्रांत नाम पटेल ने हिमाचल प्रदेश पर लगाई मुहर

Dr. YS Parmar the architect of Himachal, the fabric of the hill state woven with efficient leadership and visi
जनजातीय महिलाओं के साथ परमार। - फोटो : अमर उजाला

चार जनवरी 1948 को शिमला, 13 जनवरी को कोटगढ़ और 19 जनवरी को रामपुर में बैठकें हुईं, जिनमें प्रजा मंडल के नेताओं ने इस पहाड़ी राज्य का नामकरण हिमालय प्रांत करने का प्रस्ताव रखा। इसके बाद 25 जनवरी को शिमला के गंज बाजार में भी डॉ. वाईएस परमार की अध्यक्षता में एक बैठक हुई, जिसमें हिमालय प्रांत के गठन का प्रस्ताव पारित हुआ। इसके बाद 26 जनवरी 1948 को प्रजा मंडल के नेताओं की सोलन में एक सभा बुलाई गई। इसमें भी हिमालय प्रांत के नामकरण पर चर्चा हुई। इस सभा में ही इस राज्य का नाम हिमाचल प्रदेश रखा गया। उस वक्त हिमाचल प्रदेश में प्रजा मंडल के दो धड़े हो गए थे। इनमें एक सत्यदेव बुशहरी और भागमल सौहटा का धड़ा था तो दूसरा डॉ. वाईएस परमार और पंडित पद्म देव का था। पद्म-परमार धडे़ ने हिमाचल प्रदेश के स्थान पर इसका नाम हिमालय प्रांत रखने का प्रस्ताव दिया, मगर तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने इसका नामकरण हिमाचल प्रदेश करने का अनुमोदन किया।

बर्फ की फाहों के बीच हुई पूर्ण राज्यत्व की घोषणा
25 जनवरी, 1971 को हिमाचल प्रदेश भारतीय गणराज्य का 18वां राज्य बना। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बर्फ की फाहों के बीच हिमाचल प्रदेश के पूर्ण राज्यत्व की यह घोषणा राजधानी शिमला के रिज मैदान के टका बैंच से की। डॉ. यशवंत सिंह परमार उस वक्त हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। उनके इंदिरा गांधी के साथ अच्छे संबंध थे।

परमार ने लिखा, 1971 में बढ़कर 30 करोड़ हुई हिमाचल की आय

Dr. YS Parmar the architect of Himachal, the fabric of the hill state woven with efficient leadership and visi
डॉ. यशवंत सिंह परमार। - फोटो : अमर उजाला

हिमाचल को पूर्ण राज्यत्व का दर्जा 25 जनवरी 1971 को जब मिला तो हिमाचल निर्माता ने अपने एक लेख में उल्लेख किया कि वास्तव में किसी भी राज्य का घरेलू राजस्व 35 गुना नहीं बढ़ा है। हिमाचल प्रदेश में 1948 में यह आय 35 लाख थी जो 1971 में बढ़कर 30 करोड़ रुपये हो गई है। आज प्रदेश का सकल घरेलू उत्पाद 1,60,000 करोड़ रुपये के आसपास रहता है।

ऐसे हुई राजधानी शिमला की स्थापना
स्कॉच अधिकारी अपनी डायरी में लिखते हैं कि शिमला एक मझोला-सा गांव है, जहां राहगीरों को पानी पिलाने के लिए एक फकीर रहता है। इस डायरी में उल्लेख है कि वे जाखू में ठहरे और उन्होंने यहां से बहुत ही मनोरम और सुंदर दृश्य देखा। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार शिमला की खोज उन स्कॉच अधिकारियों ने की जो सतलुज घाटी पर सर्वे करने के लिए आए थे। पहले शिमला एक छोटा सा गांव था। अंग्रेज शिमला आए तो यहां पर पहला  कॉटेज 1819 में असिस्टेंट पॉलिटिकल एजेंट कैप्टन रॉस ने बनाया था।

उनके उत्तराधिकारी कैप्टन कैनेडी ने 1822 में पहला मकान बनाया। 1824 में कुछ अंग्रेजों ने क्योंथल के राणा से इजाजत लेकर मकान बनाए। 1827 में गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम पिट्ट एमहर्स्ट ने शिमला को गुलाम भारत की ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने का विचार किया। इसके लिए क्योंथल से बारह गांव लिए गए, इसके बदले राणा क्योंथल को परगना रावीं में शराचलू और गठासू के इलाके दिए गए। इससे राणा को ज्यादा मालगुजारी मिल रही थी। आजादी के बाद 1948 हिमाचल प्रदेश बना तो शिमला को इसकी राजधानी बनाया गया। हालांकिए शिमला उस वक्त भी पंजाब का हिस्सा था।

सादगी के भी थे प्रतीक

Dr. YS Parmar the architect of Himachal, the fabric of the hill state woven with efficient leadership and visi
डॉ. यशवंत सिंह परमार - फोटो : अमर उजाला

डॉ. परमार सादगी के प्रतीक थे। दूर-दराज के इलाकों में भ्रमण के दौरान एक छड़ी की मदद से अपना सामान अपनी पीठ पर ले जाते थे, जिसमें महत्वपूर्ण दस्तावेज, ग्राम होते थे। वह खाने के लिए चने और गुड़ को साथ रखते थे। मुख्यमंत्री का पद छोड़ने के बाद उनके बैंक खाते में सिर्फ 563 रुपये या 10 डॉलर से भी कम पैसे थे। वह जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, सरदार वल्लभ भाई पटेल आदि के बहुत करीब थे।

जर्मनी में सीखे गहन कृषि के कार्यक्रम
डॉ. यशवंत सिंह परमार ने इंडो-जर्मन गहन कृषि कार्यक्रम के सिलसिले में पश्चिम जर्मनी के एक प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया। जर्मनी और स्विट्जरलैंड में विभिन्न जलविद्युत उत्पादन संयंत्रों का दौरा किया। गहन कृषि कार्यक्रम के संबंध में चर्चा के लिए उन्हें 1965 में फिर से जर्मनी आमंत्रित किया गया। 1971 में उन्होंने यूएसए, कनाडा, जापान, इटली, सिंगापुर, मलेशिया, लेबनान और ग्रीस का दौरा किया।

पहली पत्नी का देहांत होने पर किया दूसरा विवाह
डॉ. परमार के दो विवाह हुए। उनकी पहली पत्नी चंद्रावती की मृत्यु हो गई थी, जिनसे उनके चार पुत्र हुए। ये जितेंद्र सिंह परमार, जयपाल सिंह परमार, लव परमार और कुश परमार थे। उनका दूसरा विवाह सत्यवती डांग से हुआ। सत्यवती की पहले विवाह से दो बेटियां थीं, ये उर्मिल परमार और प्रोमिला परमार थीं। कुश परमार नाहन से विधायक रह चुके हैं।

हिमाचल के अब तक रहे मुख्यमंत्रियों का विवरण 

Dr. YS Parmar the architect of Himachal, the fabric of the hill state woven with efficient leadership and visi
हिमाचल के अब तक रहे मुख्यमंत्री। - फोटो : संवाद
  • डा. यशवंत सिंह परमार : 1952 में पहली बार मुख्यमंत्री बने, 24 जनवरी 1977 तक चार बार सीएम रहे।
  • रामलाल ठाकुर : जनवरी 1977 में डा. यशवंत सिंह परमार के त्यागपत्र के बाद दूसरे मुुख्यमंत्री बने। इन्हें 1983 में वीरभद्र सिंह ने रिप्लेस किया।
  • शांता कुमार : पहली बार 22 जून 1977 को मुख्यमंत्री बने। दूसरी बार पांच मार्च 1990 से 15 दिसंबर 1992 तक सीएम रहे।
  • वीरभद्र सिंह : आठ अप्रैल 1983 को पहली बार मुख्यमंत्री पद की बागडोर संभाली। इसके बाद 1985, 1993, 1998, 2003 और 2012 में छह बार प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे।
  • प्रो. प्रेम कुमार धूमल : 24 मार्च 1998 को पहली बार मुख्यमंत्री बने। दिसंबर 2007 मेें हुए चुनाव में सत्ता में आई भाजपा सरकार में फिर मुख्यमंत्री बने। 24 दिसंबर 2012 तक सीएम रहे।
  • जयराम ठाकुर : वर्तमान सीएम जयराम ठाकुर ने अपना पदभार 27 दिसंबर 2017 को संभाला। वह हिमाचल प्रदेश के छठे मुख्यमंत्री हैं।

मानो पहाड़ और डॉ. परमार एक हो गए हों: डॉ. संजीव कुमार बरागटा  

Dr. YS Parmar the architect of Himachal, the fabric of the hill state woven with efficient leadership and visi
डॉ. संजीव कुमार बरागटा - फोटो : अमर उजाला

हिमाचल निर्माता डॉ. यशवंत सिंह परमार एक ऐसी शख्सियत थे, जिन्होंने हिमाचल प्रदेश का इतिहास ही नहीं, भूगोल भी बदल दिया था। डॉ. परमार का जन्म 4 अगस्त 1906 को तत्कालीन सिरमौर रियासत के बागथन के समीप चन्हालग गांव में हुआ था। डॉ. परमार का व्यक्तित्व ऐसा था, मानो पहाड़ और डॉ. परमार एक हो गए हों। उन्होंने हिमाचल प्रदेश के जनमानस को गौरवान्वित किया और इस राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री के पद को सुशोभित करके हिमाचल निर्माता कहलाए। डॉ. परमार ने अपनी निष्पक्षता और निर्भीकता से स्वतंत्रता के आंदोलन का सफल नेतृत्व किया। उन्होंने भारतीय संविधान सभा में सदस्य के रूप में स्थान पाकर हिमाचल प्रदेश का नाम राष्ट्रीय स्तर पर गौरवान्वित किया। पहाड़ी रियासत के विलय समझौते के तहत 15 अप्रैल, 1948 को हिमाचल प्रदेश प्रशासन का अध्यादेश 1948 घोषित हुआ और चीफ कमिश्नर को अध्यक्ष नियुक्त कर नए सूबे हिमाचल प्रदेश की स्थापना 30 पहाड़ी रियासतों के गठबंधन से हुई। चीफ कमिश्नर एक सलाहकार परिषद के माध्यम से राज्य को चलाया करते थे। इस परिषद में कांग्रेस सदस्यों का नेतृत्व डा. परमार किया करते थे। डॉ. परमार की अगुवाई में 24 मार्च, 1952 को मंत्रिमंडल बना। डॉ. परमार के अथक प्रयासों से कई महत्वपूर्ण विधेयक पारित किए गए। डॉ. परमार ने राजनीतिक के साथ-साथ सांस्कृतिक चेतनामें भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।

अगर उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला जाए तो  वर्ष 1947 में डा. परमार ग्रुपिंग एंड अमेलगेमेशन कमेटी के सदस्य और प्रजा मंडल सिरमौर के प्रमुख रहे। डॉ. परमार ने सुकेत आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया। वह सन् 1948 से 1950 तक अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य रहे। डॉ. परमार के सक्षम नेतृत्व से हिमाचल प्रदेश में 31 रियासतों को समाप्त करके हिमाचल प्रदेश राज्य की नींव रखी गई। आज हिमाचल प्रदेश एक आदर्श पहाड़ी राज्य की ओर अग्रसर है। वह डॉ. परमार की ही देन है। सन् 1952 में डा. परमार हिमाचल प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री बने और 1957 में वे सांसद के रूप में भी निर्वाचित हुए। सन 1963 में दोबारा प्रदेश मुख्यमंत्री बने और 28 जनवरी, 1977 को मुख्यमंत्री के पद से त्यागपत्र दिया।

डॉ. परमार ने 1963 से 1966 के दौरान पंजाब और शिमला पहाड़ी रियासती क्षेत्रों के हिमाचल प्रदेश के साथ विलय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1966 में विशाल हिमाचल का गठन किया गया। उनके मुख्यमंत्री काल में 25 जनवरी 1971 को हिमाचल प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया। हिमाचल भारतीय संघ का 18वां राज्य बना। डॉ. परमार ने अपने कुशल नेतृत्व, दूरदर्शी सोच, राजनीतिक और प्रशासनिक प्रबंधन क्षमता से पहाड़ी प्रदेश को न सिर्फ द्रुत गति से आगे बढ़ाया बल्कि दूर कालीन विकास और कल्याण का मजबूत आधार भी तैयार किया। इस मजबूत आधार के दम पर हिमाचल विकास और तरक्की की यात्रा पर लगातार अग्रसर है। (लेखक हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय सांध्यकालीन अध्ययन विभाग में सह आचार्य राजनीति विज्ञान हैं।)

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed