गाय के गोबर से तैयार हो रही हवन सामग्री, धूप-अगरबत्ती
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यज्ञशाला के हवनकुंड में लकड़ी की समधा के बिना ही आहुतियां दी जाएं तो यह बात अचरज में डालती है। लेकिन प्रदेश की शक्तिपीठों समेत कई मंदिरों में बिना लकड़ी की समधा के हवनकुंड जल रहे हैं। यह समधा सुखाकर पीसे गए गोबर से तैयार होती है। देसी गाय के गोबर समेत अन्य सात्विक, पवित्र और शुद्ध सामग्री से बिना लकड़ी की यह समधा तैयार की जा रही है।
बिलासपुर शहर से सटे कोठीपुरा गांव की उद्यमशील कविता गुप्ता (39) इस औद्योगिक इकाई को चला रही हैं। खास बात है कि इस औद्योगिक इकाई में पूरी तरह से पर्यावरण के अनुकूल 20 उत्पाद तैयार किए जाते हैं जिनकी सप्लाई हिमाचल के कई मंदिरों और इलाकों में की जा रही है। यहां धूप, अगरबत्ती, हवन सामग्री और समधा इत्यादि तैयार किए जाते हैं।
उत्तरी भारत में कविता गुप्ता का उद्योग अपनी तरह की पहली और इकलौती इकाई है। हर उत्पाद में देसी गाय के गोबर का किसी ने किसी रूप अथवा मात्रा में उपयोग किया जाता है। कविता ने बताया कि बीते वर्ष ही उन्होंने सात्विक सामग्री तैयार करने का उद्यम शुरू किया है। उनके साथ दो दर्जन लोगों की टीम काम कर रही है।
400 देसी गोवंश हैं सात्विक सामग्री का स्रोत
प्रदेश में शक्तिपीठ श्री नयनादेवी, ज्वालाजी सहित बगलामुखी व अन्य कई मंदिरों में जिन उत्पादों की आपूर्ति की जाती है, उनकी सामग्री का स्रोत 400 देसी गोवंश हैं। कविता ने बताया कि 200 देसी गोवंश कोठीपुरा में और इतनी ही संख्या में आईटीआई के पास रखे गए हैं।
गोवंश के गोबर को सुखाया जाता है जिसके बाद इसे मशीन में पीसा जाता है। इस गोबर का इस्तेमाल तेल, गुगल, लोबान, मोगरा और चंदन पाउडर बनाने में किया जाता है। कविता गुप्ता 25 देसी गिर गायों समेत सिंध की साहीवाल सहित अन्य प्रजातियों पर काम कर रही हैं। रोजाना 800 लीटर दूध का उत्पादन होता है।
राष्ट्रीय गोपाल रत्न अवार्ड से हो चुकीं सम्मानित
देसी गोवंश की सेवा के लिए उन्हें वर्ष 2018 में तत्कालीन केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह से राष्ट्रीय गोपाल रत्न अवार्ड भी मिल चुका है। कविता को गोकुल मिशन के तहत विश्व दुग्ध दिवस के मौके पर राष्ट्रीय कृषि विज्ञान भवन दिल्ली में पहाड़ी व उत्तर पूर्व क्षेत्र के राष्ट्रीय गोपाल रत्न से सम्मान दिया गया था।