अपने घर में भी है रोटी: ऑस्ट्रेलिया में ली पीआर, अपनी मिट्टी की कसक खींच लाई वापस... खड़ी कर दी कंपनी
प्रभजीत सिंह 2007 में ऑस्ट्रेलिया गए थे। वहां टैक्सी चलाई और फिर ग्राफिक्स डिजाइनर की जाॅब की। इसके बाद पीआर मिल गई। फिर एक दिन वे सब कुछ छोड़छाड़ कर पंजाब लाैट आए।
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यूएस से पंजाबियों के डिपोर्ट होने के बाद से पंजाब में विदेश जाने वाले युवाओं में चिंता है। युवा रोजगार के लिए विदेशों का रुख करते हैं लेकिन अपने देश में भी काम की कमी नहीं है।
ऑस्ट्रेलिया से लौट कर पंजाब में अपना बिजनेस स्थापित कर चुके प्रभजीत सिंह कहते हैं कि पंजाब में बहुत संभावनाएं, युवा पूरी ऊर्जा से काम करें। विदेश के लिए अंधी दौड़ में न पड़ें। सपने देखना अच्छी बात है, लेकिन सपने पूरे करने के लिए गलत रास्ता अपनाना कतई जायज नहीं है। मुझे पंजाब में रहना इसलिए अच्छा लगता है, क्योंकि हमारे पास बहुत ऊर्जा है।
प्रभजीत सिंह ने कहा कि मुझे चीजें बनाना पसंद है और मुझे लगता है कि पंजाब अपनी यात्रा में एक अनोखी स्थिति में है। भारत में अब बहुत सारी चीजें बेहतर हो रही हैं। बुनियादी ढांचा बनाने में सरकार भी मदद कर रही है। उद्यमी भी इसे लेकर काफी उत्साहित हैं। ऑस्ट्रेलिया में 2007 में सपने संजोकर गया था कि वहां पर जाकर एक बड़ा कारोबार खड़ा करूंगा, एक मुकाम हासिल करूंगा। अब यहां रहकर अच्छा लगता है।
ग्राफिक्स डिजाइनर की नाैकरी के बाद ली पीआर
जालंधर के रहने वाले प्रभजीत सिंह के पिता जगजीत सिंह पेट्रोल पंप के संचालक थे, लेकिन प्रभजीत सिंह के दिल में ऑस्ट्रेलिया जाने की कसक थी। लिहाजा, एक बेहतर भविष्य के लिए वहां ग्राफिक्स डिजाइनर के कोर्स में दाखिला ले लिया। वह कहते हैं, दो साल बाद जब कॉलेज से निकला तो उत्साह से लबरेज था। जुनून था कि ऑस्ट्रेलिया में अपने पैरों पर खड़ा होना है। वहां पर टैक्सी ली और लगातार चलाई। पैसा भी कमाया, फिर ग्राफिक्स डिजाइनर की नौकरी की। पगार भी अच्छी थी और भविष्य भी अच्छा दिखने लगा था। इस बीच पीआर भी मिल गई और 2013 में ऑस्ट्रेलियन सिटीजन बन गया, लेकिन एक दिन जिंदगी ने मोड़ लिया। अपनी मिट्टी में काम करने का मन करने लगा।
प्रभजीत सिंह का कहना है कि उसके लिए काफी मुश्किल घड़ी थी कि जहां पंजाब के लोग आने के लिए तरसते हैं, वह उस मुल्क को त्यागकर भारत आकर दोबारा नए सिरे से जिंदगी की शुरुआत करना आसान नहीं था, लेकिन दिल की कसक का कोई इलाज नहीं होता। काफी दोस्तों व पारिवारिक सदस्यों ने समझाया कि अब तुम वहां के नागरिक हो, क्या जरूरत है वापस आने की। ऑस्ट्रेलिया में कोई कमी नहीं थी, लेकिन अपने देश में कुछ करने की ललक थी।
भाई की सलाह से शुरू किया कारोबार
2013 में पंजाब वापस आ गया। भारत की तरफ से दोहरी नागरिकता की घोषणा की जा चुकी थी। यहां पर पहुंचा तो छोटे भाई रविकिरण सिंह के साथ सलाह की और तय किया कि एक इमिग्रेशन व कंसल्टेंट कंपनी खोली जाए। मेरे पास ऑस्ट्रेलिया और वहां के कारोबार का तजुर्बा था। लिहाजा, उसी को कैश किया। एटलांटिक नाम से कंपनी का गठन किया और कंपनी ने जमकर कारोबार किया। कई बड़ी यूनिवर्सिटीज के साथ अनुबंध किया। ऑस्ट्रेलिया में कैसे कारोबार करना, कैसे युवाओं को वहां पर सेटल करना है और वीजा प्रोसेस करवाना है, इसको लेकर कारोबार किया, जो सफलता छूने लगा। प्रभजीत सिंह का कहना है कि वह 12 साल में आज एक सफल कारोबारी है। ठीक कुछ समय के लिए मंदी का दौर आता है, लेकिन निकल जाता है। प्रभजीत सिंह का कहना है कि अब वह 2 साल बाद 10-15 दिन के परिवार के साथ घूमने ही ऑस्ट्रेलिया जाते हैं।