दावा: यूक्रेन में अब भी फंसे हैं 5000 मेडिकल स्टूडेंट्स, भाषा और रास्तों को न जानने के कारण नहीं निकल पा रहे
छात्रों का कहना है कि केंद्र सरकार को चाहिए कि रूस से बातचीत करके वहां फंसे भारतीयों को रूस के रास्ते से देश वापस लाए, क्योंकि खारकीव से रूस केवल 35 किलोमीटर दूर है। वहीं पौलेंड 1200 किलोमीटर दूर है।
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यूक्रेन में अब भी करीब पांच हजार मेडिकल स्टूडेंट्स फंसे हैं। इनमें से ज्यादातर एमबीबीएस पहले व दूसरे साल के विद्यार्थी हैं। नए होने के कारण वहां की भाषा व रास्तों को अच्छे से नहीं जानते हैं, इस कारण उन्हें वहां से निकलने में ज्यादा परेशानियां हो रही हैं। यह कहना है पटियाला के नाभा निवासी मेडिकल छात्र चंदन का, जिन्होंने कईं दिन तक दहशत के साये में रहने के बाद सही सलामत घर वापसी की है।
चंदन ने बताया कि जिस तरह से केंद्र सरकार ने मिशन गंगा के तहत उनकी घर वापसी कराई है। उसी तरह से यूक्रेन में फंसे बाकी विद्यार्थियों को भी जल्द देश वापस लाया जाए। ताकि उनकी जानों को भी बचाया जा सके। चंदन साल 2018 में एमबीबीएस करने यूक्रेन गए थे। जैसे ही वह घर पहुंचे, तो पिता सतपाल व मां रेखा रानी ने दौड़ कर उन्हें गले लगा लिया।
रूस की ओर से हमला करने से पहले ही देश वापस न लौटने के बारे में चंदन ने कहा कि उनकी ऑफलाइन क्लासें लगती थीं, जिस कारण उन्हें अपनी क्लासें लगानी पड़ती थीं।। क्लास न लगाने पर वहां जुर्माना लगाने के साथ-साथ दूसरे दिन क्लास में बैठने नहीं दिया जाता है।
रूस के रास्ते स्टूडेंट्स की वतन वापसी यकीनी बनाए केंद्र
चंदन ने कहा कि केंद्र सरकार को चाहिए कि रूस से बातचीत करके वहां फंसे भारतीयों को रूस के रास्ते से देश वापस लाए, क्योंकि खारकीव से रूस केवल 35 किलोमीटर दूर है। वहीं पौलेंड 1200 किलोमीटर दूर है। ऐसे में खारकीव, सुमी बगैरा में फंसे स्टूडेंट्स को कईं-कईं दिन तक भूखे प्यासे रहकर व काफी पैदल चलकर पौलेंड तक रास्ता तय करना पड़ रहा है। इस दौरान स्टूडेंट्स हर पल दहशत के साये में भी रहते हैं। इसलिए केंद्र को इस तरफ ध्यान देना चाहिए।
कई किमी पैदल चल कर मुश्किल से पौलेंड बार्डर पर पहुंचे-अर्जुन
पटियाला की पंजाबी यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. हरीश कुमार के बेटे अर्जुन ने भी चंदन के साथ ही घर वापसी की है। इस मौके पर अर्जुन ने कहा कि वह खारकीव में एमबीबीएस चौथे साल का विद्यार्थी है। उसने वहां के खराब हालात को देखते हुए 20 फरवरी को वापसी की टिकट बुक करा दी थी और 24 की फ्लाइट थी। 23 फरवरी की रात को उसके समेत करीब 150 विद्यार्थी फ्लाइट पकड़ने को कीव की तरफ रवाना हुए। 24 फरवरी की सुबह 8 बजे जब वह लोग वहां पहुंचे, तो हालात काफी खराब हो चुके थे। उन्हें आगे नहीं जाने दिया गया था। वह सभी पांच दिन तक बंकरों में भूखे प्यासे रहे। कभी अगर खाना आता था, तो इतना कम होता था कि एक प्लेट को छह लोगों में बांटना पड़ता था। इस दौरान लगातार बमबारी से सभी दहशत में थे। छठे दिन किसी तरह से हिम्मत करके बाहर निकले और कईं किलोमीटर पैदल चलते हुए व बाद में स्थानीय लोगों की मदद से पौलेंड पहुंचे। जिसके बाद केंद्र सरकार की मदद से घर वापसी हो सकी।