ऑपरेशन विजय: बाजू और टांग में लगी थीं गोलियां, आखिरी सांस तक दुश्मनों से भिड़े थे लांस नायक गुरमेल सिंह
लांस नायक गुरमेल सिंह की शहादत के वक्त उनका बेटा महज छह महीने का था। अब वह 23 साल का हो चुका है और पिता के नक्शे कदम पर चलते हुए वह भी फौज में भरती होकर देश की सेवा करना चाहता है।
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ऑपरेशन विजय में शहादत का जाम पीने वाले पटियाला के गांव घडामा कलां के रहने वाले पंजाब रेजीमेंट तीन के लांस नायक गुरमेल सिंह ने गोलियां लगी होने के बावजूद अपनी आखिरी सांस तक दुश्मनों के खिलाफ लड़ाई जारी रखी। शहीद की पत्नी जसबीर कौर ने बताया कि 14 मई 1998 को दुश्मनों से लोहा लेते हुए एक गोली गुरमेल सिंह के दायीं बाजू और दूसरी गोली दायीं टांग में लगी। जख्मों से काफी खून बह रहा था।
बावजूद इसके गुरमेल सिंह ने साथियों को कहा कि वह उनकी चिंता न करें और मोर्चा संभाले रखें। गुरमेल ने अपनी पगड़ी उतारी और खून के रिसाव को रोकने के लिए फाड़कर अपनी बाजू व टांग पर बांध ली और फिर दुश्मनों पर टूट पड़े। जसबीर कौर ने बताया कि बाद में जब फायरिंग कम हुई, तो गुरमेल सिंह को चिकित्सा सेवा मुहैया कराई गई, लेकिन खून ज्यादा निकलने के कारण वह शहीद हो गए । जसबीर कौर बताती हैं कि उनके पति गुरमेल सिंह ने अपनी यूनिट में सबसे पहले शहादत पाई थी।
जिस दिन फूल चुगने की रस्म थी, उस दिन पहुंचा पति का लिखा खत
जसबीर कौर ने बताया कि जिस दिन उनके पति गुरमेल सिंह के फूल चुगने की रस्म थी, उस दिन उनके यूनिट का एक जवान पति का लिखा खत लेकर गांव पहुंचा। दरअसल यह खत पति ने कारगिल युद्ध शुरू होने से कुछ दिन पहले लिखा था और इसे छुट्टी जा रहे अपने एक यूनिट के साथी को उन्हें देने के लिए कहा था। यह फौजी उनके गांव के नजदीक ही रहता था। पहुंचने के बाद जैसे ही उसे लांस नायक गुरमेल सिंह के शहीद होने के बारे में पता चला, तो उसके पैरों तले से जमीन निकल गई। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि अभी सात-आठ दिन पहले तो गुरमेल सिंह ठीक-ठाक था। जसबीर कौर ने बताया कि जैसे ही कारगिल युद्ध शुरू हुआ, उनके पति की यूनिट ने मोर्चा संभाल लिया था।
बेटा भी फौज में जाकर देश की सेवा करना चाहता है
पिता गुरमेल सिंह की शहादत के वक्त उनका बेटा महज छह महीने का था। अब वह 23 साल का हो चुका है और पिता के नक्शे कदम पर चलते हुए वह भी फौज में भरती होकर देश की सेवा करना चाहता है। जसबीर कौर ने बताया कि पति के अलावा उनके पिता अमरजीत सिंह भी फौज में थे, जो हवालदार पद से सेवानिवृत हुए हैं। इसलिए शुरू से ही परिवार में देश प्रति सेवा का जज्बा रहा है। अब वही संस्कार उनके बेटे में भी हैं। जसबीर ने बताया कि बेटा देशभक्ति से जुड़ी फिल्में देखता हैं। अकसर पिता की बहादुरी के किस्से उनसे सुनता है। बेटा भी यही चाहता है कि फौज में भरती होकर पिता का नाम रोशन करे।
कड़ी मेहनत से तहसीलदार के पद पर पहुंची शहीद की पत्नी
जसबीर कौर ने बताया कि पति की शहादत के समय उनकी शादी को केवल ढाई साल हुए थे। पहले तो लगा कि सब कुछ छिन गया है, लेकिन फिर हिम्मत करते हुए पंजाब सरकार की ओर दी सीनियर असिस्टेंट की नौकरी करते अपने बेटे को पालने लगी। नौकरी करते हुए ग्रेजुएशन पूरी की और फिर तरक्की के लिए परीक्षा दी। आज वह मोहाली में तहसीलदार के पद पर तैनात हैं। बस अब वाहेगुरु से ही यही चाहती हूं कि बेटा भी फौज में जाकर देश की सेवा करे।
32 साल की उम्र में शहीद हुए बेटे की शहादत पर गर्व
3 अक्तूबर 2000 को राजपुरा के नायक जसविंद्र सिंह महज 32 साल की उम्र में शहीद हो गए। वह अपने पीछे मां-बाप, पत्नी, दो बेटियां और एक नव जन्मे बेटे को छोड़ गए थे। जब शहीद का बेटा हरदीप सिंह 19 साल का हुआ तो वह भी अपने पिता की 17-सिख रेजीमेंट में भर्ती हो गया। 21 वर्ष बीत गए, लेकिन बुजुर्ग मां-बाप को अपने बेटे की कुर्बानी पर आज भी नाज है। कहते हैं कि बेटे ने देश की खातिर कर्तव्य निभाया है। जब भी कारगिल विजय दिवस मनाया जाएगा तो बेटे को पूरा देश याद करेगा।कारगिल युद्ध में शहीद हुए नायक जसविंद्र सिंह के पिता जगतार सिंह व माता अमर कौर मूल रूप से राजपुरा के नजदीकी गांव मोही खुर्द जिला पटियाला निवासी हैं। जसविंद्र सिंह सेना में जाने के 12 साल बाद देश के लिए शहीद हो गए थे। माता-पिता ने अपने बेटे की शहीदी को समर्पित घर की छत पर विशाल प्रतिमा लगवाई है। परिवार के लोग 26 जुलाई व शहीद के जन्म दिन पर फूल मालाओं के साथ उनका सम्मान करते हैं।