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जीएनडीयू में पंजाबी के पीरियड कम करने का विरोध
Ludhiana
Updated Fri, 15 Feb 2013 05:32 AM IST
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लुधियाना। गुरु नानक देव विश्वविद्यालय (जीएनडीयू) की ओर से कालेजों में स्नातक स्तर के कोर्स में पंजाबी समेत अन्य भाषाओं और सामाजिक विज्ञान के अध्ययन का वक्त कम किए जाने का पंजाबी साहित्य अकादमी ने विरोध किया है। साहित्य अकादमी ने मांग की है कि इस फैसले को विश्वविद्यालय वापस ले, अन्यथा संघर्ष का रस्ता अख्तियार किया जाएगा।
अकादमी के प्रधान प्रो. गुरभजन सिंह गिल ने कहा कि जीएनडीयू के वाइस चांसलर की ओर से लिया गया यह फैसला पंजाबी मातृ भाषा, पंजाबी साहित्य, सभ्याचार और अध्यापक विरोधी फैसला है। प्रधान ने पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल से हस्तक्षेप की मांग की है। उनका तर्क है कि जीएनडीयू की स्थापना पंजाबी भाषा और साहित्य के विस्तार के मकसद से की गई थी।
अकादमी के महासचिव डा. सुखदेव सिंह ने भी विश्वविद्यालय के इस कदम की निंदा की है। उनका तर्क है कि इससे पंजाबी के अध्यापन और अध्ययन का स्तर कम होगा। केवल अकादमिक ही नहीं ऐसी संस्थाओं को पंजाबी को नई पहचान देने के लिए काम करना है।
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अकादमी के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट डा. अनूप सिंह कहते हैं कि सेमेस्टर प्रणाली लागू करने से सिलेबस में कोई फर्क नहीं है, सिलेबस पूरा करने के लिए सप्ताह में छह से आठ पीरियड की जरूरत है। विश्वविद्यालय ने पीरियडों की संख्या में पचास फीसदी की कमी की है, नतीजतन यह फैसला अकादमिक विरोधी है।
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अकादमी के प्रधान प्रो. गुरभजन सिंह गिल ने कहा कि जीएनडीयू के वाइस चांसलर की ओर से लिया गया यह फैसला पंजाबी मातृ भाषा, पंजाबी साहित्य, सभ्याचार और अध्यापक विरोधी फैसला है। प्रधान ने पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल से हस्तक्षेप की मांग की है। उनका तर्क है कि जीएनडीयू की स्थापना पंजाबी भाषा और साहित्य के विस्तार के मकसद से की गई थी।
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अकादमी के महासचिव डा. सुखदेव सिंह ने भी विश्वविद्यालय के इस कदम की निंदा की है। उनका तर्क है कि इससे पंजाबी के अध्यापन और अध्ययन का स्तर कम होगा। केवल अकादमिक ही नहीं ऐसी संस्थाओं को पंजाबी को नई पहचान देने के लिए काम करना है।
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अकादमी के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट डा. अनूप सिंह कहते हैं कि सेमेस्टर प्रणाली लागू करने से सिलेबस में कोई फर्क नहीं है, सिलेबस पूरा करने के लिए सप्ताह में छह से आठ पीरियड की जरूरत है। विश्वविद्यालय ने पीरियडों की संख्या में पचास फीसदी की कमी की है, नतीजतन यह फैसला अकादमिक विरोधी है।