चीन के ग्लेशियरों से भारत में बन रहीं खतरनाक झीलें, वैज्ञानिकों ने दिया ये समाधान
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ग्लेशियरों से चीन सीमा पर बनीं झीलें हिमाचल के लिए खतरे की घंटी बजा रही हैं। ये झीलें तेजी से बढ़ रही हैं और सूबे के निचले क्षेत्रों में केदारनाथ हादसे की तरह तबाही मचा सकती हैं।
मनाली से लगभग 100 किलोमीटर दूर स्पीति वैली में गीपांगगत ग्लेशियर पर सिस्सू नाले पर बनी झील का उदाहरण देते हुए एक वैज्ञानिक ने ये तथ्य सामने लाकर चौंका दिया कि यह झील पहले जहां 27 हेक्टेयर में थी, वहीं अब बढ़कर 118 हेक्टेयर में फैल चुकी है।
इस बारे में प्रशासन को भी आगाह किया है कि इसे ब्लास्ट कर भविष्य के खतरे को टालें। यह खुलासा हिमाचल पर्यावरण, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग की ओर से जलवायु परिवर्तन पर शिमला में पर्यटन निगम के होटल होली डे होम में हुई कार्यशाला में प्रधान वैज्ञानिक अधिकारी डा. एसएस रंधावा ने किया।
रंधावा ने कहा कि सतलुज का बेसिन हिमाचल में है। यह चीन से शुरू होता है। इसे स्पीति बेसिन और बास्पा बेसिन के ग्लेशियरों से पानी मिलता है। ग्लेशियरों के पिघलने से सबसे ज्यादा झीलें सतलुज बेसिन में चीन सीमा के आरपार बन रही हैं।
गीपांगगत ग्लेशियर के आगे सिस्सू नाले पर ये जो झील है, इसका रकबा वर्ष 1965 में 27 हेक्टेयर था और अब 118 हेक्टेयर हो गया है। इसके बारे में जिला प्रशासन को बताया है कि जिस तरह की यह झील है, इसको वैज्ञानिक तरीके से ब्लास्ट करना बहुत जरूरी है।
बर्फबारी का समय बदलने से भी पिघल रहे ग्लेशियर
ये अगर बह जाती है तो सबसे पहले सिस्सू नाले में इससे बाढ़ आएगी, जो निचले क्षेत्रों में तबाही मचा सकती है। डाॅ. रंधावा ने बताया कि ग्लेशियरों में बर्फ जमा तो हो रही है, मगर यह जल्दी पिघल रही है।
पहले हिमपात नवंबर, दिसंबर में ज्यादा होता था, अब फरवरी, मार्च और अप्रैल यहां तक कि मई तक हो रहा है। बर्फबारी लेट होन से इसमें वाटर कंटेट बढ़ गया है। इससे यह जल्दी मेल्ट कर रही है। हालांकि, इस बार सुखद यह है कि ग्लेशियरों में 25 प्रतिशत बर्फ बढ़ी है।
गाड़ियों के चलने से जो कार्बन निकल रहा है, वह ग्लेशियरों पर जमा हो रहा है। ये ग्लेशियरों की ब्लैक बॉडी बना रहा है। इससे भी ग्लेशियर पिघल रहे हैं। विदेशी शोधार्थियों का इस पर शोध सामने आया है।