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किसान बोले- विरोध सियासी, समय बताएगा नए कानून के फायदे-नुकसान

Wed, 30 Sep 2020 02:15 AM IST
Mohali Bureau मोहाली ब्‍यूरो
Updated Wed, 30 Sep 2020 02:15 AM IST
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Farmer said - opposition political, time will tell the advantages and disadvantages of the new law
मोहाली। कृषि क्षेत्र में सुधार के लिए केंद्र सरकार ने तीन नए कानून पारित किए हैं। जिनका विरोध हो रहा है। खासकर पंजाब और हरियाणा के किसान संगठन इन नए सुधार कानूनों को किसान विरोधी बताते हुए सड़कों पर उतर आए हैं। किसानों के जरिये सियासी गणित बैठाने के लिए कांग्रेस और अकाली भी मैदान में हैं। अकालियों ने एनडीए छोड़ नए कानून को किसान विरोधी और खुद को किसान हितैषी करार देने की कोशिश की है। वहीं, आम किसान नए कानूनों पर मिलीजुली प्रतिक्रिया दे रहा है, हालांकि उनका साफ तौर पर मानना है कि विरोध सियासी है।
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प्रतिक्रियाएं
नए कानूनों पर छिड़ी बहस में सियासी फायदे-नुकसान का गणित ज्यादा नजर आ रहा है। नए कानून का असल-असर तो समय के साथ ही पता चलेगा, ऐसे में सिर्फ विरोध के लिए विरोध करना ठीक नहीं है। किसान को देश में कहीं भी अपनी फसल बेचने की आजादी मिल रही है। आप ही सोचिए, क्या आप देश में कहीं भी वेतन कमाने या कारोबार के लिए स्वतंत्रता नहीं चाहेंगे, या फिर केवल राज्य सरकारों द्वारा निर्धारित स्थानों पर केवल बिचौलियों को कमीशन देने के बाद ही अपना माल बेचना चाहेंगे। खेती लाभदायक व्यवसाय नहीं है। सर्वेक्षण बताते हैं कि 42 प्रतिशत किसान खेती छोड़ना चाहते हैं। कोई भी छोटे खेतों से अच्छी आय नहीं कमा सकता है। एमएसपी को लेकर शंका है, जिसे प्रधानमंत्री ने बंद न करने का भरोसा दिया है। एमएसपी जारी रहनी चाहिए, ताकि किसान को फसल की बिक्री की गारंटी मिलती रहे।
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- सर्बजीत सिंह, किसान
प्रतिक्रिया
हम फर्जी खबरों की दुनिया में रह रहे हैं। खेतों के घटते रकबे के कारण अनाज के उत्पादन से अच्छी आमदनी नहीं है, इसलिए छोटे किसान पशुपालन, सब्जियों और फलों की ओर रुख कर रहे हैं। इससे कम जमीन से अधिक आय होती है, लेकिन सब्जियां और फल खराब होते हैं और कछुआ चाल से चलने वाली सरकारी एजेंसियां इसकी खरीद और वितरण सही समय पर नहीं कर पाती। कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग किसानों के लिए नए रास्ते देगी। पिछले दो दशकों में, आईटीसी ने ई-चौपाल स्थापित किए हैं। इलेक्ट्रॉनिक सूचनाओं के साथ खरीद केंद्र किसानों को मंडियों और विदेशी बाजारों में कीमतों को ट्रैक करने में मदद करते हैं। ई-चौपाल 10 राज्यों में काम कर रही हैं, लेकिन अधिकांश किसान इससे अनजान हैं। क्योंकि यह उन किसानों की मदद करता है जो स्वेच्छा से भाग लेते हैं। इस कानून को लेकर सबसे बड़ी आपत्ति यह है कि, यह कानून देर सबेर, न्यूनतम समर्थन मूल्य, यानी एमएसपी की लंबे समय से चली आ रही प्रथा को खत्म कर देगा। जिससे फिर एक बार कृषि उत्पाद के मूल्य निर्धारण का काम किसान और व्यापारियों के बीच रह जाएगा। - निशान सिंह विर्क, किसान
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प्रतिक्रिया
न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएससी) एक मजबूत खरीद और फसलों के रख-रखाव संबंधी सुविधा की नीति है। यह केवल उत्पाद का दाम नहीं है, बल्कि यह सरकार द्वारा किसानों को उनके उत्पाद का न्यूनतम समर्थन मूल्य है, यानी किसान को इतना तो मिलना ही है। सरकार ने 1955 में जमाखोरी रोकने के लिए ईसी एक्ट पारित किया था। अब इसमें भी बदलाव हो गया है। कोई भी पैन कार्ड धारक कितना भी अनाज खरीदे और उसे कहीं भी जमा करके रखे, जब अभाव हो तो बाजार में निकाले, और जब बेभाव होने लगे तो उसे रोक ले। इसका मतलब यह हुआ कि बाजार की दर को किसान की उपज, मेहनत और जरूरत तय नहीं करेगी, बल्कि अनाज की कीमत यही पैन कार्ड धारक व्यापारी, जमाखोरी करने वाले आढ़ती और नए जमींदार कॉरपोरेट तय करेंगे। किसान अपनी ही जमीन पर इन तीनों के बीच मे फंस कर रह जाएगा। सरकार सिर्फ तमाशा देखेगी क्योंकि उसके पास ऐसा कुछ नहीं होगा कि वह बाजार को नियंत्रित कर सके। - गुरमीत सिंह, किसान

प्रतिक्रिया
जिन राज्यों में एपीएमसी एक्ट लागू है, वहां इन मंडियों के बाहर फसल बेचने और खरीदने पर प्रतिबंध है। अब नए कानून के तहत सरकार ने कहा है कि इन मंडियों के बाहर उपज की बिक्री और खरीद पर कोई स्टेट टैक्स नहीं लगेगा। वहीं एपीएमसी मंडियों में टैक्स लगता रहेगा। इसकी वजह से ये आशंका है कि अब व्यापारी एपीएमसी मंडियों के अंदर खरीद नहीं करेंगे और वे किसानों से इसके बाद खरीददारी करेंगे जहां उन्हें टैक्स न देना पड़े। चिंता ये है कि धीरे-धीरे एपीएमसी मंडियां खत्म हो जाएंगी और तब ट्रेडर्स अपने मनमुताबिक दाम पर किसानों से खरीददारी करेंगे, जो एमएसपी से कम होगी। एपीएमसी मंडियों के साथ कई समस्याए हैं, ऐसा नहीं है कि किसान इन मंडियों से बहुत खुश हैं, लेकिन सरकार ये जो नई व्यवस्था ला रही है, उसके कारण जो भी थोड़ी बहुत बेहतर व्यवस्था थी वो खत्म हो जाएगी और किसान व्यापारियों के रहम पर जीने को मजबूर हो जाएगा। अधिकांश किसानों के पास ऐसी व्यवस्था नहीं है कि वो अपने उत्पाद को रोककर रख सके और जब बाजार में कीमत बढ़े, तब उसे बेचे।
- किरनपाल पराशर, किसान
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