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राजस्थान: डॉ. मनस्वी अग्रवाल ने रचा इतिहास, एवरेस्ट फतह के बाद दोनों पैरों की अंगुलियां गंवाने की नौबत
Fri, 16 Oct 2026 10:23 PM IST
जयपुर ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
Published by: जयपुर ब्यूरो
Updated Fri, 16 Oct 2026 10:23 PM IST
सार
राजस्थान की डॉ. मनस्वी अग्रवाल ने माउंट एवरेस्ट फतह कर इतिहास रचा, लेकिन वापसी का सफर उनके लिए बेहद दर्दनाक रहा। फ्रॉस्टबाइट के कारण उनके पैरों की छह अंगुलियां गंभीर रूप से प्रभावित हुईं। जानिए माउंट आबू से शुरू होकर दुनिया की सबसे ऊंची चोटियों तक पहुंचने वाली मनस्वी की संघर्ष और साहस की कहानी।
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डॉ. मनस्वी अग्रवाल
विस्तार
हर मन में एक पहाड़ होता है और सबसे बड़ा पहाड़ अपने मन का होता है। उसे जीत लिया तो दुनिया का हर पहाड़ जीता जा सकता है। इसी सोच के साथ उदयपुर की डॉ. मनस्वी अग्रवाल ने मई 2026 में दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर तिरंगा फहराया। वह एवरेस्ट फतह करने वाली राजस्थान की पहली आम महिला पर्वतारोही बनीं। उनसे पहले प्रदेश की तीन महिलाओं ने यह उपलब्धि हासिल की थी, लेकिन वे सेना, अर्धसैनिक बल या सरकारी संस्थानों से जुड़ी थीं।
एवरेस्ट से उतरते समय हुआ फ्रॉस्टबाइट
मनस्वी का एवरेस्ट अभियान बेहद चुनौतीपूर्ण रहा। चढ़ाई पूरी करने के बाद उतरते समय उन्हें फ्रॉस्टबाइट हुआ। दोनों पैरों की छह अंगुलियां बुरी तरह प्रभावित हुईं और पैर काटने तक की नौबत आ गई। काठमांडू के नॉर्विक अस्पताल में डॉक्टरों ने जब पूछा कि चोट लगने के बावजूद वह कितनी दूर चलीं, तो उन्होंने बताया कि करीब 20 घंटे में 30 किलोमीटर चली थीं। यह सुनकर डॉक्टर भी हैरान रह गए। फिलहाल वह जूते नहीं पहन पा रही हैं और सैंडल में आराम महसूस करती हैं।
अभियान में साथ गए दो पर्वतारोहियों की मौत
इस अभियान के दौरान उनके साथ गए दो पर्वतारोहियों की भी मौत हो गई। हैदराबाद के अरुण सर चोटी पर उनसे करीब आधा घंटे पीछे थे। उतरते समय पता चला कि वे वहीं रह गए। आंध्र प्रदेश के संदीप सर भी कैंप-2 तक साथ रहे, लेकिन रेस्क्यू के प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। मनस्वी बताती हैं कि उन्होंने दोनों के साथ करीब 50 दिन बिताए थे। दोनों उनका छोटी बहन की तरह ख्याल रखते थे।
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नौ महीने में पांच बड़ी चोटियां फतह कीं
अगस्त 2025 से मई 2026 के बीच नौ महीनों में मनस्वी ने एल्ब्रुस, किलिमंजारो, विन्सन मैसिफ, अकोंकागुआ और एवरेस्ट फतह किया। वह विन्सन मैसिफ तक पहुंचने वाली राजस्थान की पहली शख्सियत भी हैं। अंटार्कटिका में माइनस 40 से 50 डिग्री तापमान, तेज हवाओं और 60 किलो के स्लेज के साथ अभियान पूरा करना उनके सबसे कठिन अनुभवों में रहा।
माउंट आबू से शुरू हुआ पर्वतारोहण का सफर
मनस्वी ने माउंट आबू में रॉक क्लाइंबिंग से शुरुआत की। इसके बाद अरुणाचल प्रदेश में बेसिक माउंटेनियरिंग का प्रशिक्षण लिया और दार्जिलिंग के हिमालयन माउंटेनियरिंग इंस्टीट्यूट में 6,500 मीटर की ऊंचाई तक पहुंचने की तैयारी की। जून 2025 में उन्होंने यूजीसी नेट असिस्टेंट प्रोफेसरशिप क्वालीफाई किया था और उनकी पीएचडी भी लगभग पूरी हो चुकी थी। परिवार ने उनके जुनून को आगे बढ़ाने में सहयोग किया। एवरेस्ट अभियान पर करीब 35 लाख रुपये खर्च हुए।
मुख्यमंत्री ने किया सम्मानित, अब डेनाली पर नजर
15 अगस्त को मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने बीकानेर में उन्हें राज्य स्तरीय सम्मान दिया। मनस्वी कहती हैं कि शरीर सीमाएं तय नहीं करता, मन मजबूत हो तो शरीर को साथ ले जाया जा सकता है। अब उनका लक्ष्य डेनाली और ऑस्ट्रेलिया की चोटी पर पहुंचना है। इसके साथ ही वह चाहती हैं कि पर्वतारोहियों के लिए बेहतर रेस्क्यू कानून बनाए जाएं, ताकि भविष्य में किसी और पर्वतारोही को ऐसी परेशानी का सामना न करना पड़े।
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एवरेस्ट से उतरते समय हुआ फ्रॉस्टबाइट
मनस्वी का एवरेस्ट अभियान बेहद चुनौतीपूर्ण रहा। चढ़ाई पूरी करने के बाद उतरते समय उन्हें फ्रॉस्टबाइट हुआ। दोनों पैरों की छह अंगुलियां बुरी तरह प्रभावित हुईं और पैर काटने तक की नौबत आ गई। काठमांडू के नॉर्विक अस्पताल में डॉक्टरों ने जब पूछा कि चोट लगने के बावजूद वह कितनी दूर चलीं, तो उन्होंने बताया कि करीब 20 घंटे में 30 किलोमीटर चली थीं। यह सुनकर डॉक्टर भी हैरान रह गए। फिलहाल वह जूते नहीं पहन पा रही हैं और सैंडल में आराम महसूस करती हैं।
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अभियान में साथ गए दो पर्वतारोहियों की मौत
इस अभियान के दौरान उनके साथ गए दो पर्वतारोहियों की भी मौत हो गई। हैदराबाद के अरुण सर चोटी पर उनसे करीब आधा घंटे पीछे थे। उतरते समय पता चला कि वे वहीं रह गए। आंध्र प्रदेश के संदीप सर भी कैंप-2 तक साथ रहे, लेकिन रेस्क्यू के प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। मनस्वी बताती हैं कि उन्होंने दोनों के साथ करीब 50 दिन बिताए थे। दोनों उनका छोटी बहन की तरह ख्याल रखते थे।
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नौ महीने में पांच बड़ी चोटियां फतह कीं
अगस्त 2025 से मई 2026 के बीच नौ महीनों में मनस्वी ने एल्ब्रुस, किलिमंजारो, विन्सन मैसिफ, अकोंकागुआ और एवरेस्ट फतह किया। वह विन्सन मैसिफ तक पहुंचने वाली राजस्थान की पहली शख्सियत भी हैं। अंटार्कटिका में माइनस 40 से 50 डिग्री तापमान, तेज हवाओं और 60 किलो के स्लेज के साथ अभियान पूरा करना उनके सबसे कठिन अनुभवों में रहा।
माउंट आबू से शुरू हुआ पर्वतारोहण का सफर
मनस्वी ने माउंट आबू में रॉक क्लाइंबिंग से शुरुआत की। इसके बाद अरुणाचल प्रदेश में बेसिक माउंटेनियरिंग का प्रशिक्षण लिया और दार्जिलिंग के हिमालयन माउंटेनियरिंग इंस्टीट्यूट में 6,500 मीटर की ऊंचाई तक पहुंचने की तैयारी की। जून 2025 में उन्होंने यूजीसी नेट असिस्टेंट प्रोफेसरशिप क्वालीफाई किया था और उनकी पीएचडी भी लगभग पूरी हो चुकी थी। परिवार ने उनके जुनून को आगे बढ़ाने में सहयोग किया। एवरेस्ट अभियान पर करीब 35 लाख रुपये खर्च हुए।
मुख्यमंत्री ने किया सम्मानित, अब डेनाली पर नजर
15 अगस्त को मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने बीकानेर में उन्हें राज्य स्तरीय सम्मान दिया। मनस्वी कहती हैं कि शरीर सीमाएं तय नहीं करता, मन मजबूत हो तो शरीर को साथ ले जाया जा सकता है। अब उनका लक्ष्य डेनाली और ऑस्ट्रेलिया की चोटी पर पहुंचना है। इसके साथ ही वह चाहती हैं कि पर्वतारोहियों के लिए बेहतर रेस्क्यू कानून बनाए जाएं, ताकि भविष्य में किसी और पर्वतारोही को ऐसी परेशानी का सामना न करना पड़े।