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Ajmer : इमाम हुसैन की याद में नंगी तलवारों के साथ खेला हाईदौस, पूरे भारत में केवल अजमेर में ही होता है यह खेल
Wed, 17 Jul 2024 04:38 PM IST
प्रिया वर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अजमेर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अजमेर
Published by: प्रिया वर्मा
Updated Wed, 17 Jul 2024 04:38 PM IST
सार
हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत की याद में आज मोहर्रम के अवसर पर अजमेर में नंगी तलवारों के साथ हाईदौस खेला गया। पूरे एशिया में केवल अजमेर और पाकिस्तान के हैदराबाद में ही यह खेल खेला जाता है।
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राजस्थान
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
मुस्लिम समुदाय के लोग आज हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत को याद करके मोहर्रम मना रहे हैं। ख्वाजा की नगरी, अजमेर में रहने वाले वाले मुस्लिम समुदाय के लोगों ने आज नंगी तलवारों से हाईदौस खेलकर इमाम हुसैन के प्रति अपनी अकीदत पेश की।
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डोले शरीफ के जुलूस के दौरान निभाई जाने वाली इस खास परंपरा के लिए खुद अजमेर का पुलिस प्रशासन सैकड़ों लोगों को तलवारें मुहैया करवाता है और इसे खेले जाने के दौरान कई लोग तलवार की चोट से गंभीर रूप से जख्मी भी हो जाते हैं लेकिन कोई भी न तो कोई शिकवा करता है और ना ही पुलिस में मुकदमा दर्ज करवाया जाता है बल्कि घायल हुए लोग इसे अपनी खुशकिस्मती मानते हैं।
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बीते पांच सौ सालों से चली आ रही इस परंपरा की खास बात यह है कि अजमेर का पुलिस प्रशासन खुद हाईदौस खेलने वाले लोगों को 100 तलवारें मुहैया करवाता है। माना जाता है कि आज के दिन कर्बला की पहाड़ियों में इस्लाम की रक्षा करने के दौरान हजरत इमाम हुसैन और उनके सैकड़ों साथियों को शहीद कर दिया गया था। उन्हीं की याद में अजमेर में हाईदौस खेला जाता है, जिसके तहत सैकड़ों लोग हाथों में तलवार थामे सिर्फ इस भावना से हाईदौस खेलते हैं कि काश वे भी उस समय मौजूद होते तो इमाम हुसैन से पहले अपनी जान न्योछावर कर देते।
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खास बात यह है कि समूचे एशिया में तलवारों से हाईदौस खेलकर कर्बला की जंग का मंजर पेश किए जाने की यह परंपरा केवल दो ही जगह निभाई जाती है एक तो अजमेर में और दूसरा पाकिस्तान के हैदराबाद शहर में। आपको बता दें कि हाईदौस केवल अन्दरकोट कोटियान पंचायत समाज के लोग ही खेलते हैं। इस परंपरा की सबसे अच्छी बात यह है कि इसे खेलने के दौरान यदि कोई जख्मी भी हो जाता है तो वह चोट लगने के बाद किसी तरह की कोई दुश्मनी नहीं पालता और ना ही पुलिस में शिकायत दर्ज करवाता है।
इसके लिए पुलिस प्रशासन की तरफ से भी खास सुरक्षा के प्रबंध किए जाते हैं। तोपों की गरज से शुरू होने वाले इस खेल मे सैकड़ों लोग हिस्सा लेते हैं, जो ढोल और ताशों की मातमी धुन के बीच डोले शरीफ की सवारी को अपने कंधों पर उठाकर सैराब करने के लिए निकल पड़ते हैं।