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Mahatma Gandhi: नमक आंदोलन के दौरान लुधियाना आए थे बापू, चौड़ा बाजार से गोशाला तक किया था दांडी मार्च

Sun, 02 Oct 2022 07:01 AM IST
निवेदिता वर्मा अमित जेतली, संवाद न्यूज एजेंसी, लुधियाना
अमित जेतली, संवाद न्यूज एजेंसी, लुधियाना Published by: निवेदिता वर्मा Updated Sun, 02 Oct 2022 07:01 AM IST
सार

महात्मा गांधी ने तब देशवासियों को एकजुट करने के मकसद से विभिन्न शहरों में पदयात्रा निकाली थी। उन दिनों वह लुधियाना के घंटाघर चौक भी आए थे। गांधी जी ने स्वतंत्रता सेनानियों की टुकड़ी के साथ चौड़ा बाजार से गोशाला तक दांडी मार्च निकाला था।

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Mahatma Gandhi had come to Ghantaghar Chowk in Ludhiana during Namak Andolan
लुधियाना निगम के बाहर लगी महात्मा गांधी की प्रतिमा और सतलुज किनारे बना स्मारक। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी।

विस्तार

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भारतीय स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों के लिए कई बड़े आंदोलन किए थे। उनमें स्वराज और नमक सत्याग्रह आंदोलन सबसे महत्वपूर्ण था। अंग्रेजी शासन में भारतीयों को नमक बनाने का अधिकार नहीं था। भारतीयों को इंग्लैंड से आने वाला नमक ही इस्तेमाल करना पड़ता था। इस पर अंग्रेजी हुकूमत ने कई गुना कर लगा रखा था। इस कर हटाने के लिए महात्मा गांधी ने 12 मार्च 1930 को देश में नमक सत्याग्रह आंदोलन शुरू किया था।

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महात्मा गांधी ने तब देशवासियों को एकजुट करने के मकसद से विभिन्न शहरों में पदयात्रा निकाली थी। उन दिनों वह लुधियाना के घंटाघर चौक भी आए थे। गांधी जी ने स्वतंत्रता सेनानियों की टुकड़ी के साथ चौड़ा बाजार से गोशाला तक दांडी मार्च निकाला था और मार्च के दौरान लोगों को विदेशी सामान का बहिष्कार करने के लिए प्रेरित किया था। फिर वह सड़क मार्ग से होते हुए दिल्ली रवाना हुए थे। लुधियाना शहर की ऐतिहासिक जानकारी रखने वाले लोग बताते हैं कि तब पूरा शहर गांधी जी के दांडी मार्च में शामिल हुआ था। उनके पीछे चल रहे शहरवासी जिंदाबाद के नारे लगाते हुए गोशाला तक आए थे।
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इस इतिहास को याद रखने के लिए घंटाघर चौक के नजदीक मूवमेंट वाली जगह पर महात्मा गांधी की प्रतिमा स्थापित की गई थी। मगर जैसे-जैसे समय गुजरता गया, वैसे- वैसे यादें धुंधली पड़ती गई। अंत में लुधियाना शहर से जुड़ी गांधी जी की ऐतिहासिक मूवमेंट को भुला दिया गया। जब और अधिक समय गुजरा तो महात्मा गांधी की प्रतिमा की जगह भी बदल गई। प्रतिमा की जगह पर मल्टी स्टोरी पार्किंग बन गई और प्रतिमा को हटाकर नगर निगम कार्यालय के सामने बेकार पड़ी जगह पर स्थापित कर दिया गया।
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इतिहास के जानकार बताते हैं कि वर्ष 1962 में पंडित जवाहर लाल नेहरू लुधियाना के दरेसी मैदान में आए थे। उस समय उनको किसी स्वतंत्रता सेनानी ने महात्मा गांधी की ऐतिहासिक मूवमेंट के लुधियाना शहर से जुड़े होने की जानकारी दी थी। फिर उस जगह पर गांधी जी की प्रतिमा स्थापित करवाई गई, मगर मौजूदा समय पर हालात ये हैं कि शहर का हरेक शख्स गांधी जी की प्रतिमा और उसके इतिहास से अंजान है। हालांकि गांधी जयंती के दिन साल में एक बार प्रतिमा की साफ सफाई की जाती है। प्रतिमा को जल की जगह दूध से धोया जाता है। उस दिन निगम अधिकारी और विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के छोटे बड़े नेता गांधी जी की प्रतिमा पर फूल मालाएं चढ़ाकर पूरे साल का फर्ज निभाते हैं। उसके बाद यह प्रतिमा पूरा साल धूल मिट्टी से ढकी रहती है।

सतलुज दरिया किनारे बनाया गांधी स्मारक, रख रखाव करना भूल गए

महात्मा गांधी को देश की नदियों से बेहद लगाव था। यही कारण था कि 30 जनवरी 1948 को निधन के बाद उनकी अस्थियों को अलग-अलग कलशों में रखकर देश की विभिन्न नदियों में प्रवाहित किया गया। उनका मुख्य अस्थि कलश प्रयागराज जिले में गंगा नदी में प्रवाहित किया गया। इसी तरह से एक अस्थि कलश को 12 फरवरी 1948 को सतलुज दरिया में विसर्जित किया गया।

इसके बाद अस्थि विसर्जन वाले स्थान पर गांधी स्मारक बनाया गया, लेकिन इस स्मारक के रख रखाव और ऐतिहासिक महत्व के प्रचार के प्रति किसी भी पार्टी की सरकार ने ज्यादा रुचि नहीं दिखाई। वर्तमान समय पर बहुत कम लोग ऐसे हैं जो कि इस स्मारक के ऐतिहासिक महत्व को जानते हैं। इस स्मारक पर गांधी जी के 11 व्रत सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचार्य, अस्वाद, अस्तेय, अपरिग्रह, अभय, छूआछूत निवारण, सर्व धर्म समभाव और स्वदेशी लिखे हुए हैं। पिछले साल 12 फरवरी 2021 को जालंधर से लोकसभा सांसद संतोख चौधरी ने गांधी स्मारक के नवीनीकरण और सौंदर्यीकरण का नींव पत्थर रखा था, लेकिन डेढ़ साल बीतने के बाद भी हालात नहीं बदले हैं।

महात्मा गांधी की याद में बना प्राकृतिक चिकित्सा केंद्र भी हुआ वीरान

महात्मा गांधी का झुकाव प्राकृतिक चिकित्सा की तरफ भी था। वर्ष 1974 में सतलुज दरिया के पास उनकी याद में एक प्राकृतिक चिकित्सा केंद्र खोला गया था। इसका उद्घाटन तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्ञानी जैल सिंह ने किया था। मगर यह चिकित्सा केंद्र समय के साथ अपग्रेड नहीं होने और रखरखाव की कमी के चलते अपनी ऐतिहासिक पहचान नहीं बचा सका। वर्तमान समय पर चिकित्सा केंद्र को जाने वाले मार्ग पर झाड़ियां और जंगली बूटी उगी हुई है। पेड़ पौधों और झाड़ियों से घिरा चिकित्सा केंद्र देखने में पूरी तरह से वीरान नजर आता है।  

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