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राजस्थान निकाय चुनाव: कम कुर्सियां, ज्यादा दावेदार... बगावत में बड़े शहरों से क्यूं आगे निकले छोटे कस्बे?

Fri, 04 Sep 2026 04:15 PM IST
Sourabh Bhatt न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर Published by: Sourabh Bhatt Updated Fri, 04 Sep 2026 04:15 PM IST
सार

राजस्थान निकाय चुनाव में छोटे कस्बे बड़े सियासी रणक्षेत्र बन गए हैं। कम वार्डों पर ज्यादा दावेदारों ने BJP-कांग्रेस के सामने बागियों को साधने की चुनौती बढ़ा दी है।

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Rajasthan Civic Polls: Smaller Towns Witness Bigger Political Battle as Fewer Wards Draw More Candidates
निकाय चुनाव:

विस्तार

राजस्थान के निकाय चुनाव में इस बार सियासी मुकाबले का एक अलग ही चेहरा सामने आया है। आमतौर पर बड़े शहरों को चुनावी घमासान का केंद्र माना जाता है, लेकिन नामांकन के आंकड़े बता रहे हैं कि सबसे ज्यादा राजनीतिक गर्मी छोटे कस्बों में है। कम वार्ड वाले निकायों में टिकट के दावेदारों की संख्या इतनी ज्यादा है कि कई जगह एक-एक वार्ड में छह से आठ तक उम्मीदवार मैदान में हैं। करौली की सूरोठ, झुंझुनू की खेतड़ी और अलवर की राजगढ़ जैसी नगर पालिकाओं में मुकाबले की यह तस्वीर जयपुर, जोधपुर, कोटा और उदयपुर जैसे बड़े नगर निगमों से भी ज्यादा दिलचस्प है।

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सूरोठ में हर वार्ड पर आठ दावेदार

करौली जिले की सूरोठ नगर पालिका इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। महज 20 वार्ड वाले इस निकाय में 156 प्रत्याशी मैदान में हैं। यानी औसतन हर वार्ड में करीब आठ उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं। प्रदेश में प्रति वार्ड उम्मीदवारों का औसत करीब 3.8 है। इस लिहाज से सूरोठ में मुकाबला प्रदेश के औसत से दोगुने से भी ज्यादा है। झुंझुनू की खेतड़ी नगर पालिका में 25 वार्ड हैं और 188 प्रत्याशी मैदान में हैं। यहां भी एक वार्ड पर साढ़े सात से ज्यादा उम्मीदवार हैं। अलवर की राजगढ़ नगर पालिका में 40 वार्डों के लिए 294 प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे हैं। यानी यहां भी प्रति वार्ड सात से ज्यादा दावेदार हैं।

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बड़े शहरों में दावेदारी का दबाव कम

दिलचस्प बात यह है कि बड़े नगर निगमों में तस्वीर इससे अलग है। कोटपूतली-बहरोड़ की कोटपूतली नगर परिषद में 60 वार्डों पर 428 प्रत्याशी हैं। यानी प्रति वार्ड सात से ज्यादा उम्मीदवार। भरतपुर नगर निगम में 65 वार्डों पर 401 प्रत्याशी हैं और प्रति वार्ड करीब 6.2 उम्मीदवार हैं।

इसके बाद जयपुर जैसे बड़े नगर निगम में प्रतिस्पर्धा का औसत नीचे आ जाता है। जयपुर के 150 वार्डों में 723 प्रत्याशी हैं, यानी प्रति वार्ड 4.8 उम्मीदवार। बीकानेर में यह आंकड़ा 4.7, अजमेर में 4.5 और जोधपुर में करीब 3.9 है। कोटा में भी प्रति वार्ड करीब 3.7 उम्मीदवार हैं। सबसे कम प्रतिस्पर्धा उदयपुर में दिखाई देती है। यहां 80 वार्डों के लिए 220 प्रत्याशी हैं, यानी एक वार्ड पर औसतन सिर्फ 2.75 उम्मीदवार।

आखिर छोटे कस्बों में इतनी बगावत क्यों?
वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक मनीष गोधा का कहना है कि छोटे कस्बों में ज्यादा प्रत्याशियों के खड़े होने की 3 बड़ी वजह समझ आती है। पहली यह कि इनमें से ज्यादातर नगर पालिकाएं पुनर्गठन के बाद नई बनी हैं। अब तक वहां पंचायतों के चुनाव होते थे। पहली बार शहरी चुनाव हो रहे हैं इसलिए छोटी जगहों पर इन चुनावों को लेकर ज्यादा उत्साह है। 
दूसरी वजह यह है कि पार्टियों का फोकस बड़े निकायों में बगावत थामने पर ज्यादा रहता है क्योंकि वहां एक-एक वार्ड में जीत-हार से पूरे राज्य में नरेटिव सेट होता है। इस बार पूरे प्रदेश के 309 निकायों में चुनाव एक साथ हैं इसलिए पार्टियों को छोटे कस्बों की बगावत को लेकर ज्यादा चिंता नहीं है क्योंकि इन चुनावों में दलबदल कानून लागू नहीं होता। इसलिए अगर कोई बागी जीत भी जाता है तो उसे बात में पार्टी में शामिल कर लिया जाता है। 



इसके अलावा यहां चुनाव का आधार अक्सर पार्टी से ज्यादा व्यक्ति, परिवार, जातीय समीकरण और स्थानीय पकड़ बन जाते हैं। जिस नेता को पार्टी टिकट नहीं देती, उसके पास निर्दलीय उतरने का विकल्प खुला रहता है। वार्ड छोटे हैं, मतदाताओं से सीधा संपर्क है और उम्मीदवार अपनी व्यक्तिगत पहचान के दम पर चुनाव लड़ सकता है। यही वजह है कि टिकट नहीं मिलने पर स्थानीय नेता बड़े शहरों की तुलना में ज्यादा आसानी से बगावत का रास्ता चुन लेते हैं।

छोटे निकायों में एक टिकट कई दावेदारों की उम्मीद तोड़ता है

छोटे निकायों में वार्डों की संख्या सीमित होने के कारण टिकट की संख्या भी कम होती है। ऐसे में एक टिकट के लिए कई दावेदार पहले से सक्रिय रहते हैं। पार्टी जब एक नाम पर मुहर लगाती है तो बाकी दावेदारों के पास दो ही रास्ते बचते हैं, या तो पार्टी के साथ रहें या फिर निर्दलीय मैदान में उतर जाएं। इस बार बड़ी संख्या में निर्दलीय उम्मीदवारों का मैदान में उतरना इसी स्थानीय असंतोष का संकेत माना जा रहा है।

 

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