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यहां धुलण्डी पर लगता है बादशाह दरबार
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
Updated Sun, 12 Mar 2017 11:52 AM IST
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सोनार दुर्ग में लगा बादशाह दरबार
- फोटो : amar ujala
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जैसलमेर में होली के त्योहार पर बादशाह दरबार लगाने की परम्परा सालों से आज भी जारी है। शहर के सोनार दुर्ग पर धुलण्डी के दिन फाग गीतों के बीच बादशाही बरकरार, शहजादा सलामत के जयकारे गूंजते हैं।
जानकारी के अनुसार सोनार दुर्ग स्थित बिल्ला पाड़ा में बादशाह—शहजादा का दरबार लगता है। यह दरबार बिल्कुल पुराने जमाने में लगने वाले दरबारों की तरह ही होता है। इसमें बच्चे, बुजुर्ग और युवा सभी बढ़—चढ़कर हिस्सा लेते हैं। यहां के लक्ष्मीनाथ मंदिर पहुंचकर जब बादशाह से पूछा जाता है कि बादशाह क्या फरमाता है तो बादशाह बना व्यक्ति अपनी श्रद्धानुसार राशि या फिर भोजन प्रसादी देने की घोषणा करता है। बादशाह किसी भी घर के व्यक्ति को बना दिया जाता है। जिस घर का सदस्य बादशाह या शहजादा बनता है, उनके यहां बधाइयोंं का दौर लगा रहता है। इस तरह की होली को देखने सात-समंदर पार से भी सैलानी आते हैं।
दरबार के पीछे की कहानी
किसी बाहरी क्षेत्र से एक व्यास जाति का ब्राह्मण धर्म परिवर्तन के डर से जैसलमेर भाग कर आया था। संयोग से वह दिन होली का अवसर था। जैसलमेर आकर जब उसने पीड़ा बयां कि तो होली पर्व के स्वांग के तौर पर उसे बादशाह बनाकर तख्त पर बिठा दिया। जब ब्राह्मण को खोजने संबंधित क्षेत्र के बादशाह के लोग यहां आए तो उन्होंने सोचा कि ब्राह्मण का धर्म परिवर्तन हो गया है यह सोचकर वे चले गए। जबकि हकीकत में यह होली का स्वांग था। तब से आज तक यहां बादशाही बरकरार, शहजादा सलामत...की परंपरा को हर वर्ष निभाया जाता है।
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जानकारी के अनुसार सोनार दुर्ग स्थित बिल्ला पाड़ा में बादशाह—शहजादा का दरबार लगता है। यह दरबार बिल्कुल पुराने जमाने में लगने वाले दरबारों की तरह ही होता है। इसमें बच्चे, बुजुर्ग और युवा सभी बढ़—चढ़कर हिस्सा लेते हैं। यहां के लक्ष्मीनाथ मंदिर पहुंचकर जब बादशाह से पूछा जाता है कि बादशाह क्या फरमाता है तो बादशाह बना व्यक्ति अपनी श्रद्धानुसार राशि या फिर भोजन प्रसादी देने की घोषणा करता है। बादशाह किसी भी घर के व्यक्ति को बना दिया जाता है। जिस घर का सदस्य बादशाह या शहजादा बनता है, उनके यहां बधाइयोंं का दौर लगा रहता है। इस तरह की होली को देखने सात-समंदर पार से भी सैलानी आते हैं।
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दरबार के पीछे की कहानी
किसी बाहरी क्षेत्र से एक व्यास जाति का ब्राह्मण धर्म परिवर्तन के डर से जैसलमेर भाग कर आया था। संयोग से वह दिन होली का अवसर था। जैसलमेर आकर जब उसने पीड़ा बयां कि तो होली पर्व के स्वांग के तौर पर उसे बादशाह बनाकर तख्त पर बिठा दिया। जब ब्राह्मण को खोजने संबंधित क्षेत्र के बादशाह के लोग यहां आए तो उन्होंने सोचा कि ब्राह्मण का धर्म परिवर्तन हो गया है यह सोचकर वे चले गए। जबकि हकीकत में यह होली का स्वांग था। तब से आज तक यहां बादशाही बरकरार, शहजादा सलामत...की परंपरा को हर वर्ष निभाया जाता है।
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