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BJP ने बागियों पर कसा शिकंजा, कांग्रेस ने थामी ‘मनुहार’: चुनाव से पहले एक्शन या चुनाव बाद का कनेक्शन?

Tue, 08 Sep 2026 08:33 AM IST
Sourabh Bhatt न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर Published by: Sourabh Bhatt Updated Tue, 08 Sep 2026 08:33 AM IST
सार

राजस्थान निकाय चुनाव में भाजपा ने बागियों पर कार्रवाई तेज कर दी है, जबकि कांग्रेस समझाइश में जुटी है। कांग्रेस के नरम रुख के पीछे चुनाव बाद की सियासी गणित मानी जा रही है।

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Congress Chooses Reconciliation: Action Before Polls or Strategy for the Post-Poll Power Game?
निकाय चुनाव - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पार्टी के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष के जयपुर दौरे के बाद बीजेपी तो बागियों को लेकर ताबड़तोड़ एक्शन में आ गई। लेकिन कांग्रेस इसके उलट सिर्फ समझाइश और समझौते ही काम चला रही है। बीजेपी ने जहां बागियों की सूची जारी कर उन्हें पार्टी से निष्कासित कर रही है वहीं कांग्रेस में  निकाय चुनाव अनुशासन समिति के चेयरमैन विधायक अमीन कागजी का कहना है कि पार्टी में अभी तक किसी अधिकृत प्रत्याशी ने बागियों के खिलाफ शिकायत नहीं की है। उनका कहना है कि शिकायत मिलने पर बागियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। पार्टी सूत्रों के अनुसार राजधानी जयपुर में कांग्रेस में 100 से ज्यादा बागियों के मैदान में होने का दावा किया जा रहा है। लेकिन इनमें से किसी पर भी अब तक कोई एक्शन नहीं हुआ है।

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डोटासरा ने कहा था- 6 साल का निष्कासन होगा

बागियों को लेकर कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने नामांकन वापसी के दौरान सख्त रुख अपनाने का दावा किया था। उन्होंने कहा था कि जो बागी चुनाव मैदान से नहीं हटेगा, उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी और उसे छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित किया जाएगा। अब चुनाव प्रचार का पहला चरण खत्म होने और मतदान करीब आने के बावजूद बड़े पैमाने पर कार्रवाई नहीं होने से पार्टी के भीतर ही सवाल उठ रहे हैं। खास तौर पर भाजपा की कार्रवाई सामने आने के बाद दोनों दलों की रणनीति की तुलना भी शुरू हो गई है।

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यह भी पढें- राजस्थान निकाय चुनाव: पहले चरण का प्रचार थमा, अब डोर-टू-डोर संपर्क का दौर

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कांग्रेस का तर्क- पहले समझाइश, फिर कार्रवाई

कांग्रेस प्रवक्ता स्वर्णिम चतुर्वेदी का कहना है कि बागियों से अभी समझाइश की जा रही है। प्रदेश और जिला स्तर के नेता उन्हें चुनाव मैदान से हटने और पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी के समर्थन में आने के लिए समझा रहे हैं। पार्टी ने जिला कांग्रेस कमेटियों को भी निर्देश दिए हैं कि पहले बागियों को मनाया जाए। इसके बाद भी अगर वे पार्टी प्रत्याशी के खिलाफ चुनाव लड़ते या प्रचार करते हैं तो कार्रवाई की जाए। पार्टी का दावा है कि कुछ जगहों पर कार्रवाई की भी गई है।


असली वजह चुनाव बाद की ‘गणित’?

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक कांग्रेस के नरम रुख के पीछे सिर्फ समझाइश की रणनीति नहीं, बल्कि चुनाव के बाद बनने वाले बोर्ड की राजनीति भी हो सकती है। निकाय चुनाव में पार्षदों की संख्या बहुमत से कम रहने पर बोर्ड बनाने के लिए निर्दलीय पार्षदों का समर्थन निर्णायक हो सकता है। कांग्रेस के सामने यह संभावना है कि उसके टिकट से नाराज होकर निर्दलीय चुनाव लड़ने वाले कुछ नेता अगर जीत जाते हैं तो बाद में बोर्ड बनाने में पार्टी के काम आ सकते हैं। ऐसे में चुनाव से पहले उन्हें छह साल के लिए निष्कासित करने से पार्टी भविष्य की राजनीतिक संभावनाएं कमजोर नहीं करना चाहती। यही वजह है कि फिलहाल ‘कार्रवाई’ से ज्यादा ‘समझाइश’ पर जोर दिखाई दे रहा है।

 

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