{"_id":"62adb2a72e15041611765c1e","slug":"inspirational-story-of-chandrashekhar-arora-of-jalandhar-on-fathers-day","type":"story","status":"publish","title_hn":"Fathers Day: स्क्रीन प्रिंटिंग का काम करने वाले ने पेश की मिसाल...एक बेटी सीएस तो दूसरी बनी जालंधर की पहली कामर्शियल महिला पायलट","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Fathers Day: स्क्रीन प्रिंटिंग का काम करने वाले ने पेश की मिसाल...एक बेटी सीएस तो दूसरी बनी जालंधर की पहली कामर्शियल महिला पायलट
Sun, 19 Jun 2022 08:20 AM IST
निवेदिता वर्मा
मनमोहन सिंह, संवाद न्यूज एजेंसी, जालंधर (पंजाब)
मनमोहन सिंह, संवाद न्यूज एजेंसी, जालंधर (पंजाब)
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Sun, 19 Jun 2022 08:20 AM IST
सार
चंद्रशेखर अरोड़ा ने बताया कि जब बेटियों की स्कूलिंग के लिए पैसों की जरूरत पड़ी तो उन्होंने स्क्रीन प्रिंटिंग का काम शुरू किया। गुंजन के दादा महंत आज्ञा सिंह स्वतंत्रता सेनानी थे। उनके नाम पर दुकान का नाम महंत संस रखा।
विज्ञापन
अपने परिवार के साथ चंद्रशेखर अरोड़ा।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
चंद्रशेखर अरोड़ा उनके लिए सबक हैं, जो कहते हैं कि औलाद के रूप में बेटा जरूर होना चाहिए। अरोड़ा की दो बेटियां हैं, जिन्हें उन्होंने पूरी आजादी देकर पाला है। कभी किसी तरह की बंदिश नहीं रखी। आज दोनों बेटियां कामयाब हैं। एक सीएस है तो दूसरी जालंधर की पहली कामर्शियल महिला पायलट है। दोनों को अपने पिता पर गर्व है।
चंद्रशेखर अरोड़ा बताते हैं कि 26 साल पहले जब छोटी बेटी पैदा हुई तो रिश्तेदार-समाज और यहां तक कि महिला डॉक्टर ने भी कहा कि ‘फिर से बेटी’। इस पर चंद्रशेखर ने कहा-समय बदल चुका है। आज बेटियां किसी मायने में बेटों से कम नहीं हैं। छोटी बेटी की किलकारियों से घर गूंजा तो उसका नाम गुंजन रखा। बड़ी बेटी आशिमा थी। रिश्तेदार दबाव डालते कि बेटे के लिए कोशिश करो। मुझे उनकी सोच पर तरस आता। मैंने सोच लिया था बेटियों को खूब पढ़ाऊंगा। उनकी परवरिश करूंगा और वही छूट दूंगा जो बेटों को देते हैं।
चंद्रशेखर के मुताबिक, जब बेटियों की स्कूलिंग के लिए पैसों की जरूरत पड़ी तो उन्होंने स्क्रीन प्रिंटिंग का काम शुरू किया। गुंजन के दादा महंत आज्ञा सिंह स्वतंत्रता सेनानी थे और उन्हें ताम्रपत्र भी मिला था। उनके नाम पर दुकान का नाम महंत संस रखा। बेटियों की पढ़ाई के लिए दिन रात मेहनत की, कुछ वर्ष बाद काम कम हो गया तो घर से शुरू कर दिया। बेटियों की कॉलेज की पढ़ाई शुरू हुई। छोटी बेटी का थॉपर यूनिवर्सिटी पटियाला में बी-टेक में एडमिशन कराया और लोन लेकर बेटियों को पढ़ाया। आज बड़ी बेटी आशिमा जीएनए फगवाड़ा टूल्स में कंपनी सेक्रेटरी (सीएस) है। छोटी बेटी गुंजन अरोड़ा ने 2018 में जालंधर की पहली कामर्शियल महिला पायलट बनकर नाम रोशन किया है।
विज्ञापन
विज्ञापन
चंद्रशेखर अरोड़ा बताते हैं कि 26 साल पहले जब छोटी बेटी पैदा हुई तो रिश्तेदार-समाज और यहां तक कि महिला डॉक्टर ने भी कहा कि ‘फिर से बेटी’। इस पर चंद्रशेखर ने कहा-समय बदल चुका है। आज बेटियां किसी मायने में बेटों से कम नहीं हैं। छोटी बेटी की किलकारियों से घर गूंजा तो उसका नाम गुंजन रखा। बड़ी बेटी आशिमा थी। रिश्तेदार दबाव डालते कि बेटे के लिए कोशिश करो। मुझे उनकी सोच पर तरस आता। मैंने सोच लिया था बेटियों को खूब पढ़ाऊंगा। उनकी परवरिश करूंगा और वही छूट दूंगा जो बेटों को देते हैं।
विज्ञापन
चंद्रशेखर के मुताबिक, जब बेटियों की स्कूलिंग के लिए पैसों की जरूरत पड़ी तो उन्होंने स्क्रीन प्रिंटिंग का काम शुरू किया। गुंजन के दादा महंत आज्ञा सिंह स्वतंत्रता सेनानी थे और उन्हें ताम्रपत्र भी मिला था। उनके नाम पर दुकान का नाम महंत संस रखा। बेटियों की पढ़ाई के लिए दिन रात मेहनत की, कुछ वर्ष बाद काम कम हो गया तो घर से शुरू कर दिया। बेटियों की कॉलेज की पढ़ाई शुरू हुई। छोटी बेटी का थॉपर यूनिवर्सिटी पटियाला में बी-टेक में एडमिशन कराया और लोन लेकर बेटियों को पढ़ाया। आज बड़ी बेटी आशिमा जीएनए फगवाड़ा टूल्स में कंपनी सेक्रेटरी (सीएस) है। छोटी बेटी गुंजन अरोड़ा ने 2018 में जालंधर की पहली कामर्शियल महिला पायलट बनकर नाम रोशन किया है।
विज्ञापन