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आफत: बारिश से चार दिन पहले आसमान देता है खतरे का इशारा... हिमाचल और पंजाब में तबाही पर वैज्ञानिकों का खुलासा
Wed, 03 Sep 2025 02:53 PM IST
शाहरुख खान
चैतन्य ठाकुर, अमर उजाला, मोहाली
चैतन्य ठाकुर, अमर उजाला, मोहाली
Published by: शाहरुख खान
Updated Wed, 03 Sep 2025 02:53 PM IST
सार
हिमाचल प्रदेश और पंजाब में हो रही तबाही पर वैज्ञानिकों ने खुलासा किया है। बारिश से चार दिन पहले आसमान खतरे का इशारा देता है। आईआईएसईआर मोहाली के वैज्ञानिकों की खोज से यह खुलासा हुआ है।
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पंजाब में बाढ़
- फोटो : संवाद
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विस्तार
जब कुदरत का कहर बरसता है तो गांव के गांव बह जाते हैं... लेकिन सवाल यह है कि ये तबाही आती क्यों है? हर साल जुलाई-अगस्त में जब हिमाचल, उत्तराखंड या जम्मू-कश्मीर जैसे पहाड़ी राज्य बाढ़ और भूस्खलन की चपेट में आते हैं तब लोगों के मन में एक ही सवाल उठता है कि ये बारिश इतनी खतरनाक कैसे हो जाती है? इसका जवाब वैज्ञानिकों ने ढूंढ निकाला है।
पंजाब के मोहाली में स्थित भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान (आईआईएसईआर) के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. राजू अट्टाडा और वैज्ञानिक डॉ. रोहताश सैनी ने हिमालय में होने वाली भीषण बारिश की घटनाओं के पीछे छिपे मौसमीय रहस्यों को उजागर किया है।
ये रिसर्च अमेरिका के प्रसिद्ध जर्नल ऑफ जियोफिजिकल रिसर्च एटमॉस्फियर्स में प्रकाशित हुई है। इसके अनुसार ओमेगा नाम का सिस्टम है जो बारिश से 4 दिन पहले आसमान में बनता है और खतरे का इशारा करता है।
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वैज्ञानिक डॉ. राजू अट्टाडा बताते हैं कि बारिश की शुरुआत से चार दिन पहले आसमान में एक खास तरह का वायुमंडलीय अवरोध बनता है। यह पैटर्न बिल्कुल ग्रीक अक्षर जैसा दिखता है। इसके कारण नमी से भरी हवा अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से उतरी हिमालय की तरफ जाती है।
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पंजाब के मोहाली में स्थित भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान (आईआईएसईआर) के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. राजू अट्टाडा और वैज्ञानिक डॉ. रोहताश सैनी ने हिमालय में होने वाली भीषण बारिश की घटनाओं के पीछे छिपे मौसमीय रहस्यों को उजागर किया है।
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ये रिसर्च अमेरिका के प्रसिद्ध जर्नल ऑफ जियोफिजिकल रिसर्च एटमॉस्फियर्स में प्रकाशित हुई है। इसके अनुसार ओमेगा नाम का सिस्टम है जो बारिश से 4 दिन पहले आसमान में बनता है और खतरे का इशारा करता है।
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वैज्ञानिक डॉ. राजू अट्टाडा बताते हैं कि बारिश की शुरुआत से चार दिन पहले आसमान में एक खास तरह का वायुमंडलीय अवरोध बनता है। यह पैटर्न बिल्कुल ग्रीक अक्षर जैसा दिखता है। इसके कारण नमी से भरी हवा अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से उतरी हिमालय की तरफ जाती है।
यही हवा वहां जाकर तेज ऊपर उठती है और गहरे बादल बनते हैं जो भारी बारिश का कारण बनते हैं। शोधकर्ताओं ने साल 1979 से 2020 तक के मौसम के आंकड़ों का बारीकी से विश्लेषण किया। उन्होंने पाया कि जब बारिश का स्तर 99वें प्रतिशत से ऊपर चला जाता है, तब उसे चरम वर्षा घटना (एक्सट्रीम रेन इवेंट्स) माना जाता है।
नमी, गर्मी और हवाओं का खतरनाक मेल
इस क्षेत्र में बारिश के समय निचले स्तर की हवाओं में जबरदस्त नमी का जमावड़ा होता है। ऊपर जाने के साथ-साथ वातावरण में डायबेटिक हीटिंग यानी तेज गर्मी होती है जो बादलों को और ताकतवर बना देती है। 92% चरम वर्षा की घटनाएं इसी कारण होती हैं। हिमाचल के कई हिस्सों में आजकल ऐसा ही देखने को मिल रहा है।
इस क्षेत्र में बारिश के समय निचले स्तर की हवाओं में जबरदस्त नमी का जमावड़ा होता है। ऊपर जाने के साथ-साथ वातावरण में डायबेटिक हीटिंग यानी तेज गर्मी होती है जो बादलों को और ताकतवर बना देती है। 92% चरम वर्षा की घटनाएं इसी कारण होती हैं। हिमाचल के कई हिस्सों में आजकल ऐसा ही देखने को मिल रहा है।
वैज्ञानिक डॉ. राजू का कहना है कि ये भीषण बारिश सिर्फ भारत के अंदरूनी मौसम से नहीं बनती बल्कि दूर-दराज के बाह्य-उष्णकटिबंधीय सिस्टम्स जब मानसूनी सिस्टम से टकराते हैं तब भी ऐसी स्थिति बनती है।
समय रहते दी जा सकती है चेतावनी
डॉ. राजू अट्टाडा बताते हैं शोध सिर्फ वैज्ञानिकों के लिए नहीं बल्कि आम लोगों, प्रशासन और नीति-निर्माताओं के लिए भी बेहद अहम है। अगर ये मौसमी पैटर्न पहले से पहचान लिए जाएं तो भविष्य में समय रहते चेतावनी दी जा सकती है। इससे बाढ़ व भूस्खलन जैसी आपदाओं से जान-माल का नुकसान कम किया जा सकता है। यह शोध जलवायु परिवर्तन के असर को समझने में भी मदद करेगा।
डॉ. राजू अट्टाडा बताते हैं शोध सिर्फ वैज्ञानिकों के लिए नहीं बल्कि आम लोगों, प्रशासन और नीति-निर्माताओं के लिए भी बेहद अहम है। अगर ये मौसमी पैटर्न पहले से पहचान लिए जाएं तो भविष्य में समय रहते चेतावनी दी जा सकती है। इससे बाढ़ व भूस्खलन जैसी आपदाओं से जान-माल का नुकसान कम किया जा सकता है। यह शोध जलवायु परिवर्तन के असर को समझने में भी मदद करेगा।