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गोगाजी मेला: भगवान को खुश करने के लिए खुद को जंजीर से पीटते हैं लोग, जानिए आखिर ऐसा क्यों करते हैं भक्त
Thu, 16 Sep 2021 10:51 AM IST
संजीव कुमार झा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जोधपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जोधपुर
Published by: संजीव कुमार झा
Updated Thu, 16 Sep 2021 10:51 AM IST
सार
राजस्थान के लूणी स्थित गोगाजी मंदिर में इस साल भी नवमी के अवसर पर मेला सा माहौल रहा। मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ नजर आई। बच्चों से लेकर बूढों तक पूजा में लीन नजर आए।
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गोगाजी मेला
- फोटो : social media
विस्तार
राजस्थान के लूणी स्थित गोगाजी मंदिर में इस साल भी नवमी के अवसर पर मेला सा माहौल रहा। मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ नजर आई। बच्चों से लेकर बूढों तक पूजा में लीन नजर आए। इस मेले की मान्यता और भक्तों की भक्ति देखकर लोग हैरान हो जाते हैं। दरअसल देवता को खुश करने के लिए यहां के भक्त और पुजारी ढोल-थाली पर नाचते हुए खुद को जंजीरों से घायल करते हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से लोकदेवता गोगाजी प्रसन्न होते हैं। हर साल भाद्रपद शुक्ल पक्ष नवमी को यह मेला लगता है। इस मेला में गांव एवं दूर-दराज से लोग आते हैं।
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कुछ इस तरह से शुरू होती है पूजा
लोगों ने बताया कि मुख्य पुजारी मंदिर की गद्दी पर बैठकर गेहूं के दानों को अन्य पुजारी पर बरसाते हैं। इसके बाद मैदान में खड़े पुजारी नाचना शुरू कर देते हैं और खुद पर जंजीर से वार करने लगते हैं। वहीं सभी पुजारी जंजीर से खुद को घायल करने को आस्था बताते हैं। पुजारियों ने कहा कि इससे शरीर में कोई दर्द हो या किसी भी तरह की गंभीर बीमारी दूर हो जाती है।
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नौ दिनों तक होती है पूजा
नौ दिन तक गुप्त नवरात्रि के रूप में गोगाजी के पुजारी पूजा पाठ करते हैं। साथ ही नौ दिन व्रत रखकर गोगाजी को प्रसन्न करने के लिए भाद्रपद शुक्ल नवमी को खीर के साथ देसी घी का चूरमा, अफीम घोटकर गोगा जी को भोग लगाया जाता है।
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ऐसे हुआ गोगाजी का जन्म
जन-जन के आराध्य एवं राजस्थान के महापुरुष कहे जाने वाले गोगाजी का जन्म गुरु गोरखनाथ के आशीर्वाद से हुआ था। गोगा जी की मां बाछल देवी निसंतान थीं। संतान प्राप्ति के सभी प्रयत्न करने के बाद भी उनको कोई संतान की प्राप्ति नहीं हुई। एक बार गुरु गोरखनाथ बाछल देवी के राज्य में 'गोगा मेडी' पर तपस्या करने आए। बाछल देवी उनकी शरण में गईं तथा गोरखनाथ ने उनको पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया और साथ में 'गुगल' नामक अभिमंत्रित किया हुआ फल उन्हें प्रसाद के रूप में दिया और आशीर्वाद दिया कि उसका पुत्र वीर तथा नागों को वश में करने वाला तथा सिद्धों का शिरोमणि होगा। इस प्रकार रानी बाछल को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई जिनका नाम गुग्गा रखा गया।