निकाय चुनावों में झटके के बाद अलर्ट मोड पर कांग्रेस: हार की समीक्षा शुरू, अब पंचायत चुनाव पर पार्टी की नजर
निकाय चुनाव में झटके के बाद कांग्रेस हार की समीक्षा कर रही है। पार्टी संगठनात्मक कमियों और फ्लोर मैनेजमेंट पर फोकस करते हुए पंचायत चुनाव की रणनीति तैयार कर रही है।
विस्तार
राजस्थान के निकाय चुनाव में उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाने के बाद अब कांग्रेस ने आगे की रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। पार्टी नेतृत्व एक तरफ हार के कारणों की समीक्षा में जुटा है, वहीं दूसरी तरफ पंचायत चुनाव को लेकर संगठन और चुनावी प्रबंधन को मजबूत करने की कवायद शुरू होने की चर्चा है।
निकाय चुनाव में भाजपा के पास 309 में से सिर्फ 65 निकायेां में बहुमत था लेकिन अंतिम नतीजों तक बीजेपी ने करीब 70 फीसदी यानी लगभग 200 से ज्यादा निकायों में अपने बोर्ड बना लिए। हालांकि वार्डों के स्तर पर दोनों प्रमुख दलों के बीच वोट शेयर का अंतर 1 प्रतिशत से भी कम रहा। इसके बावजूद अध्यक्ष और महापौर के चुनाव में कांग्रेस कई जगह अपनी बढ़त को बोर्ड में तब्दील नहीं कर सकी। इससे पार्टी के भीतर गुटबाजी, पार्षदों को एकजुट रखने और फ्लोर मैनेजमेंट को लेकर सवाल उठे हैं।
हार की रिपोर्ट तैयार कर रही कांग्रेस
प्रदेश कांग्रेस के महासचिव और प्रवक्ता आरसी चौधरी के अनुसार पार्टी निकाय चुनाव में हुई हार की समीक्षा कर रही है। अलग-अलग निकायों के परिणाम और चुनाव प्रबंधन से जुड़े पहलुओं की रिपोर्ट तैयार की जा रही है। पार्टी का कहना है कि पंचायत चुनाव में बेहतर प्रबंधन के साथ भाजपा का मुकाबला किया जाएगा।
कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब यही है कि निकाय चुनाव में सामने आई कमियों को पंचायत चुनाव से पहले कैसे दूर किया जाए। खासतौर पर उन जगहों पर संगठन को सक्रिय करने की जरूरत बताई जा रही है, जहां पार्टी के पार्षदों के बीच तालमेल नहीं बन सका।
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जहां बढ़त थी, वहां भी बोर्ड नहीं बना पाई कांग्रेस
निकाय चुनाव के बाद कांग्रेस के भीतर चर्चा का एक प्रमुख विषय फ्लोर मैनेजमेंट है। अजमेर और पाली जैसे निगमों में वार्डों में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी रही, लेकिन महापौर चुनाव में वह बोर्ड बनाने में कामयाब नहीं हो सकी।
अजमेर में कांग्रेस के 37 और भाजपा के 32 पार्षद थे। तीन निर्दलीय पार्षदों के कांग्रेस में शामिल होने के बाद पार्टी के पास 40 का आंकड़ा था, लेकिन महापौर चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी को 37 वोट मिले और भाजपा प्रत्याशी को 43 वोट मिले।
पाली में भी कांग्रेस 29 पार्षदों के साथ सबसे बड़ी पार्टी थी, जबकि भाजपा के 21 और निर्दलीयों के 15 पार्षद थे। इसके बावजूद महापौर चुनाव में भाजपा प्रत्याशी को 33 वोट मिले और कांग्रेस प्रत्याशी को केवल तीन वोट मिले। कांग्रेस की बागी राजबाला हिंगड़ को 29 वोट मिले। इन परिणामों ने पार्टी के भीतर इस सवाल को मजबूत किया है कि वार्ड चुनाव में मिली बढ़त को अध्यक्ष या महापौर चुनाव तक बरकरार रखने में संगठन कहां चूक गया।
पंचायत चुनाव से पहले फ्लोर मैनेजमेंट पर नजर
कांग्रेस के सामने अब पंचायत चुनाव की चुनौती है। निकाय चुनाव में जिन कमियों की चर्चा हुई, उनमें पार्षदों को एकजुट रखना, निर्दलीयों से संपर्क और स्थानीय स्तर पर नेताओं के बीच समन्वय प्रमुख हैं। पार्टी के भीतर यह भी चर्चा है कि निकाय चुनाव में फ्लोर मैनेजमेंट की जिम्मेदारी काफी हद तक स्थानीय नेताओं पर रही। अब पंचायत चुनाव में प्रदेश स्तर से चुनाव प्रबंधन और स्थानीय संगठन के बीच बेहतर तालमेल बनाने पर जोर दिया जा सकता है।
गुटबाजी पर भी लगाम लगाने की चुनौती
निकाय चुनाव के बाद कांग्रेस के भीतर गुटबाजी का मुद्दा भी फिर सामने आया है। पार्टी नेताओं और राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे चुनावी प्रदर्शन से जोड़कर देखा है। ऐसे में पंचायत चुनाव से पहले कांग्रेस के लिए केवल उम्मीदवार चयन ही नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर नेताओं और कार्यकर्ताओं को एकजुट रखना भी अहम होगा।
पार्टी अब निकाय चुनाव की हार की समीक्षा के जरिए यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि किन सीटों पर संगठन कमजोर रहा, कहां फ्लोर मैनेजमेंट में चूक हुई और किन जगहों पर स्थानीय नेताओं के बीच तालमेल की कमी का असर परिणाम पर पड़ा।