बांसवाड़ा निकाय का दिलचस्प इतिहास: आरक्षण की लॉटरी ने बदले समीकरण, 25 साल में किसी को नहीं मिली दोबारा कुर्सी
आरक्षण की लॉटरी ने बांसवाड़ा नगर परिषद की सियासत का इतिहास ही बदल दिया है। पिछले छह चुनाव में कोई भी पूर्व निकाय प्रमुख दोबारा कुर्सी तक नहीं पहुंच सका। अब पहली बार एसटी वर्ग का सभापति चुना जाएगा, जिससे इस बार मुकाबला और भी दिलचस्प हो गया है।
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बांसवाड़ा के नगरीय निकाय का इतिहास कई रोचक राजनीतिक घटनाओं से जुड़ा रहा है। यहां अब तक दो ऐसे मौके आए, जब एक ही व्यक्ति अलग-अलग वर्षों में दो बार निकाय प्रमुख बना। हालांकि पिछले छह चुनाव में लॉटरी से तय आरक्षण व्यवस्था के कारण किसी भी पूर्व अध्यक्ष या सभापति को दोबारा इस पद पर आने का मौका नहीं मिला। इस बार पहली दफा शहर को एसटी वर्ग का सभापति मिलेगा।
1904 में बनी थी नगर पालिका
बांसवाड़ा में नगर पालिका का गठन 1904 में हुआ था। समय के साथ इसका दर्जा बदलता गया और वर्ष 2012 में नगर पालिका को नगर परिषद में क्रमोन्नत किया गया। आजादी के बाद 1948 में करणसिंह कोठारी बांसवाड़ा नगर पालिका के पहले अध्यक्ष बने। 1948 से 1981-82 तक के उपलब्ध निकाय इतिहास में सवाईलाल गुप्ता और दिनकरलाल मेहता दो ऐसे नाम हैं, जिन्होंने अलग-अलग कार्यकाल में दो बार अध्यक्ष पद संभाला।
फोटो: दिनकरलाल मेहता और सवाईलाल गुप्ता
सवाईलाल गुप्ता पहली बार 9 अप्रैल 1958 को अध्यक्ष बने और 31 मार्च 1965 तक इस पद पर रहे। उनका पहला कार्यकाल करीब 6 साल 11 महीने 22 दिन का रहा। इसके बाद उन्होंने 28 अक्टूबर 1976 से 6 अगस्त 1977 तक फिर अध्यक्ष पद संभाला। इसी तरह दिनकरलाल मेहता पहली बार 21 जून 1966 से 20 जून 1969 और दूसरी बार 16 अक्टूबर 1971 से 10 दिसंबर 1973 तक अध्यक्ष रहे। लंबे कार्यकाल की बात करें तो तत्कालीन पालिकाध्यक्ष छगनलाल नेमा का कार्यकाल भी करीब 6 साल 11 महीने 19 दिन रहा।
दो बार बने कार्यवाहक अध्यक्ष
बांसवाड़ा निकाय में दो बार कार्यवाहक अध्यक्ष की व्यवस्था भी बनी। पहली बार 16 सितंबर 1971 से 15 अक्टूबर 1971 तक लाल मोहम्मद को कार्यवाहक अध्यक्ष बनाया गया। इसके करीब 28 साल बाद 28 मई 1999 से 1 जून 1999 तक नगर पालिका उपाध्यक्ष रमेशचंद्र पंवार ने कार्यवाहक अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली। वे इस पद पर पांच दिन रहे। उस समय तत्कालीन अध्यक्ष मणिलाल बोहरा को राज्य सरकार ने पद से हटा दिया था। बोहरा ने न्यायालय की शरण ली और अदालत ने सरकार के आदेश पर रोक लगा दी। इसके बाद 2 जून 1999 को बोहरा ने दोबारा अध्यक्ष पद संभाल लिया।
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लॉटरी से बदलते रहे आरक्षण के समीकरण
वर्ष 1994 से अब तक हुए चुनावों पर नजर डालें तो किसी भी अध्यक्ष या सभापति को दूसरी बार निकाय का मुखिया बनने का मौका नहीं मिला। अलग-अलग चुनावों में आरक्षण की लॉटरी के चलते पद की श्रेणी बदलती रही।
| वर्ष | निकाय प्रमुख | पद |
|---|---|---|
| 1994 | मणिलाल बोहरा | अध्यक्ष |
| 1999 | उमेश पटियात | अध्यक्ष |
| 2004 | कृष्णा कटारा | अध्यक्ष |
| 2009 | राजेश टेलर | सभापति |
| 2014 | मंजूबाला पुरोहित | सभापति |
| 2019 | जैनेन्द्र त्रिवेदी | सभापति |
लगातार छह चुनाव में आरक्षण की लॉटरी के कारण पूर्व निकाय प्रमुखों को दोबारा मौका नहीं मिला। इस बार आरक्षण के बाद पहली बार बांसवाड़ा में एसटी वर्ग का सभापति चुना जाएगा, ऐसे में इस चुनाव का राजनीतिक महत्व और बढ़ गया है।
दो बार महिलाओं के हाथ रही कमान
बांसवाड़ा निकाय में अब तक दो बार महिलाओं ने भी अध्यक्ष या सभापति के रूप में नगर की कमान संभाली है। कृष्णा कटारा 4 दिसंबर 2004 से 29 नवंबर 2009 तक नगर पालिका अध्यक्ष रहीं। वे बांसवाड़ा की पहली महिला नगर पालिका अध्यक्ष बनीं। बाद में वे जिला परिषद सदस्य भी रहीं। उन्होंने पिछले विधानसभा चुनाव में बागीदौरा से चुनाव लड़ा था लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद मंजूबाला पुरोहित ने 4 दिसंबर 2014 से 2019 तक सभापति के रूप में निकाय की कमान संभाली। वे बांसवाड़ा की पहली महिला सभापति रहीं।
बांसवाड़ा के निकाय इतिहास में अध्यक्ष पद का बदलता आरक्षण और लॉटरी व्यवस्था लगातार राजनीतिक समीकरण तय करती रही है। इस बार एसटी आरक्षण के चलते पुराने राजनीतिक चेहरों के बजाय नए दावेदारों के सामने आने की संभावना है।