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जब मुकदमा पहले ही खारिज हो चुका हो तो ग्रेच्युटी से वसूली जायज नहीं: सुप्रीम कोर्ट
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-पंजाब के एक मामले में शीर्ष कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील स्वीकार की
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सेवानिवृत्त कर्मचारी को दी गई ग्रेच्युटी से राशि की वसूली जायज नहीं है जबकि राज्य प्राधिकारियों की ओर से राशि वापस लेने के लिए दायर एक अलग मुकदमा पहले ही खारिज हो चुका हो।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ कमलेश टुटेजा की अपील को स्वीकार कर लिया जिसमें अपीलकर्ता ने दायर रिट याचिका को देरी और लापरवाही के कारण खारिज कर दिया था।
अपीलकर्ता के अधिवक्ता दुष्यंत पाराशर और मनु पाराशर की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट का यह मानना सही नहीं था कि वर्तमान रिट याचिका में देरी और लापरवाही बरती गई है।
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पीठ ने कहा कि यदि शेष 5,74.280 रुपये की वसूली के लिए तत्कालीन राज्य प्राधिकारियों की ओर से शुरू की गई कार्रवाई हाईकोर्ट ने पहले ही खारिज कर दी है तो अब दोनों पक्षों के बीच यह निष्कर्ष निकला है कि अपीलकर्ता को दी गई ग्रेच्युटी से राशि की वसूली स्वीकार्य नहीं थी। मामले के तथ्यों के अनुसार, जब अपीलकर्ता 30 अप्रैल, 2010 को पंजाब लघु उद्योग एवं निर्यात निगम लिमिटेड के प्रबंधक पद से सेवानिवृत्त हुए, तो अपीलकर्ता ग्रेच्युटी प्राप्त करने का हकदार था। ग्रेच्युटी की अधिकतम सीमा 350 लाख रुपये थी जिसे पंजाब सरकार ने 17 अगस्त, 2009 को पारित एक आदेश से बढ़ाकर 10 लाख रुपये कर दिया गया। सरकार के आदेश के कार्यान्वयन की तिथि को लेकर दोनों पक्षों के बीच विवाद उत्पन्न हुआ।
अपीलकर्ता ने दावा किया कि यह 17 अगस्त, 2009 से प्रभावी हुआ और दूसरी ओर प्रतिवादी-राज्य ने 5 जुलाई, 2010 के आदेश का हवाला देते हुए तर्क दिया कि ग्रेच्युटी की बढ़ी हुई अधिकतम सीमा 24 मई, 2010 से प्रभावी हुई है। सेवानिवृत्ति के समय, अपीलकर्ता को 6.50 लाख रुपये की ग्रेच्युटी राशि का भुगतान किया गया था जिसमें से विवादित राशि 75720 रुपये उसके अन्य देय राशि से वसूल की गई और शेष राशि 574280 रुपये ब्याज सहित के लिए, चंडीगढ़ के सिविल जज (जूनियर डिवीजन) की अदालत में एक अलग वाद दायर किया गया। यह वाद 2015 में एक निर्णय और डिक्री से खारिज कर दिया गया था जिसके विरुद्ध पंजाब की ओर से दायर प्रथम अपील और उसके बाद एक नियमित द्वितीय अपील भी खारिज कर दी गई थी।
इस प्रकार यह अंतिम हो गया कि राज्य प्राधिकारी अपीलकर्ता को भुगतान की गई ग्रेच्युटी से कोई राशि वसूल नहीं कर सकते थे। हाइकोर्ट की एकल पीठ और खंडपीठ ने विलंब और लापरवाही के आधार पर याचिका खारिज कर दी। पीठ ने कहा कि हम इस बात से संतुष्ट हैं कि विलंब और लापरवाही के आधार पर रिट याचिका खारिज करके हाइकोर्ट ने स्पष्ट रूप से गलती की है। वर्तमान रिट याचिका में मुकदमा करने का अधिकार पहली बार 75720 रुपये की वसूली की तारीख को उत्पन्न हुआ था जो सिविल न्यायालय में विचाराधीन रहा और अंततः, नियमित द्वितीय अपील के खारिज होने पर मुकदमे की कार्यवाही के अंतिम रूप लेने पर, यह एक नया कारण बन गया।
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सेवानिवृत्त कर्मचारी को दी गई ग्रेच्युटी से राशि की वसूली जायज नहीं है जबकि राज्य प्राधिकारियों की ओर से राशि वापस लेने के लिए दायर एक अलग मुकदमा पहले ही खारिज हो चुका हो।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ कमलेश टुटेजा की अपील को स्वीकार कर लिया जिसमें अपीलकर्ता ने दायर रिट याचिका को देरी और लापरवाही के कारण खारिज कर दिया था।
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अपीलकर्ता के अधिवक्ता दुष्यंत पाराशर और मनु पाराशर की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट का यह मानना सही नहीं था कि वर्तमान रिट याचिका में देरी और लापरवाही बरती गई है।
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पीठ ने कहा कि यदि शेष 5,74.280 रुपये की वसूली के लिए तत्कालीन राज्य प्राधिकारियों की ओर से शुरू की गई कार्रवाई हाईकोर्ट ने पहले ही खारिज कर दी है तो अब दोनों पक्षों के बीच यह निष्कर्ष निकला है कि अपीलकर्ता को दी गई ग्रेच्युटी से राशि की वसूली स्वीकार्य नहीं थी। मामले के तथ्यों के अनुसार, जब अपीलकर्ता 30 अप्रैल, 2010 को पंजाब लघु उद्योग एवं निर्यात निगम लिमिटेड के प्रबंधक पद से सेवानिवृत्त हुए, तो अपीलकर्ता ग्रेच्युटी प्राप्त करने का हकदार था। ग्रेच्युटी की अधिकतम सीमा 350 लाख रुपये थी जिसे पंजाब सरकार ने 17 अगस्त, 2009 को पारित एक आदेश से बढ़ाकर 10 लाख रुपये कर दिया गया। सरकार के आदेश के कार्यान्वयन की तिथि को लेकर दोनों पक्षों के बीच विवाद उत्पन्न हुआ।
अपीलकर्ता ने दावा किया कि यह 17 अगस्त, 2009 से प्रभावी हुआ और दूसरी ओर प्रतिवादी-राज्य ने 5 जुलाई, 2010 के आदेश का हवाला देते हुए तर्क दिया कि ग्रेच्युटी की बढ़ी हुई अधिकतम सीमा 24 मई, 2010 से प्रभावी हुई है। सेवानिवृत्ति के समय, अपीलकर्ता को 6.50 लाख रुपये की ग्रेच्युटी राशि का भुगतान किया गया था जिसमें से विवादित राशि 75720 रुपये उसके अन्य देय राशि से वसूल की गई और शेष राशि 574280 रुपये ब्याज सहित के लिए, चंडीगढ़ के सिविल जज (जूनियर डिवीजन) की अदालत में एक अलग वाद दायर किया गया। यह वाद 2015 में एक निर्णय और डिक्री से खारिज कर दिया गया था जिसके विरुद्ध पंजाब की ओर से दायर प्रथम अपील और उसके बाद एक नियमित द्वितीय अपील भी खारिज कर दी गई थी।
इस प्रकार यह अंतिम हो गया कि राज्य प्राधिकारी अपीलकर्ता को भुगतान की गई ग्रेच्युटी से कोई राशि वसूल नहीं कर सकते थे। हाइकोर्ट की एकल पीठ और खंडपीठ ने विलंब और लापरवाही के आधार पर याचिका खारिज कर दी। पीठ ने कहा कि हम इस बात से संतुष्ट हैं कि विलंब और लापरवाही के आधार पर रिट याचिका खारिज करके हाइकोर्ट ने स्पष्ट रूप से गलती की है। वर्तमान रिट याचिका में मुकदमा करने का अधिकार पहली बार 75720 रुपये की वसूली की तारीख को उत्पन्न हुआ था जो सिविल न्यायालय में विचाराधीन रहा और अंततः, नियमित द्वितीय अपील के खारिज होने पर मुकदमे की कार्यवाही के अंतिम रूप लेने पर, यह एक नया कारण बन गया।