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अस्पतालों में चल रहा कमीशन का गोरखधंधा

Sun, 14 Feb 2016 11:28 AM IST
Updated Sun, 14 Feb 2016 11:28 AM IST
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doctor takes commission gifts from pharma firms and medical representatives

भगवान का दर्जा प्राप्त डॉक्टरों में से चिकित्सकों का एक तबका सवालों के घेरे में है। जिला के अस्पतालों में महंगी दवाइयों पर कमीशनखोरी का गोरखधंधा चल रहा है। पुख्ता सूत्रों के मुताबिक कुछ चिकित्सक मरीजों को कमीशन के चक्कर में महंगी ब्रांडेड दवाएं लिख रहे हैं। इसकी वजह से आम आदमी की जेब ढीली हो रही है।

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चिंतपूर्णी अस्पताल में लाखों रुपये की सरकारी दवाओं की बेकद्री से भी ऐसे कई सवाल उठ रहे हैं। हालांकि जिला में यह गोरखधंधा लंबे अरसे से जारी है। इसके तहत चिकित्सक दवा कंपनियों से मोटी चांदी कूट रहे हैं। इसमें न केवल ब्रांडेड बल्कि लोकल ब्रांड की दवा कंपनियों का भी खेल चल रहा है।
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वहीं, सरकार के फरमान के बावजूद अधिकांश डॉक्टर मरीजों को सस्ती जेनरिक दवाई लिखने के बजाय महंगी ब्रांडेड दवाएं लिख रहे हैं। इस कथित मनमानी से आम मरीज परेशान और बेबस हैं। विभागीय सूत्र बताते हैं कि जिला के अस्पतालों में विभाग की ओर से दवाओं का पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है। इसके बावजूद चिकित्सक मरीजों को बाहरी स्टोरों से दवा खरीदने को मजबूर कर रहे हैं।

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गिफ्ट से लेकर कैश तक का चलता है धंधा

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नाम न छापने की शर्त पर जिला में कार्यरत दवा कंपनी के एक एमआर (मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव) ने बताया कि अमूमन दवा कंपनियों की ओर से डॉक्टरों को सालाना उपहार तय होते हैं, लेकिन कई मर्तबा डॉक्टर कैश तक की डिमांड करते हैं। जिनकी आपूर्ति करना मजबूरी बन जाता है।

हालांकि नामी कंपनियां कैश जैसे मामलों में न पड़कर तय गिफ्ट देती हैं। लेकिन लोकल ब्रांड के मामलों में बात कैश तक आती है। डॉक्टरों की 20 से लेकर 50 फीसदी तक कमीशन तय रहती है। यह दीगर है कि सभी डॉक्टर इस तरह की अनैतिक प्रैक्टिस में शामिल नहीं हैं।

सरकार बनाए ठोस नीति-
जिला में आम आदमी के सरोकारों से जुड़े संगठन जनहित मोर्चा के सलाहकार सरदार भाग सिंह का कहना है कि सरकार को इस बाबत कोई ठोस नीति बनाकर उसे अमल में लाना चाहिए। जहां तक डॉक्टरी पेशे का सवाल है यह पुण्य के कार्य से जुड़ा है।

चिकित्सकों को इस तरह की अनैतिक प्रैक्टिस में शामिल नहीं होना चाहिए। इस पर कार्रवाई की जरूरत है। वहीं, प्रदेश भर में बतौर एमआर जुड़े हजारों युवाओं के लिए भी सरकार को नीति निर्धारित करनी चाहिए।

सीएमओ डॉ. एके गुप्ता ने कहा कि जिला में सभी चिकित्सकों को सरकार के तय निर्देशों के अनुसार दवाइयां लिखने के निर्देश हैं। अगर कहीं इस तरह की शिकायत सामने आती है तो उस पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।

सरकारी अस्पतालों में दवाइयां खत्म

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कुल्लू। डिमांड के बावजूद सरकारी अस्पतालों में दवाइयां नहीं पहुंच रही है। ऐसे में लोग निजी दुकानों से दवाइयां लेने को मजबूर है।यह हालत केवल कुल्लू अस्पताल की नहीं है बल्कि जिला के सरकारी अस्पतालों सैंज पीएचसी, जरी पीएचसी, नग्गर पीचसी, बंजार अस्पताल सहित अन्य सभी अस्पतालों में दवाइयां खत्म है। यहां पर मरीजों को सरकारी दवाइयां नहीं मिल रही है।

प्रदेश सरकार ने 56 दवाइयों को सरकारी अस्पतालों में मुफ्त देने का ऐलान किया है, लेकिन अभी तक यह दवाइयां अस्पतालों में लोगों को नहीं मिल रही है। इस कारण जिला के गरीब परिवारों के लोग निजी स्टोर से महंगी दवाइयां खरीदने को मजबूर हैं। हालांकि कुछ दवाइयां सरकारी अस्पतालों में मरीजों को दी जा रही है, लेकिन अधिकतर दवाइयां मरीजों को बाहर से ही लेनी पड़ती है।

शहरवासी अभिषेक कुमार, देविंद्र शर्मा और राजेश सूद ने कहा कि अस्पतालों में दवाइयां नहीं मिलने के कारण गरीबों पर आर्थिक बोझ पड़ता है। डॉक्टर ऐसी दवाइयां पर्ची पर लिखकर देते हैं जो अस्पताल में उपलब्ध नहीं होती है। उन्होंने मांग की है कि सरकारी अस्पतालों में सरकारी दवाइयां उपलब्ध करवाई जाए।

उधर, इस मामले को लेकर सीएमओ कुल्लू वाईडी शर्मा ने कहा कि सरकारी अस्पतालों में मिलने वाली 56 दवाइयों का ऑर्डर भेजा गया है। महीने के आखिर तक सरकारी अस्पतालों में यह दवाइयां पहुंच जाएगी। उसके बाद यह सभी दवाइयां मरीजों को मुफ्त में मिलेगी।

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