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यशपाल शर्मा स्मृतिशेष: रोजगार की तलाश में हिमाचल से लुधियाना आए थे पिता, नहीं चाहते थे बेटा क्रिकेटर बने

Tue, 13 Jul 2021 08:22 PM IST
ajay kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लुधियाना (पंजाब)
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लुधियाना (पंजाब) Published by: ajay kumar Updated Tue, 13 Jul 2021 08:22 PM IST
सार

लुधियाना क्रिकेट एसोसिएशन के प्रधान सतीश कुमार ने बताया कि लगभग 25 दिन पहले ही उनकी फोन पर बात हुई थी। यशपाल ने परिवार और अन्य दोस्तों का हालचाल पूछा। मुझे यकीन नहीं हो रहा कि दिल का दौरा पड़ सकता है। क्योंकि क्रिकेट के साथ वह एक अच्छे एथलीट भी थे। फिटनेस का हमेशा ख्याल रखते थे।

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Father did not want Yashpal Sharma to become a cricketer
यशपाल शर्मा - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

भारतीय टीम के पूर्व बल्लेबाज यशपाल शर्मा का मंगलवार को सुबह दिल्ली में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया, जिससे लुधियाना में शोक की लहर है। महानगर लुधियाना के रामनगर की गलियों के क्रिकेट खेलकर निकले यशपाल के बारे में उस समय शायद की कोई सोचता होगा कि एक दिन वह भारतीय क्रिकेट टीम का हिस्सा बनेंगे और विश्व कप में अहम भूमिका निभाएंगे। 

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11 अगस्त 1954 को यशपाल शर्मा का जन्म लुधियाना में हुआ था। उनके पिता कचहरी परिसर में अर्जी नवीस का काम करते थे। पिता नहीं चाहते थे कि बेटा क्रिकेट खेले, वह पढ़ाई करने के लिए बेटे पर जोर देते थे। उनकी पांच बहनें और एक बड़ा भाई है। बड़े भाई बाल कृष्ण शर्मा लुधियाना में रहते हैं। यशपाल शर्मा 1990 में अपने परिवार के साथ दिल्ली शिफ्ट हो गए थे। 
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यशपाल शर्मा का परिवार हिमाचल से जुड़ा है। उनका पुश्तैनी घर आज भी गांव जखेड़ा महतपुर जिला ऊना (हिमाचल) में है। पिता लुधियाना में रोजगार के लिए आए थे, इसलिए यहीं बस गए। मंगलवार को अचानक देहांत की खबर सुन उनके दोस्तों को यकीन नहीं हो पाया कि वह अब उनके बीच नहीं रहे। 

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बड़े भाई बाल कृष्ण शर्मा फौज से रिटायर्ड हैं, जैसे उन्हें भाई के देहांत की खबर मिली वह इस कदर गमगीन दिखे कि कुछ बोल ही नहीं पा रहे थे। उन्होंने इतना कहा कि पिता जी नहीं चाहते थे कि यशपाल क्रिकेट खेले। उनकी इच्छा थी कि यशपाल पढ़ाई कर बड़ा अफसर बने। लेकिन वह उसके जुनून को जानते थे, इसलिए हर समय मदद करते थे।

1979 तक उन्होंने यशपाल को कभी चाय तक नहीं पीने दी थी। जब हैदराबाद में एक टूर्नामेंट हुआ तो उसमें यशपाल क्वार्टर फाइनल, सेमीफाइनल और फाइनल में मैन ऑफ द मैच रहे। पूरी बात उन्होंने अपने पिता के सामने रखी, तब उनके पिता भी समझ गए कि इसमें क्रिकेट के प्रति अलग ही जुनून है।

1979 में जब भारतीय क्रिकेट टीम के साथ इंग्लैंड के दौरे पर गए तो वहां पर अन्य खिलाड़ियों को खाने के लिए नॉनवेज दिया जाता था लेकिन यशपाल एक जूस का गिलास ही पीते थे। उस समय यह बात होती थी कि भारतीय टीम में कोई ब्राह्मण भी है।1 982 में उनके पिता का निधन हो गया था। 1983 का विश्व कप जीतने के बाद लुधियाना पहुंचने पर उनका जोरदार स्वागत हुआ था। 

क्रिकेट के प्रति अलग ही जुनून था यशपाल में 
लुधियाना क्रिकेट एसोसिएशन के प्रधान सतीश कुमार बताते हैं कि वह बचपन से ही यशपाल के साथ रहे हैं। शुरू से ही उन्हें क्रिकेट खेलने का एक जुनून था। पुरानी यादें ताजा कर सतीश कुमार ने बताया कि स्कूल के बाद क्रिकेट खेलने का शौक था। लुधियाना में पिच ज्यादा अच्छी नहीं होती थी, इसलिए मैट पर प्रैक्टिस करने का शौक था। 

वह खुद ग्राउंड में जाकर बिना किसी की सहायता लिए खुद मैट उठाकर लाते, उसे पिच पर सेट कर प्रैक्टिस करते थे। एक बार चंडीगढ़ में पंजाब का कैंप चल रहा था, इस कैंप में यशपाल लेट पहुंचे। कोच ने आदेश दिया कि रनिंग शुरू कर दो। इसके बाद कोच रनिंग बंद करने की बात कहना भूल गए। लगभग डेढ़ घंटे बाद उन्हें याद आया तो देखा कि यशपाल रनिंग किए जा रहे थे।

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