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Punjab election 2022: चन्नी के सहारे इन 34 सीटों पर टिकी कांग्रेस की निगाहें, पिछले चुनाव में 21 पर दर्ज की थी जीत

Mon, 07 Feb 2022 01:49 AM IST
ajay kumar सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर (पंजाब)
सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर (पंजाब) Published by: ajay kumar Updated Mon, 07 Feb 2022 01:49 AM IST
सार

माझा में 25 विधानसभा सीटें हैं तो दोआबा में 23 विधानसभा सीटें आती हैं। पिछले चुनाव में कांग्रेस ने माझा की 22 सीटों और दोआबा की 15 सीटों पर जीत हासिल कर सत्ता पर काबिज हुई थी।

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Congress made a strategy for 34 reserved assembly seats after declaring Charanjit Singh Channi as CM face
पंंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कांग्रेस ने चरणजीत सिंह चन्नी को सीएम चेहरा घोषित कर सूबे की 34 सीटों पर नजरें टिका दी हैं। पंजाब में अकाली दल-बसपा गठबंधन को काटने के लिए कांग्रेस का यह सबसे मजबूत दांव हैं, जिसके सहारे कांग्रेस को पंजाब में अनुसूचित जाति के वोट का ध्रुवीकरण होने की उम्मीद है। पंजाब में अनुसूचित जाति के चरणजीत सिंह चन्नी पहले ऐसे नेता हैं, जिन्हें राज्य के मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी मिली है। इससे पहले पंजाब में सीएम के पद पर हमेशा ही जट्ट सिख का बोलबाला रहा है लेकिन कांग्रेस ने इस धारणा को तोड़ दिया। 

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अकाली दल के सुखबीर बादल और आम आदमी पार्टी के भगवंत मान भी जट्ट बिरादरी से आते हैं। ऐसे में कांग्रेस ने अपना दांव सबसे अलग होकर खेला है। पंजाब में सबसे अधिक आबादी अनुसूचित जाति की है। यहां पर 32 फीसदी अनुसूचित जाति हैं, जबकि दोआबा में 42 फीसदी हैं। दोआबा में 23 विधानसभा हलके हैं और इतिहास साक्षी है कि दोआबा में जीत हार का फैसला अनुसूचित जाति के वोट ही करता है। 
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पंजाब में वैसे तो जट्ट सिखों की आबादी केवल 20 फीसदी है लेकिन राज्य की सियासत में इन्हीं का दबदबा रहा है। ऐसे में कांग्रेस ने चरणजीत सिंह चन्नी के जरिए अनुसूचित जाति को साधने का दांव चला है। भाजपा से अलग होने के बाद अकाली दल ने बसपा से गठबंधन कर लिया था। अकाली दल व बसपा को आरक्षित सीटों पर जबरदस्त उत्साह व इनपुट मिल रहे थे लेकिन कांग्रेस ने चन्नी का नाम देकर अकाली दल-बसपा गठबंधन की गाड़ी पर ब्रेक लगाने का प्रयास किया है।

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पंजाब में कुल 117 विधानसभा सीटों में से 34 सीटें अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित हैं। कांग्रेस के पास 21 अनुसूचित जाति के विधायक हैं। राज्य में अनुसूचित जाति से सीएम बनाने की लंबे समय से मांग थी। कांग्रेस ने जट्ट सिख से आने वाले नवजोत सिंह सिद्धू को प्रदेश अध्यक्ष बना रखा है तो सत्ता की कमान अनुसूचित जाति समुदाय से आने वाले चन्नी को देने की घोषणा कर जातीय संतुलन बनाने की भी कोशिश की है। 

पंजाब की सियासत में चरणजीत सिंह चन्नी जमीनी स्तर से उठकर सत्ता के सिंहासन तक पहुंचे हैं। खरड़ नगर परिषद के प्रधान पद से राजनीतिक यात्रा शुरू करने वाले चरणजीत सिंह चन्नी जमीनी पकड़ वाले नेता माने जाते हैं। वह पहली बार निदर्लीय विधायक चुने गए थे और बाद में कांग्रेस का दामन थाम लिया था और तीसरी बार विधायक बनाकर आए हैं।

एक नजर अनुसूचित जाति के वोटों पर 
पंजाब में एससी में 39 उपवर्ग हैं। इनमें भी 5 उपवर्ग ऐसे हैं, जिनमें 80 फीसदी अनुसूचित जाति की आबादी आ जाती है। इनमें 5 उपवर्गों में भी 30 फीसदी मजहबी सिखों के बाद दूसरे सबसे बड़े रविदासिया हैं। उनकी आबादी 24 प्रतिशत के करीब है। ज्यादातर रविदासिया पंजाब के दोआबा इलाके में हैं। इस क्षेत्र में जालंधर, होशियारपुर, नवांशहर, कपूरथला जैसे जिले आते हैं। पंजाब में मालवा इलाके में 69 सीटें हैं। ये इलाका दलित बहुल है। तीन करोड़ आबादी में  32 प्रतिशत अनुसूचित जाति की आबादी है। इनमें से  20 फीसदी अनुसूचित जाति के सिख हैं। वहीं हिंदू अनुसूचित जाति की आबादी करीब 13 प्रतिशत है। 

पंजाब की कहावत, जो मालवा जीत लेता है वह सरकार बनाता है...

चरणजीत सिंह चन्नी को चुनने के पीछे कांग्रेस की सोची-समझी रणनीति है। पंजाब की राजनीति में एक कहावत बहुत चर्चित है कि जो मालवा जीत लेता है, वही सरकार बना लेता है। पंजाब की 117 विधानसभा सीटों में 69 सीटें मालवा में ही हैं। 2017 के चुनाव में कांग्रेस ने मालवा क्षेत्र में 40 सीटें जीती थीं। इसके बाद दूसरे अहम क्षेत्र माझा और दोआब को माना जाता है। माझा में 25 विधानसभा सीटें हैं तो दोआबा में 23 विधानसभा सीटें आती हैं। पिछले चुनाव में कांग्रेस ने माझा की 22 सीटों और दोआबा की 15 सीटों पर जीत हासिल कर सत्ता पर काबिज हुई थी।

मालवा क्षेत्र में डेरा का सबसे ज्यादा प्रभाव मालवा में ही है। एक अनुमान के अनुसार, क्षेत्र के 13 जिलों में करीब 35 लाख डेरा प्रेमी हैं, उसमें भी खास बात यह है कि अनुसूचित जाति सिख ही इनमें ज्यादा जाते हैं। यही बात चरणजीत सिंह चन्नी के समर्थन में गई। डेरा प्रेमी का एकमुश्त वोट किसी भी दल का गणित बिगाड़ सकता है। 

2017 के चुनाव में आप ने मालवा से 18 सीटें जीती थीं। आप इस बार भी भगवंत मान को सीएम चेहरा घोषित कर इसी बूते गणित बिगाड़ना चाहती है। आम आदमी पार्टी ही नहीं बल्कि शिरोमणि अकाली दल भी बसपा के साथ मिलकर मालवा में अपनी मौजूदगी को फिर मजबूत करना चाहती है। अकाली दल ने इस क्षेत्र से 2012 में 33 सीटें जीती थीं लेकिन 2017 में उसकी सीटें घटकर 8 रह गई थीं। इस तरह उसने सत्ता भी गंवा दी थी। कांग्रेस मालवा में चन्नी को चुनाव लड़ा रही है। उनहोंने चमकौर साहब के अलावा भदौड़ सीट से भी नामांकन दाखिल कर रखा है। भदौड़ मालवा का केंद्र हैं, ऐसे में कांग्रेस चन्नी पर दांव खेलकर मालवा में मजबूत होने की आस लगाये बैठी है।

गरीबी रेखा में जीने वाले 61.4 फीसदी एससी
पंजाब में 523,000 परिवार गरीबी रेखा के नीचे जिंदगी गुजार रहे हैं जिसमें करीब 321,000 यानी करीब 61.4 फीसद अनुसूचित जाति के लोग हैं। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 34 एससी सीट में से 21 पर जीती थी जबकि आम आदमी पार्टी ने 9, अकाली 3 और बीजेपी ने 1 सीट जीती थी। कुल 50 सीटें ऐसी हैं जिन पर एससी वोटर हार जीत का फैसला करते हैं और कांग्रेस अब इसी गणित को लेकर आगे बढ़ रही है।

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