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Jhalawar School Accident: सिस्टम की लापरवाही ने निगल लिए 7 मासूम सपने, आखिर जिम्मेदार कौन?
Fri, 25 Jul 2025 05:27 PM IST
प्रिया वर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, झालावाड़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, झालावाड़
Published by: प्रिया वर्मा
Updated Fri, 25 Jul 2025 05:27 PM IST
सार
राज्य में सरकारी स्कूलों की जर्जर हालत केवल वहां पढ़ने वाले बच्चे और उनके अभिभावक ही जानते हैं, क्योंकि बाकी संबंधितों ने तो शायद इस तरफ से आंखों पर पट्टी ही बांध रखी है। यही कारण है कि शिकायतों के बावजूद झालावाड़ के पिपलोदी गांव के इस स्कूल में कोई सुधार कार्य नहीं हुआ और हादसे में स्कूल में पढ़ने आए सात बच्चे काल का ग्रास बन गए।
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झालावाड़ स्कूल हादसा
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
आज सवेरे झालावाड़ जिले के पिपलोदी गांव में स्कूल की छत गिरने से हुए हादसे ने पूरे राज्य को झकझोर कर रख दिया है। सरकारी स्कूल की छत गिरने से 7 मासूम बच्चों की जान चली गई और 27 से अधिक घायल हुए। यह हादसा सिर्फ एक निर्माण खामी नहीं था, बल्कि व्यवस्थागत लापरवाही की भयावह मिसाल है।
पहले ही दी थी चेतावनी
छत गिरने के बाद घायल बच्चों को अस्पताल लेकर पहुंचे गांव के ही व्यक्ति बनवारी ने बताया कि छत से पानी टपकने की शिकायत पांच-छह दिन पहले ही स्कूल प्रशासन को दी गई थी, लेकिन स्कूल प्रशासन ने यह कहकर कि गांव वाले ही ये काम करें, अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया। यदि समय रहते शिकायत पर कार्रवाई कर मरम्मत करवा दी जाती, तो शायद आज ये 7 मासूम जिंदा होते।
गौरतलब है कि तीन दिन पहले ही छाबड़ा के तुमड़ा गांव में भी स्कूल भवन गिरा था, जिसकी मरम्मत की मांग विधायक पहले ही कर चुके थे लेकिन शिक्षा विभाग की अनदेखी से यह हादसा हो गया। गनीमत रही कि इस हादसे में किसी की जान नहीं गई।
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ये भी पढ़ें: Rajasthan School Collapse: झालावाड़ में स्कूल की छत गिरने से 8 बच्चों की मौत, 5 शिक्षक निलंबित
जर्जर स्कूल की सूची में नहीं था नाम
मीडिया ने जब जिला कलेक्टर अजयसिंह राठौड़ से इस बारे में जानकारी चाही तो उनका कहना था कि शिक्षा विभाग से जर्जर स्कूलों की सूची मांगी गई थी, लेकिन इस स्कूल का नाम उस सूची में नहीं था। उन्होंने कहा कि चूक कहां हुई है इसकी जांच की जा रही है और दोषियों को इस मामले में बख्शा नहीं जाएगा।
हादसे के बाद स्कूल के सभी 5 शिक्षकों को निलंबित कर दिया गया है। शिक्षा विभाग ने प्रारंभिक लापरवाही को उनकी जिम्मेदारी माना है लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या सिर्फ शिक्षकों पर कार्रवाई पर्याप्त है? क्या बड़ी जिम्मेदारी उस सिस्टम की नहीं, जो स्कूलों की हालत पर सही डाटा नहीं जुटा पा रहा?
डोटासरा ने कहा- सिस्टम की लापरवाही
इधर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने इसे सिस्टम की लापरवाही करार दिया है। उन्होंने कहा कि जब वे शिक्षा मंत्री थे, तब सभी स्कूलों का डाटा शालादर्पण पर अपलोड किया गया था, जिसमें स्कूल की स्थिति, कक्ष संख्या, मरम्मत की जरूरत जैसे बिंदु दर्ज थे। फिर सवाल उठता है कि क्या उस डेटा का कोई उपयोग नहीं किया गया?
ये भी पढ़ें: Rajasthan News: छाबड़ा में तीन दिन पहले गिरा था स्कूल, तब जाग जाते तो झालावाड़ में बच जाती सात मासूमों की जान!
शिक्षा मंत्री झालावाड़ रवाना
वर्तमान शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने हादसे पर गहरी संवेदना जताई है और अपने भरतपुर दौरे के सभी कार्यक्रम रद्द कर झालावाड़ रवाना हो गए हैं। उन्होंने यह स्वीकार किया कि राज्य में हजारों स्कूल बिल्डिंग्स जर्जर हालत में हैं और सरकार ने 200 करोड़ रुपये मरम्मत के लिए जारी किए हैं लेकिन हर स्कूल की मरम्मत तुरंत कर पाना संभव नहीं है।
इस पूरे घटनाक्रम से एक बात साफ है कि यह हादसा पूरे सिस्टम की चूक का परिणाम है। यदि स्कूल प्रशासन ग्रामीणों की चेतावनी को अनदेखा नहीं करता, शिक्षा विभाग ने स्कूल की स्थिति की सही जानकारी रखकर उस दिशा में काम करता तो शायद इन आठ मासूमों और उनके परिवारों को इतने बड़े दुख से दो-चार नहीं होना पड़ता।
इस हादसे की जिम्मेदारी सिर्फ गिरती हुई छत की नहीं, बल्कि उस लचर व्यवस्था की है जो बच्चों की सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सकी। यह केवल एक इमारत की छत नहीं बल्कि उन माता-पिता का भरोसा गिरा है, जो उन्हें सरकारी स्कूलों में अपने बच्चों को भेजते समय होता है। बहरहाल सरकार ने हादसे की जांच का आदेश दे दिया है लेकिन क्या इस बार भी दोषी केवल नीचे के कर्मचारी होंगे या सिस्टम की ऊपरी परतें भी जवाबदारी लेंगी? यह अनुत्तरित है।
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पहले ही दी थी चेतावनी
छत गिरने के बाद घायल बच्चों को अस्पताल लेकर पहुंचे गांव के ही व्यक्ति बनवारी ने बताया कि छत से पानी टपकने की शिकायत पांच-छह दिन पहले ही स्कूल प्रशासन को दी गई थी, लेकिन स्कूल प्रशासन ने यह कहकर कि गांव वाले ही ये काम करें, अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया। यदि समय रहते शिकायत पर कार्रवाई कर मरम्मत करवा दी जाती, तो शायद आज ये 7 मासूम जिंदा होते।
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गौरतलब है कि तीन दिन पहले ही छाबड़ा के तुमड़ा गांव में भी स्कूल भवन गिरा था, जिसकी मरम्मत की मांग विधायक पहले ही कर चुके थे लेकिन शिक्षा विभाग की अनदेखी से यह हादसा हो गया। गनीमत रही कि इस हादसे में किसी की जान नहीं गई।
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जर्जर स्कूल की सूची में नहीं था नाम
मीडिया ने जब जिला कलेक्टर अजयसिंह राठौड़ से इस बारे में जानकारी चाही तो उनका कहना था कि शिक्षा विभाग से जर्जर स्कूलों की सूची मांगी गई थी, लेकिन इस स्कूल का नाम उस सूची में नहीं था। उन्होंने कहा कि चूक कहां हुई है इसकी जांच की जा रही है और दोषियों को इस मामले में बख्शा नहीं जाएगा।
हादसे के बाद स्कूल के सभी 5 शिक्षकों को निलंबित कर दिया गया है। शिक्षा विभाग ने प्रारंभिक लापरवाही को उनकी जिम्मेदारी माना है लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या सिर्फ शिक्षकों पर कार्रवाई पर्याप्त है? क्या बड़ी जिम्मेदारी उस सिस्टम की नहीं, जो स्कूलों की हालत पर सही डाटा नहीं जुटा पा रहा?
डोटासरा ने कहा- सिस्टम की लापरवाही
इधर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने इसे सिस्टम की लापरवाही करार दिया है। उन्होंने कहा कि जब वे शिक्षा मंत्री थे, तब सभी स्कूलों का डाटा शालादर्पण पर अपलोड किया गया था, जिसमें स्कूल की स्थिति, कक्ष संख्या, मरम्मत की जरूरत जैसे बिंदु दर्ज थे। फिर सवाल उठता है कि क्या उस डेटा का कोई उपयोग नहीं किया गया?
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शिक्षा मंत्री झालावाड़ रवाना
वर्तमान शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने हादसे पर गहरी संवेदना जताई है और अपने भरतपुर दौरे के सभी कार्यक्रम रद्द कर झालावाड़ रवाना हो गए हैं। उन्होंने यह स्वीकार किया कि राज्य में हजारों स्कूल बिल्डिंग्स जर्जर हालत में हैं और सरकार ने 200 करोड़ रुपये मरम्मत के लिए जारी किए हैं लेकिन हर स्कूल की मरम्मत तुरंत कर पाना संभव नहीं है।
इस पूरे घटनाक्रम से एक बात साफ है कि यह हादसा पूरे सिस्टम की चूक का परिणाम है। यदि स्कूल प्रशासन ग्रामीणों की चेतावनी को अनदेखा नहीं करता, शिक्षा विभाग ने स्कूल की स्थिति की सही जानकारी रखकर उस दिशा में काम करता तो शायद इन आठ मासूमों और उनके परिवारों को इतने बड़े दुख से दो-चार नहीं होना पड़ता।
इस हादसे की जिम्मेदारी सिर्फ गिरती हुई छत की नहीं, बल्कि उस लचर व्यवस्था की है जो बच्चों की सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सकी। यह केवल एक इमारत की छत नहीं बल्कि उन माता-पिता का भरोसा गिरा है, जो उन्हें सरकारी स्कूलों में अपने बच्चों को भेजते समय होता है। बहरहाल सरकार ने हादसे की जांच का आदेश दे दिया है लेकिन क्या इस बार भी दोषी केवल नीचे के कर्मचारी होंगे या सिस्टम की ऊपरी परतें भी जवाबदारी लेंगी? यह अनुत्तरित है।
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