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दोआबा जीतना कैप्टन के लिए चुनौती
सुरिंदर पाल/अमर उजाला, जालंधर
Updated Sun, 29 Nov 2015 02:45 PM IST
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एक बार फिर पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष नियुक्त किए गए कैप्टन अमरिंदर सिंह के लिए सबसे बड़ी चुनौती पंजाब का दोआबा इलाका रहेगा, जहां से 2007 व 2012 में कांग्रेस की करारी हार के कारण कैप्टन सीएम की कुर्सी तक नहीं पहुंच पाए।
दोआबा में दलित वोट बैंक को दोबारा कांग्रेस के साथ जोड़ना कांग्रेस के लिए चुनौती होगी। वहीं दोआबा की राजनीति में भाजपा के किले में सेंधमारी के दमदार हिंदू नेताओं की तलाश करनी होगी।
दोआबा में जालंधर, कपूरथला, नवांशहर, होशियारपुर जिले आते हैं, जिनमें बहुसंख्यक दलितों का वोट बैंक है। दलितों का वोट बैंक 2007 के बाद से कांग्रेस से कट चुका है।
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2007 के चुनावों में कैप्टन अमरिंदर सिंह ने दोआबा की कमान अपने खासमखास सिपहसलार चौधरी जगजीत सिंह के हाथों में दे रखी थी।
चौधरी जगजीत सिंह रविदासिया समुदाय सें थे लेकिन वह दलितों के वोट बैंक को सहेजकर नहीं रख सके। नतीजन दोआबा की 24 सीटों में कांग्रेस सिर्फ 4 सीट ही जीत पाई और 20 सीटों पर शिअद व भाजपा गठबंधन काबिज हो गया।
जालंधर में तो सिर्फ नकोदर की सीट पर ही कांग्रेस ने जीत हासिल और सभी विधानसभा हलकों में कांग्रेस साफ हो गयी। खासकर जहां पर दलितों का अधिक प्रभाव था और जो सीटें रिजर्व थी, वहां पर कांग्रेस की हालत पतली रही।
2012 के चुनावों में भी कमान कैप्टन अमरिंदर सिंह के हाथ में ही थी। इस बार कांग्रेस दोआबा में 24 में से सिर्फ 6 सीट ही जीत सकी। जालंधर में कांग्रेस का खाता भी नहीं खुल पाया।
दरअसल, दोआबा के सभी जिलों में रविदासिया समाज, वाल्मीकि भाईचारे के अलावा हिंदू समुदाय का भारी वोट बैंक है। कई विधानसभा हलकों में तो दलितों की आबादी 40 फीसदी के आसपास है।
यह वोट बैंक किसी समय कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक होता था, जो 2007 में टूटकर शिअद भाजपा की तरफ चला गया। इस वोट बैंक को कांग्रेस के साथ लाकर जोड़ना कैप्टन के लिए बड़ी चुनौती है।
वहीं दूसरी बड़ी चुनौती गुटबंदी को खत्म करना होगी। खासकर दोआबा में कांग्रेस कई गुटों में बंटी हुई है, जिसमें कैप्टन धड़े के अलावा प्रताप सिंह बाजवा व बीबी राजिंदर कौर भट्ठल गुट के नेता भी हैं।
चूंकि कैप्टन के खास सिपहसलार चौधरी जगजीत सिंह का स्वर्गवास हो चुका है और इस बार कैप्टन दोआबा का सारथी किसको बनाते हैं, इस पर यहां के कांग्रेसियों की नजर है।
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दोआबा में दलित वोट बैंक को दोबारा कांग्रेस के साथ जोड़ना कांग्रेस के लिए चुनौती होगी। वहीं दोआबा की राजनीति में भाजपा के किले में सेंधमारी के दमदार हिंदू नेताओं की तलाश करनी होगी।
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दोआबा में जालंधर, कपूरथला, नवांशहर, होशियारपुर जिले आते हैं, जिनमें बहुसंख्यक दलितों का वोट बैंक है। दलितों का वोट बैंक 2007 के बाद से कांग्रेस से कट चुका है।
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2007 के चुनावों में कैप्टन अमरिंदर सिंह ने दोआबा की कमान अपने खासमखास सिपहसलार चौधरी जगजीत सिंह के हाथों में दे रखी थी।
चौधरी जगजीत सिंह रविदासिया समुदाय सें थे लेकिन वह दलितों के वोट बैंक को सहेजकर नहीं रख सके। नतीजन दोआबा की 24 सीटों में कांग्रेस सिर्फ 4 सीट ही जीत पाई और 20 सीटों पर शिअद व भाजपा गठबंधन काबिज हो गया।
जालंधर में तो सिर्फ नकोदर की सीट पर ही कांग्रेस ने जीत हासिल और सभी विधानसभा हलकों में कांग्रेस साफ हो गयी। खासकर जहां पर दलितों का अधिक प्रभाव था और जो सीटें रिजर्व थी, वहां पर कांग्रेस की हालत पतली रही।
2012 के चुनावों में भी कमान कैप्टन अमरिंदर सिंह के हाथ में ही थी। इस बार कांग्रेस दोआबा में 24 में से सिर्फ 6 सीट ही जीत सकी। जालंधर में कांग्रेस का खाता भी नहीं खुल पाया।
दरअसल, दोआबा के सभी जिलों में रविदासिया समाज, वाल्मीकि भाईचारे के अलावा हिंदू समुदाय का भारी वोट बैंक है। कई विधानसभा हलकों में तो दलितों की आबादी 40 फीसदी के आसपास है।
यह वोट बैंक किसी समय कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक होता था, जो 2007 में टूटकर शिअद भाजपा की तरफ चला गया। इस वोट बैंक को कांग्रेस के साथ लाकर जोड़ना कैप्टन के लिए बड़ी चुनौती है।
वहीं दूसरी बड़ी चुनौती गुटबंदी को खत्म करना होगी। खासकर दोआबा में कांग्रेस कई गुटों में बंटी हुई है, जिसमें कैप्टन धड़े के अलावा प्रताप सिंह बाजवा व बीबी राजिंदर कौर भट्ठल गुट के नेता भी हैं।
चूंकि कैप्टन के खास सिपहसलार चौधरी जगजीत सिंह का स्वर्गवास हो चुका है और इस बार कैप्टन दोआबा का सारथी किसको बनाते हैं, इस पर यहां के कांग्रेसियों की नजर है।