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Lawrence Bishnoi: अमेरिका ने मांगा भी तो तुरंत नहीं मिलेगा लॉरेंस, भारत में लंबित मुकदमे बनेंगे बड़ी बाधा
Tue, 14 Jul 2026 01:58 PM IST
Sharukh Khan
सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर
सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर
Published by: Sharukh Khan
Updated Tue, 14 Jul 2026 01:58 PM IST
सार
गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई को अगर अमेरिका ने मांगा भी तो वह तुरंत नहीं मिलेगा। भारत में लंबित मुकदमे बड़ी बाधां बनेंगे। अमेरिकी आरोपों के बाद प्रत्यर्पण पर बहस तेज हो गई है। भारत-अमेरिका संधि के तहत कानूनी जांच होगी।
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लॉरेंस बिश्नोई पर अमेरिका में कार्रवाई
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
अमेरिकी न्याय विभाग द्वारा जेल में बंद गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई, पंजाब पुलिस के एसएचओ गुरिंदरजीत सिंह नागरा और अन्य लोगों पर संगठित अपराध, हत्या की साजिश, रंगदारी और आपराधिक रैकेट चलाने जैसे गंभीर आरोप लगाए जाने के बाद उनके संभावित प्रत्यर्पण को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि केवल अमेरिकी अदालत में आरोप तय होने से प्रत्यर्पण स्वत: नहीं हो जाता। इसके लिए भारत-अमेरिका प्रत्यर्पण संधि और भारतीय कानून के तहत पूरी प्रक्रिया अपनानी होगी।
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कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि केवल अमेरिकी अदालत में आरोप तय होने से प्रत्यर्पण स्वत: नहीं हो जाता। इसके लिए भारत-अमेरिका प्रत्यर्पण संधि और भारतीय कानून के तहत पूरी प्रक्रिया अपनानी होगी।
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एडवोकेट राजेश वर्मा के अनुसार भारत और अमेरिका के बीच 1997 की द्विपक्षीय प्रत्यर्पण संधि लागू है। इसका सबसे अहम सिद्धांत डुअल क्रिमिनैलिटी है। यानी जिस अपराध के आधार पर प्रत्यर्पण मांगा जाए वह दोनों देशों में दंडनीय होना चाहिए और उसके लिए कम से कम एक वर्ष की सजा का प्रावधान होना चाहिए।
हत्या, आपराधिक साजिश, रंगदारी, मादक पदार्थों की तस्करी और हथियारों से जुड़े अपराध भारत में भी गंभीर अपराध हैं। इसलिए सिद्धांत रूप से अमेरिका के आरोप प्रत्यर्पण का आधार बन सकते हैं।
उन्होंने बताया कि अमेरिका यदि औपचारिक अनुरोध भेजता है तो वह पहले विदेश मंत्रालय के पास पहुंचेगा। इसके बाद गृह मंत्रालय और संबंधित जांच एजेंसियां यह जांच करेंगी कि अनुरोध भारत-अमेरिका संधि और प्रत्यर्पण अधिनियम 1962 के अनुरूप है या नहीं।
प्रारंभिक जांच के बाद मामला अदालत जाएगा जहां कानूनी शर्तों की पड़ताल होगी। अदालत की राय के बाद भी अंतिम निर्णय केंद्र सरकार ही लेगी और जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त शर्तें या राजनयिक आश्वासन भी मांग सकती है।
टाला जा सकता है प्रत्यर्पण
एडवोकेट वर्मा के अनुसार लॉरेंस बिश्नोई का मामला सबसे अलग है क्योंकि वह पहले से भारत की न्यायिक हिरासत में है और उसके खिलाफ विभिन्न राज्यों में हत्या, रंगदारी और संगठित अपराध के कई मामले लंबित हैं। प्रत्यर्पण अधिनियम 1962 के तहत भारत सरकार को यह अधिकार है कि यदि किसी आरोपी के खिलाफ देश में मुकदमे लंबित हों या उसे सजा भुगतनी हो तो उसका प्रत्यर्पण टाला जा सकता है। ऐसे में भारत पहले घरेलू मुकदमों का निपटारा कर सकता है।
एडवोकेट वर्मा के अनुसार लॉरेंस बिश्नोई का मामला सबसे अलग है क्योंकि वह पहले से भारत की न्यायिक हिरासत में है और उसके खिलाफ विभिन्न राज्यों में हत्या, रंगदारी और संगठित अपराध के कई मामले लंबित हैं। प्रत्यर्पण अधिनियम 1962 के तहत भारत सरकार को यह अधिकार है कि यदि किसी आरोपी के खिलाफ देश में मुकदमे लंबित हों या उसे सजा भुगतनी हो तो उसका प्रत्यर्पण टाला जा सकता है। ऐसे में भारत पहले घरेलू मुकदमों का निपटारा कर सकता है।
वहीं एसएचओ गुरिंदरजीत सिंह नागरा के मामले में स्थिति अलग हो सकती है। यदि भारत में उनके खिलाफ समान आरोपों पर जांच या मुकदमा शुरू होता है तो भारत पहले घरेलू कार्रवाई को प्राथमिकता देगा। वर्मा ने बताया कि अधिनियम की धारा 34 और 34ए ऐसे मामलों में भारत सरकार को विशेष अधिकार देती हैं जिनके तहत विदेश में किए गए कथित अपराधों के आधार पर भारत में भी कार्रवाई संभव है।
भारत तुरंत स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं
रिटायर पुलिस अधिकारी सुरिंदर कालिया ने कहा कि अमेरिका यदि प्रत्यर्पण की औपचारिक मांग करता भी है तो भारत उसे तुरंत स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं होगा। प्रत्येक मामले की अलग कानूनी जांच होगी। विशेष रूप से लॉरेंस के खिलाफ लंबित मामलों को देखते हुए भारत पहले देश में चल रहे मुकदमों को पूरा कर सकता है।
रिटायर पुलिस अधिकारी सुरिंदर कालिया ने कहा कि अमेरिका यदि प्रत्यर्पण की औपचारिक मांग करता भी है तो भारत उसे तुरंत स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं होगा। प्रत्येक मामले की अलग कानूनी जांच होगी। विशेष रूप से लॉरेंस के खिलाफ लंबित मामलों को देखते हुए भारत पहले देश में चल रहे मुकदमों को पूरा कर सकता है।
उन्होंने कहा कि 26/11 मुंबई हमले के आरोपी तहव्वुर राणा का मामला भी बताता है कि प्रत्यर्पण की प्रक्रिया लंबी और कई चरणों वाली होती है। ऐसे मामलों में अंतिम निर्णय भारतीय अदालतों की राय और केंद्र सरकार के विवेक पर निर्भर करता है।