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Delhi Cabinet: दिल्ली मंत्रिमंडल के सहारे पंजाब को साधने की तैयारी...भाजपा ने इसलिए खेला मनजिंदर सिरसा पर दांव
Fri, 21 Feb 2025 09:11 AM IST
शाहरुख खान
सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर
सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर
Published by: शाहरुख खान
Updated Fri, 21 Feb 2025 09:11 AM IST
सार
दिल्ली मंत्रिमंडल के सहारे भाजपा पंजाब को साधने की तैयारी में है। भाजपा ने तीन सिख विधायकों से मनजिंदर सिरसा को मंत्री के लिए चुना। दो साल बाद पंजाब के चुनाव पर नजर है। अभी से ग्राउंड पर काम शुरू कर दिया है।
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Delhi Cabinet
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
दिल्ली मंत्रिमंडल के सहारे भाजपा ने पंजाब को साधने की तैयारी की है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा ने इस बार तीन सिख नेताओं को टिकट दिया था और तीनों ही अपनी-अपनी सीटें जीतकर पार्टी की झोली में डालने में सफल हुए हैं, लेकिन जब मंत्री बनाने की बारी आई तो भाजपा नेतृत्व ने राजौरी गार्डन से चुनाव जीतने वाले मनजिंदर सिंह सिरसा पर दांव लगाना ही उचित समझा।
सिरसा दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के प्रधान रह चुके हैं। इसके साथ ही वह अकाली दल-भाजपा सरकार के कार्यकाल के दौरान पंजाब के डिप्टी सीएम रहे सुखबीर बादल के ओएसडी रह चुके हैं। लिहाजा, पंजाब में जमीनी स्तर पर उनका खासा नेटवर्क है और दो साल बाद पंजाब में चुनाव है।
दिल्ली विधानसभा चुनाव में इस बार भाजपा के टिकट पर मनजिंदर सिंह सिरसा राजौरी गार्डन से, अरविंदर सिंह लवली गांधीनगर और तरविंदर सिंह मारवाह जंगपुरा से चुनाव जीते हैं। इन तीनों सिख नेता से भाजपा का अपने कैडर वाला कोई नेता नहीं है।
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सिरसा शिरोमणि अकाली दल से भाजपा में आए हैं, तो लवली और मारवाह कांग्रेस के पुराने दिग्गज रहे हैं। लवली तो शीला दीक्षित सरकार में मंत्री रह चुके हैं, लेकिन इनमें एक सिरसा ऐसे हैं, जो पंजाब में अपना नेटवर्क चला रहे हैं। हाल ही में राधा स्वामी मत के गद्दीशीन बाबा गुरिंदर सिंह ढिल्लों भी सिरसा की दिल्ली कोठी में जाकर आए हैं।
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सिरसा दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के प्रधान रह चुके हैं। इसके साथ ही वह अकाली दल-भाजपा सरकार के कार्यकाल के दौरान पंजाब के डिप्टी सीएम रहे सुखबीर बादल के ओएसडी रह चुके हैं। लिहाजा, पंजाब में जमीनी स्तर पर उनका खासा नेटवर्क है और दो साल बाद पंजाब में चुनाव है।
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दिल्ली विधानसभा चुनाव में इस बार भाजपा के टिकट पर मनजिंदर सिंह सिरसा राजौरी गार्डन से, अरविंदर सिंह लवली गांधीनगर और तरविंदर सिंह मारवाह जंगपुरा से चुनाव जीते हैं। इन तीनों सिख नेता से भाजपा का अपने कैडर वाला कोई नेता नहीं है।
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सिरसा शिरोमणि अकाली दल से भाजपा में आए हैं, तो लवली और मारवाह कांग्रेस के पुराने दिग्गज रहे हैं। लवली तो शीला दीक्षित सरकार में मंत्री रह चुके हैं, लेकिन इनमें एक सिरसा ऐसे हैं, जो पंजाब में अपना नेटवर्क चला रहे हैं। हाल ही में राधा स्वामी मत के गद्दीशीन बाबा गुरिंदर सिंह ढिल्लों भी सिरसा की दिल्ली कोठी में जाकर आए हैं।
दिल्ली से पंजाब तक गुरुद्वारों की बहुत ही बड़ी भूमिका
डेरा ब्यास का पंजाब समेत तमाम राज्यों में लंबा चौड़ा नेटवर्क है और श्रद्धालुओं की संख्या करोड़ों में हैं। सिरसा का पंथक सियासत में खासा नेटवर्क है। सिरसा गुरुद्वारों से सीधा जुड़े रहे हैं। सिखों की राजनीति में दिल्ली से पंजाब तक गुरुद्वारों की बहुत ही बड़ी भूमिका होती है।
डेरा ब्यास का पंजाब समेत तमाम राज्यों में लंबा चौड़ा नेटवर्क है और श्रद्धालुओं की संख्या करोड़ों में हैं। सिरसा का पंथक सियासत में खासा नेटवर्क है। सिरसा गुरुद्वारों से सीधा जुड़े रहे हैं। सिखों की राजनीति में दिल्ली से पंजाब तक गुरुद्वारों की बहुत ही बड़ी भूमिका होती है।
सिरसा भी अकाली दल से ही भाजपा में आए
गुरुद्वारे की राजनीति से ही निकली शिरोमणि अकाली दल के साथ भाजपा का दशकों तक गठबंधन रह चुका है और दोनों केंद्र से लेकर पंजाब तक में मिलकर सरकार चला चुके हैं। सिरसा भी अकाली दल से ही भाजपा में आए हुए नेता हैं।
गुरुद्वारे की राजनीति से ही निकली शिरोमणि अकाली दल के साथ भाजपा का दशकों तक गठबंधन रह चुका है और दोनों केंद्र से लेकर पंजाब तक में मिलकर सरकार चला चुके हैं। सिरसा भी अकाली दल से ही भाजपा में आए हुए नेता हैं।
किसान आंदोलन से उपजे रोष को कम करने का प्रयास
दिल्ली विधानसभा चुनाव में भारी समर्थन मिलने के बाद भाजपा ने सिरसा के माध्यम से फिर से सिखों के दिल की गहराई में उतरने की कोशिश की है, जो कथित रूप से किसान आंदोलन की वजह से पिछले कुछ वर्षों में उसे संदेह भरी नजरों से देखने लगे हैं। किसान आंदोलन के नाम पर अकाली दल के एनडीए से निकलने के बाद भाजपा को पंजाब में बड़े सियासी संकट का सामना करना पड़ रहा है।
दिल्ली विधानसभा चुनाव में भारी समर्थन मिलने के बाद भाजपा ने सिरसा के माध्यम से फिर से सिखों के दिल की गहराई में उतरने की कोशिश की है, जो कथित रूप से किसान आंदोलन की वजह से पिछले कुछ वर्षों में उसे संदेह भरी नजरों से देखने लगे हैं। किसान आंदोलन के नाम पर अकाली दल के एनडीए से निकलने के बाद भाजपा को पंजाब में बड़े सियासी संकट का सामना करना पड़ रहा है।
2022 में पंजाब विधानसभा चुनाव में पार्टी अकेले लड़कर वहां सिर्फ दो सीटें जीत सकी थी, जबकि 2024 लोकसभा में एक भी सीट नहीं मिली। केंद्र की मोदी सरकार उन कृषि कानूनों को वापस ले चुकी है, जिसके विरोध में यह आंदोलन भड़का था, लेकिन बावजूद भाजपा पंजाब के सिख समुदाय के दिलों में खुद को स्थापित नहीं कर पा रही है।
पंजाब पूरी तरह से कृषि प्रधान राज्य है और यहां की जो कुल 57 फीसदी सिख आबादी है, वह मुख्य रूप से खेती-किसानी पर ही निर्भर है। पंजाब के इस बहुसंख्यक समाज में अपनी पैठ फिर से बहाल किए बिना, भाजपा के लिए राज्य का रास्ता आसान नहीं होने वाला।
पंजाब तक सकारात्मक संदेश देने की कोशिश
ऐसे में पास की दिल्ली की सरकार में एक बड़े सिख चेहरे को मंत्री बनाकर पार्टी पंजाब तक सकारात्मक संदेश देने की कोशिश कर रही है। भाजपा अब तक पंजाब में अकाली दल की जूनियर सहयोगी बनकर राजनीति करती रही है, लेकिन अब पार्टी का मंसूबा अपने दम पर वहां बड़ा खिलाड़ी बनकर उभरने की है।
ऐसे में पास की दिल्ली की सरकार में एक बड़े सिख चेहरे को मंत्री बनाकर पार्टी पंजाब तक सकारात्मक संदेश देने की कोशिश कर रही है। भाजपा अब तक पंजाब में अकाली दल की जूनियर सहयोगी बनकर राजनीति करती रही है, लेकिन अब पार्टी का मंसूबा अपने दम पर वहां बड़ा खिलाड़ी बनकर उभरने की है।
खासकर जिस तरह से अकाली दल अलोकप्रिय हुआ है और दिल्ली हारने के बाद आप के हौसले भी कमजोर पड़ने की आशंका है, भाजपा खुद को पंजाब में एक मजबूत विकल्प बनकर आने की तैयारी कर रही है।