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Ludhiana News: संत लोंगोवाल की बरसी पर गुटों में बंटा अकाली दल, पंथक सियासत को मिलेगी नई दिशा
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::बरसी पर विशेष::
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-बादल ने प्रतिष्ठा का सवाल बनाया, अकाली सुधार लहर को धार देने की रहेगी कोशिश
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सुशील कुमार
सुनाम ऊधम सिंह वाला। मरहूम संत हरचंद सिंह लोंगोवाल की बरसी (20 अगस्त) पर भी शिरोमणि अकाली दल गुटों में बंट गया है। शिअद और बागी गुट अलग-अलग आयोजन कर उन्हें श्रद्धांजलि देंगे। यह आयोजन सूबे में अकाली दल की पंथक सियासत को नई दिशा दे सकता है।
सत्तापक्ष समेत तमाम सियासी दलों की नजरें इस बरसी समारोह पर टिक गई हैं। बरसी समारोह के जरिये एक तरफ शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल शक्ति प्रदर्शन करेंगे। वहीं, सुखबीर के नेतृत्व को चुनौती दे रहे बागी अकाली नेता अकाली सुधार लहर को नई धार देने की कोशिश में हैं। दोनों पक्ष, बरसी समागम की तैयारी में जुटे रहे हैं और भीड़ एकत्रित करने के लिए काफी मशक्कत की जा रही है। इससे सूबे में ठंडी पड़ी अकाली सियासत एकदम तेज हो गई है। पंजाब में शांति बहाली के लिए शहादत देने वाले संत हरचंद सिंह लोंगोवाल की पुण्यतिथि ही अकाली सियासत का अखाड़ा बनती प्रतीत हो रही है।
नाराज अकाली नेता, बरसी समारोह में ज्यादा से ज्यादा भीड़ जुटाकर सुखबीर बादल को चुनौती देने की कोशिश में हैं। प्रो. प्रेम सिंह चंदूमाजरा, सुरजीत सिंह रखड़ा, परमिंदर सिंह ढींडसा, बलदेव सिंह मान, गगनदीप सिंह बरनाला आदि बागी गुट की कमान संभाले हुए हैं। सुखबीर बादल को चुनौती देने वाले अकाली नेताओं के कड़े मिजाज को साफ तौर पर देखा जा सकता है। ये नेता इस बार आर-पार की लड़ाई के मूड में दिखाई दे रहे हैं।
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सियासी जानकार मान रहे हैं कि अकाली दल के नेतृत्व को बदलने की मांग करने वाले नेताओं का लक्ष्य एक तीर से कई निशाने साधना है। जानकार मानते हैं कि अकाली सुधार लहर को प्रचंड करने, पंथक एजेंडे पर पहरा देने का हवाला देकर सुखबीर बादल के दावे को कमजोर करना और अकाली दल बादल से ज्यादा भीड़ जुटाकर उन्हें कमजोर साबित करने की कोशिश करेंगे। वे अकाली एजेंडे के जरिये ही बादल को मात देना चाहते हैं।
दूसरी तरफ सुखबीर बादल और उनके समर्थकों ने बरसी को अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया है। बादल ने बरसी को व्यापक स्तर पर मनाने के आदेश दिए हैं। पार्टी संत लोंगोवाल की बरसी समागम में ज्यादा से ज्यादा भीड़ एकत्रित करके बागियों को कड़ा संदेश देना चाहती है। इसी के मद्देनजर बादल दल के नेताओं ने पूरा जोर लगा दिया है। नाराज नेताओं को स्वार्थी बताते हुए लोगों से बरसी समारोह में शामिल होने की अपील की गई है।
20 अगस्त, 1985 को हुई थी लोंगोवाल की हत्या
संत लोंगोवाल 1980 के आतंकवाद के दौर के समय शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष थे। 20 अगस्त, 1985 को संत लोंगोवाल की संगरूर के शेरपुर में हत्या कर दी गई थी। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी से 24 जुलाई, 1985 को पंजाब के हितों को लेकर समझौता किया था, जिसे राजीव-लोंगोवाल समझौते का नाम दिया गया था। शिरोमणि अकाली दल लंबे समय से शहीद संत लोंगोवाल की बरसी मनाता आ रहा है। कैप्टन अमरिंदर सिंह की सरकार में कांग्रेस भी बरसी मनाती रही है। आप सरकार ने भी बरसी पर रक्तदान शिविर का आयोजन किया था। इस बार अकाली दल के अध्यक्ष से नाराज नेता अलग तौर पर बरसी की तैयारी कर रहे हैं। बहरहाल, संत लोंगोवाल को श्रद्धांजलि अर्पित करने के मकसद से हर साल बरसी मनाई जाती है और अकाली दल, अन्य दलों को जमकर कोसता रहा है, लेकिन पहली बार अकाली नेता एक दूसरे के खिलाफ शब्दों के तीर चलाएंगे। देखना होगा कि कुंद पड़ी अकाली सियासत को बरसी, तीखी धार दिला पाएगी अथवा नहीं।
-संवाद
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- फोटो । तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी से समझौता करते संत लोंगोवाल की फाइल फोटो ।
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-बादल ने प्रतिष्ठा का सवाल बनाया, अकाली सुधार लहर को धार देने की रहेगी कोशिश
सुशील कुमार
सुनाम ऊधम सिंह वाला। मरहूम संत हरचंद सिंह लोंगोवाल की बरसी (20 अगस्त) पर भी शिरोमणि अकाली दल गुटों में बंट गया है। शिअद और बागी गुट अलग-अलग आयोजन कर उन्हें श्रद्धांजलि देंगे। यह आयोजन सूबे में अकाली दल की पंथक सियासत को नई दिशा दे सकता है।
सत्तापक्ष समेत तमाम सियासी दलों की नजरें इस बरसी समारोह पर टिक गई हैं। बरसी समारोह के जरिये एक तरफ शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल शक्ति प्रदर्शन करेंगे। वहीं, सुखबीर के नेतृत्व को चुनौती दे रहे बागी अकाली नेता अकाली सुधार लहर को नई धार देने की कोशिश में हैं। दोनों पक्ष, बरसी समागम की तैयारी में जुटे रहे हैं और भीड़ एकत्रित करने के लिए काफी मशक्कत की जा रही है। इससे सूबे में ठंडी पड़ी अकाली सियासत एकदम तेज हो गई है। पंजाब में शांति बहाली के लिए शहादत देने वाले संत हरचंद सिंह लोंगोवाल की पुण्यतिथि ही अकाली सियासत का अखाड़ा बनती प्रतीत हो रही है।
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नाराज अकाली नेता, बरसी समारोह में ज्यादा से ज्यादा भीड़ जुटाकर सुखबीर बादल को चुनौती देने की कोशिश में हैं। प्रो. प्रेम सिंह चंदूमाजरा, सुरजीत सिंह रखड़ा, परमिंदर सिंह ढींडसा, बलदेव सिंह मान, गगनदीप सिंह बरनाला आदि बागी गुट की कमान संभाले हुए हैं। सुखबीर बादल को चुनौती देने वाले अकाली नेताओं के कड़े मिजाज को साफ तौर पर देखा जा सकता है। ये नेता इस बार आर-पार की लड़ाई के मूड में दिखाई दे रहे हैं।
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सियासी जानकार मान रहे हैं कि अकाली दल के नेतृत्व को बदलने की मांग करने वाले नेताओं का लक्ष्य एक तीर से कई निशाने साधना है। जानकार मानते हैं कि अकाली सुधार लहर को प्रचंड करने, पंथक एजेंडे पर पहरा देने का हवाला देकर सुखबीर बादल के दावे को कमजोर करना और अकाली दल बादल से ज्यादा भीड़ जुटाकर उन्हें कमजोर साबित करने की कोशिश करेंगे। वे अकाली एजेंडे के जरिये ही बादल को मात देना चाहते हैं।
दूसरी तरफ सुखबीर बादल और उनके समर्थकों ने बरसी को अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया है। बादल ने बरसी को व्यापक स्तर पर मनाने के आदेश दिए हैं। पार्टी संत लोंगोवाल की बरसी समागम में ज्यादा से ज्यादा भीड़ एकत्रित करके बागियों को कड़ा संदेश देना चाहती है। इसी के मद्देनजर बादल दल के नेताओं ने पूरा जोर लगा दिया है। नाराज नेताओं को स्वार्थी बताते हुए लोगों से बरसी समारोह में शामिल होने की अपील की गई है।
20 अगस्त, 1985 को हुई थी लोंगोवाल की हत्या
संत लोंगोवाल 1980 के आतंकवाद के दौर के समय शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष थे। 20 अगस्त, 1985 को संत लोंगोवाल की संगरूर के शेरपुर में हत्या कर दी गई थी। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी से 24 जुलाई, 1985 को पंजाब के हितों को लेकर समझौता किया था, जिसे राजीव-लोंगोवाल समझौते का नाम दिया गया था। शिरोमणि अकाली दल लंबे समय से शहीद संत लोंगोवाल की बरसी मनाता आ रहा है। कैप्टन अमरिंदर सिंह की सरकार में कांग्रेस भी बरसी मनाती रही है। आप सरकार ने भी बरसी पर रक्तदान शिविर का आयोजन किया था। इस बार अकाली दल के अध्यक्ष से नाराज नेता अलग तौर पर बरसी की तैयारी कर रहे हैं। बहरहाल, संत लोंगोवाल को श्रद्धांजलि अर्पित करने के मकसद से हर साल बरसी मनाई जाती है और अकाली दल, अन्य दलों को जमकर कोसता रहा है, लेकिन पहली बार अकाली नेता एक दूसरे के खिलाफ शब्दों के तीर चलाएंगे। देखना होगा कि कुंद पड़ी अकाली सियासत को बरसी, तीखी धार दिला पाएगी अथवा नहीं।
-संवाद
- फोटो । तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी से समझौता करते संत लोंगोवाल की फाइल फोटो ।