{"_id":"5cc4928fbdec22077e099f02","slug":"161556386447-shimla-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"कम पड़ीं एंबुलेंस, निजी वाहनों से अस्पताल पहुंचाने पड़े घायल","category":{"title":"Crime","title_hn":"क्राइम","slug":"crime"}}
कम पड़ीं एंबुलेंस, निजी वाहनों से अस्पताल पहुंचाने पड़े घायल
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
अमर उजाला ब्यूरो
डलहौजी/बनीखेत (चंबा)। डलहौजी पठानकोट मार्ग पर शनिवार शाम हुए निजी बस हादसे ने व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी है। हादसे के घायलों को अस्पताल पहुंचाने के लिए एंबुलेंस की कमी आ पड़ी। ककीरा और बनीखेत की दो एंबुलेंस तो घटनास्थल पर तो पहुंची, लेकिन डलहौजी अस्पताल की एंबुलेंस खराब थी।
एंबुलेंस मरम्मत करवाने जिला मुख्यालय गई थी। जैसे ही हादसा हुआ तो काफी संख्या में लोग मौके पर पहुंच गए। स्थानीय लोग राहत बचाव में जुट गए। सेना ने भी मदद को हाथ बढ़ाए। जहां बस गिरी थी वहां खाई तक पहुंचना खतरे से खाली नहीं था। ऐसे में लोगों ने जान पर खेलकर राहत कार्यों को अंजाम दिया। देर रात पर अंधेरी पहाड़ी में चीखपुकार मचा हुआ था।
गौरतलब है कि उक्त मार्ग सर्दियों में भूस्खलन हुआ था। मार्ग बहाल करने के लिए मशीनरी ने मलवा सड़क से नीचे फेंका। मलबे की चपेट में पैरापिट भी आ गए। ऐसे में यहां सुरक्षा शून्य हो गई। लोगों का कहना है कि अगर समय रहते यहां सुरक्षा के नजरिये से कार्य किया जाता तो कुछ हद तक नुकसान कम हो सकता था।
विज्ञापन
लेकिन एक बार फिर व्यवस्था की पोल खुल गई। हादसे के बाद सड़कों को सुरक्षित करने के दावे सरकारें तो करती है। लेकिन हादसे के कुछ समय बाद सारे दावे सरकार भूल जाती है। रही सही कसर दुर्घटना के बाद घायलों को अस्पताल तक ले जाने के लिए एंबुलेंस न पूरी कर दी। खाई से बाहर निकले जाने वाले घायलों को अस्पताल तक पहुंचने के लिए निजी वाहन चालकों ने मदद की।
विज्ञापन
डलहौजी/बनीखेत (चंबा)। डलहौजी पठानकोट मार्ग पर शनिवार शाम हुए निजी बस हादसे ने व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी है। हादसे के घायलों को अस्पताल पहुंचाने के लिए एंबुलेंस की कमी आ पड़ी। ककीरा और बनीखेत की दो एंबुलेंस तो घटनास्थल पर तो पहुंची, लेकिन डलहौजी अस्पताल की एंबुलेंस खराब थी।
एंबुलेंस मरम्मत करवाने जिला मुख्यालय गई थी। जैसे ही हादसा हुआ तो काफी संख्या में लोग मौके पर पहुंच गए। स्थानीय लोग राहत बचाव में जुट गए। सेना ने भी मदद को हाथ बढ़ाए। जहां बस गिरी थी वहां खाई तक पहुंचना खतरे से खाली नहीं था। ऐसे में लोगों ने जान पर खेलकर राहत कार्यों को अंजाम दिया। देर रात पर अंधेरी पहाड़ी में चीखपुकार मचा हुआ था।
विज्ञापन
गौरतलब है कि उक्त मार्ग सर्दियों में भूस्खलन हुआ था। मार्ग बहाल करने के लिए मशीनरी ने मलवा सड़क से नीचे फेंका। मलबे की चपेट में पैरापिट भी आ गए। ऐसे में यहां सुरक्षा शून्य हो गई। लोगों का कहना है कि अगर समय रहते यहां सुरक्षा के नजरिये से कार्य किया जाता तो कुछ हद तक नुकसान कम हो सकता था।
विज्ञापन
लेकिन एक बार फिर व्यवस्था की पोल खुल गई। हादसे के बाद सड़कों को सुरक्षित करने के दावे सरकारें तो करती है। लेकिन हादसे के कुछ समय बाद सारे दावे सरकार भूल जाती है। रही सही कसर दुर्घटना के बाद घायलों को अस्पताल तक ले जाने के लिए एंबुलेंस न पूरी कर दी। खाई से बाहर निकले जाने वाले घायलों को अस्पताल तक पहुंचने के लिए निजी वाहन चालकों ने मदद की।