Literature Festival: बच्चों को मोबाइल और कार्टून चैनलों से दूर रखने के लिए बाल साहित्य जरूरी, शिमला साहित्य उत्सव में युवा लेखकों ने रखी मांग
गेयटी थियेटर के मुख्य सभागार में शनिवार सुबह 10:00 बजे आयोजित सत्र में ‘मैं क्यों लिखता हूं या लिखती हूं’ विषय को लेकर चर्चा करते हुए बच्चों को मोबाइल फोन और कार्टून चैनलों से दूर रखने के लिए बाल साहित्य पर अधिक बल देने को लेकर विशेष प्रयास करने की बात कही गई।
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अंतरराष्ट्रीय साहित्य उत्सव ‘उन्मेष’ के अंतिम दिन शनिवार को राजधानी शिमला के ऐतिहासिक गेयटी थियेटर में युवा लेखकों ने साहित्य के भविष्य को लेकर मंथन किया। गेयटी थियेटर के मुख्य सभागार में शनिवार सुबह 10:00 बजे आयोजित सत्र में ‘मैं क्यों लिखता हूं या लिखती हूं’ विषय को लेकर चर्चा करते हुए बच्चों को मोबाइल फोन और कार्टून चैनलों से दूर रखने के लिए बाल साहित्य पर अधिक बल देने को लेकर विशेष प्रयास करने की बात कही गई। गोवा कोंकणी अकादमी का युवा चैतन्य पुरस्कार और साहित्य अकादमी का युवा पुरस्कार प्राप्त करने वाली लेखिका अन्वेषा सिंगबल ने कहा कि आज के बदलते दौर के बीच बच्चों को मोबाइल फोन और कार्टून चैनल से दूर रखने के लिए बाल साहित्य जरूरी है। आज के दौर में बच्चों को साहित्य से जोड़ने के लिए बाल साहित्य पर काम करना प्राथमिकता होनी चाहिए।
बच्चों की रुचि को पहचान कर उनके लिए साहित्य लिखना चाहिए। अन्वेषा ने कहा कि कोंकणी भाषा आज भी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। तेलुगु कवयित्री, लेखिका और नाटककार मर्सी मार्गरेट ने कहा कि मैं लेखन इसलिए करती हूं कि आने वाली पीढ़ी को मनोबल मिलता रहे। गुजराती कवयित्री और साहित्यिक समालोचक दर्शिनी दादावाला ने मृत्यु के बाद भी अस्तित्व को जीवित रखने के लिए लेखन का तर्क दिया। उन्होंने कहा कि लेख हमेशा जीवित रहते हैं, उन्हें लिखने वाले चाहे रहें या न रहें। लेखक, अनुवादक और समालोचक अंकित नरवाल ने कहा कि मैं अनेकता में एकता के लिए लिखता हूं। इस अवसर पर कथाकार और साहित्यिक आलोचक आशुतोष और लेखिका नबनीता सेनगुप्ता ने भी अपने विचार रखे।
ज्ञानपीठ अवार्डी चौधरी बोले, डिजिटल युग में प्रकाशकों की कमी
सत्र की अध्यक्षता करते हुए ज्ञानपीठ और साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त करने वाले उपन्यासकार, कवि और समालोचक रघुवीर चौधरी ने कहा कि डिजिटल युग में लेखकों के लिए प्रकाशकों का टोटा हो गया है। आदिवासी लेखकों का कहना है कि उन्हें प्रकाशक नहीं मिलते हैं। मैं बताना चाहता हूं कि आज के डिजिटल युग में प्रकाशक तो अन्य लेखकों को भी नहीं मिल रहे हैं। जिस तरह से सोशल मीडिया सहित अन्य डिजिटल प्लेटफार्म पर लेखन का कार्य हो रहा है, इससे प्रकाशन भी प्रभावित हुआ है।
अष्टभुजा शुक्ल बोले- विलुप्त नहीं हो सकती कबीर की कविता
कबीर की कविता कभी विलुप्त नहीं हो सकती। पाठ लिपियां विलुप्त भी हो जाएं तो खंजड़ियों में सुरक्षित रहेंगी। अंतरराष्ट्रीय साहित्य उत्सव ‘उन्मेष’ कार्यक्रम में गेयटी के सभाकक्ष में बहुभाषी कविता पाठ में अष्टभुजा शुक्ल ने यह बात कही। उन्होंने बताया कि कबीर का पंजाबी, राजस्थानी और भोजपुरी में भी पाठ हैं। अष्टभुजा शुक्ल हिंदी कवि और लेखक है। लाल शुक्ल स्मृति इफ्को साहित्य सम्मान, केदारनाथ अग्रवाल सम्मान, परिवेश सम्मान, माटी रत्न सम्मान और महाराजा चक्रधर सम्मान पुरस्कारों से सम्मानित किए जा चुके है। उन्होंने बताया कि कविता के बिना हमारा जीवन उसर है। क्योंकि कविता हमारी सोच, भावना एवं अनुभव को सजाती है। कविता सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का सर्वाधिक समृद्ध रूप है। यह किसी पहाड़ की चोटी पर नहीं विराजती, बल्कि प्रत्येक के उदय में प्रवाहित होती है। चूंकि कविता शब्दों के रूप में सार्वभौमिक अनुभव है, इसलिए निरक्षर भी इसे समझ सकते हैं। उनकी ‘पक्की फसल के कटने का उतना दुख नहीं, जितना कि कच्ची फसल को काटकर खेतों में रखा जाता है’ कविता सभाकक्ष में मौजूद लोगों को खूब पसंद आई। इस अवसर पर प्रकाश चंद, प्रवासिनी महाकुड, सत्यनारायण स्नेही और विनोद कुमार भावुक ने कविता पाठ किया।
राम रहीम की कहानी सुनाकर फैली गंदगी मिटा गए नंदितेश निलय
गेयटी के सभाकक्ष में बहुभाषी कहानी पाठ के दौरान नंदितेश निलय कहानी लोगों के दिल छू गई। कहानी में बताया गया कि रहीम की गेंद गुम होने के बाद जब राम भी उसे ढूंढ रहा होता है तो बापू की आवाज सुनाई देती है। बापू अपना चश्मा ढूंढ रहा होता है। लेकिन दोनों बच्चे कहते हैं कि यह तब चार्ज होगा जब इसे छूएंगे। लेकिन जादूगर बापू के चश्मे को छूने के बाद भी यह चार्ज नहीं हो पाता। इसके बाद बापू द्वारा राम को हाथ पकड़ते थे व रहीम को कंधा पकड़ने को कहते है। इसके बाद चश्मा चार्ज हो जाता है और द्वेष भावना, क्रूर मानसिकता को खत्म करके देश में फैली गंदगी को साफ करने का संदेश दिया जाता है। इसके अलावा कहानी पाठ की अध्यक्षता कर रहे एसआर हरनोट ने संस्कृत मंत्रालय और साहित्य अकादमी के बेहतर कार्यक्रम के धन्यवाद दिया। वहीं कोविड महामारी में जो साहित्यकार खोए है उन्हें याद किया।
वृतचित्र प्रदर्शन देखने पहुंचे लोग
गेयटी के सभाकक्ष दर्पण: वृत्तचित्र प्रदर्शन किए गए। इन वृतचित्रों को देखने के लिए लोगों की खूब भीड़ उमड़ी। इस दौरान रामधारी सिंह दिनकर, सुनील गंगोपाध्याय, विद्या निवास मिश्र, धर्मवीर भारती, नीमणि फुकन और यू.आर. अनंतमूर्ति के जीवन के बारे में जानकारी दी गई।
कबीर अमेरिका, यूरोप भी कर रहे बहुत अपील : लिंडा हेस
यूएसए से आईं साहित्यकार लिंडा हेस ने कहा कि कबीर ने कभी कुछ नहीं लिखा। उसे बाद में लिखा गया। आज कबीर अमेरिका, यूरोप आदि में बहुत अपील करते हैं। कबीर दास दुनिया में आज भी बहुत प्रासंगिक हैं। वह ‘विदेशी भाषाओं में भारतीय साहित्य विषय’ पर संबोधित कर रही थीं। कवि अभय मौर्य ने भारत और रूस के साहित्य पर बात की। मौर्य ने कहा कि भारत और रूस दोनों ने साहित्य में एक दूसरे से बहुत कुछ लिया है। रूस ने उद्देश्यों को उधार लिया है। रूस में पहला काम 1788 में जर्मन, अंग्रेजी, रूसी आदि में अनुवाद का हुआ है। सबसे पहले भगवद्गीता का अनुवाद किया गया। दूसरा काम रुकोसकी ने नल और दमयंती के अनुवाद का किया है। वह रूसी रोमैंटिसिज्म के प्रवर्तक थे। कई रूसी लेखकों ने भारतीय साहित्य पर लिखा। टोलस्तोय ने भारतीय कथाओं को लिया। उनके पात्रों को रूसी नाम दिए। डेविड पुइग ने कहा कि कई बार किताब के एक जगह से दूसरी तक पहुंचने में सदियां लग जाती हैं तो कई बार बहुत कम वक्त लगता है।
राहुल गांधी को क्या पता था कि उसे ईडी का सामना करना पड़ेगा: सुरेश रितुपर्णा
‘कविता का भविष्य एवं रचना पाठ’ विषय पर परिचर्चा में साहित्यकार सुरेश रितुपर्णा ने चुटकी की कि द्रौपदी को क्या मालूम था कि उसके पांच पति होंगे। यह भी कि चीरहरण होगा। क्या राहुल गांधी को मालूम था कि उसे ईडी का सामना करना पडे़गा। भविष्य का मालूम हो तो वर्तमान को हम ठीक से नहीं जी सकते हैं। हमें चिंता कविता के भविष्य की नहीं, मनुष्य की, मानवीय संवेदना की करनी है। कविता जब एजेंडा बन जाती है तो उसके भविष्य की चिंता वाजिब है। इस सत्र के अध्यक्ष अभिराज राजेंद्र मिश्रा ने कहा कि ऋ ग्वेद में कहा गया है कि ये ब्रह्मांड ईश्वर की बनाई कविता ही है। इसी रचना पर कविता लिखते रहते हैं।