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बदला नहीं समाजिक बदलाव चाहता था शहीद ऊधम सिंह-लेखक राकेश कुमार
Updated Mon, 25 Dec 2017 10:30 PM IST
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जलियावाला कांड के लिए माइकल नहीं डायर था दोषी
शहीद ऊधम सिंह के जन्मदिवस पर विशेष
बदला नहीं सामाजिक बदलाव चाहता था ऊधम सिंह: लेखक राकेश कुमार
अनिल कुमार।
फिरोजपुर।
शहीद ऊधम सिंह ने जलियांवाला बाग में 13 अप्रैल 1919 में अंग्रेजों द्वारा निहत्थे लोगों के खून से खेली होली का नाजारा अपनी आंखों से नहीं देखा था और न ही 13 मार्च 1940 में लंदन के कैकस्टन हाल में उडवायर की हत्या कर जलियावाला बाग में मारे गए लोगों की हत्या का बदला लिया था। इसके अलावा ऊधम सिंह ने कहीं नहीं कहा कि मैंने जलियावाला बाग का बदला लेने के लिए अंग्रेज अधिकारियों पर गोलियां चलाई थी। लेखक राकेश कुमार ने शहीद ऊधम सिंह पर लिखी अपनी तीसरी पुस्तक (बदले तो पार सामाजिक बदलाव नूं परनाया सी क्रांतिकारी शहीद ऊधम सिंह) में इन सब बातों को साबित करने के लिए कई प्रमाणित एतिहासिक दस्तावेजों का जिक्र किया है।
लेखक राकेश कुमार ने बताया कि ऊधम सिंह की 13 अप्रैल 1919 को जलियावाला बाग में मौजूदगी संबंधी अलग-अलग इतिहासकारों की अलग-अलग राय है। पहली धारणा अनुसार वह 13 अप्रैल को जलियांवाला कांड में मौजूद था। दूसरी धारणा मुताबिक वह कांड के बाद वहां पहुंचा। तीसरी धारणा के अनुसार वह 13 व 14 अप्रैल को अमृतसर में मौजूद ही नहीं था। लेकिन ब्रिटिश सरकार की ओर से ऊधम सिंह संबंधी जारी दस्तावेज अनुसार वह जून 1919 में भारत वापस आया था। भारत सरकार के गृहमंत्रालय ने एक टेलीग्राम इंग्लैंड भेज कर बताया था कि ऊधम सिंह के गांव सुनाम तथा अमृतसर में पूछताछ की गई है। लेकिन कहीं भी इस बात की पुष्टि नहीं हो सकी कि वह अमृतसर में मौजूद था।
लेखक ने बताया कि जलियांवाला कांड के लिए माइकल उडवायर नहीं बल्कि डायर सीधे तौर पर दोषी था। 11 अप्रैल 1919 को अमृतसर शहर सेना के हवाले कर दिया था। फौज की कमांड डायर के पास थी। उडवायर उस समय लाहौर में था। हंटर कमेटी के समक्ष डायर ने खुद इस बात को स्वीकार किया था कि गोली चलाने का फैसला उसका अपना था। हंटर कमेटी व फौजी कमीशन ने डायर को दोषी ठहराया था और उसे 23 मार्च 1920 को नौकरी से हटा दिया था। फौजी कमीशन ने फैसला दिया था कि उसे भारत में और कोई नौकरी न दी जाए तथा उसका वेतन आधा कर दिया जाए। 13 मार्च 1940 को लंदन के कैकस्टन हाल में अकेले माइकल उडवायर पर नहीं बल्कि चार अंग्रेज अधिकारियों माइकल उडवायर, मार्कूअस आफ जैटलैंड, लुईसडेन व लार्ड लैमिंगटन पर छह गोलियां चलाई थी। उडवायर मौके पर मर गया था जबकि बाकी जख्मी हो गए थे। ये सभी भारत के गवर्नर रह चुके थे। भारत की आजादी के विरुद्ध थे। डेली मिरर 14 मार्च 1940 की खबर अनुसार ऊधम सिंह ने पहली दो गोलियां जैटलैंड के मारी थी। ऊधम सिंह जब मौके पर पकड़ा गया तो उसने पूछा कि जैटलैंड मर गया। लेखक ने बताया कि माइकल उडवायर पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर होते हुए विशेष अदालतों के जरिए गदर लहर के महान सूरवीरों जैसे करतार सिंह सराभा, विष्णु गणेश पिंगले, भाई जगत सिंह, भाई हरनाम सिंह व डा. मथुरा दास व अन्य को फांसी दी थी। उडवायर ने भारत की कौमी मुक्ति लहर को कुचलने के लिए लोगों पर बेतहासा जुर्म ढाया था। कई इलाकों में मार्शल ला लागू किया था।
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ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ थे ऊधम सिंह
लेखक ने बताया कि ऊधम सिंह गदर लहर से जुड़े थे व ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ थे, वह भारत के लोगों के हित और सामाजिक बराबरी के हक की बात करते थे और देश को आजाद देखना चाहता थे। लेखक ने कहा कि बुद्धिजीवी, इतिहासकार व लेखक ऊधम सिंह संबंधी प्रमाणित तथ्यों पर गंभीर विचार चर्चाएं होनी चाहिए ताकि ऊधम सिंह की सही सोच सबके सामने आए, जिसके लिए उसने अपनी जिंदगी कुर्बान की थी। उसकी सही सोच के बारे में नये गीत, कविताएं, नाटक लिखे जाएं और उसकी सही सोच पर फिल्में बने।
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शहीद ऊधम सिंह के जन्मदिवस पर विशेष
बदला नहीं सामाजिक बदलाव चाहता था ऊधम सिंह: लेखक राकेश कुमार
अनिल कुमार।
फिरोजपुर।
शहीद ऊधम सिंह ने जलियांवाला बाग में 13 अप्रैल 1919 में अंग्रेजों द्वारा निहत्थे लोगों के खून से खेली होली का नाजारा अपनी आंखों से नहीं देखा था और न ही 13 मार्च 1940 में लंदन के कैकस्टन हाल में उडवायर की हत्या कर जलियावाला बाग में मारे गए लोगों की हत्या का बदला लिया था। इसके अलावा ऊधम सिंह ने कहीं नहीं कहा कि मैंने जलियावाला बाग का बदला लेने के लिए अंग्रेज अधिकारियों पर गोलियां चलाई थी। लेखक राकेश कुमार ने शहीद ऊधम सिंह पर लिखी अपनी तीसरी पुस्तक (बदले तो पार सामाजिक बदलाव नूं परनाया सी क्रांतिकारी शहीद ऊधम सिंह) में इन सब बातों को साबित करने के लिए कई प्रमाणित एतिहासिक दस्तावेजों का जिक्र किया है।
लेखक राकेश कुमार ने बताया कि ऊधम सिंह की 13 अप्रैल 1919 को जलियावाला बाग में मौजूदगी संबंधी अलग-अलग इतिहासकारों की अलग-अलग राय है। पहली धारणा अनुसार वह 13 अप्रैल को जलियांवाला कांड में मौजूद था। दूसरी धारणा मुताबिक वह कांड के बाद वहां पहुंचा। तीसरी धारणा के अनुसार वह 13 व 14 अप्रैल को अमृतसर में मौजूद ही नहीं था। लेकिन ब्रिटिश सरकार की ओर से ऊधम सिंह संबंधी जारी दस्तावेज अनुसार वह जून 1919 में भारत वापस आया था। भारत सरकार के गृहमंत्रालय ने एक टेलीग्राम इंग्लैंड भेज कर बताया था कि ऊधम सिंह के गांव सुनाम तथा अमृतसर में पूछताछ की गई है। लेकिन कहीं भी इस बात की पुष्टि नहीं हो सकी कि वह अमृतसर में मौजूद था।
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लेखक ने बताया कि जलियांवाला कांड के लिए माइकल उडवायर नहीं बल्कि डायर सीधे तौर पर दोषी था। 11 अप्रैल 1919 को अमृतसर शहर सेना के हवाले कर दिया था। फौज की कमांड डायर के पास थी। उडवायर उस समय लाहौर में था। हंटर कमेटी के समक्ष डायर ने खुद इस बात को स्वीकार किया था कि गोली चलाने का फैसला उसका अपना था। हंटर कमेटी व फौजी कमीशन ने डायर को दोषी ठहराया था और उसे 23 मार्च 1920 को नौकरी से हटा दिया था। फौजी कमीशन ने फैसला दिया था कि उसे भारत में और कोई नौकरी न दी जाए तथा उसका वेतन आधा कर दिया जाए। 13 मार्च 1940 को लंदन के कैकस्टन हाल में अकेले माइकल उडवायर पर नहीं बल्कि चार अंग्रेज अधिकारियों माइकल उडवायर, मार्कूअस आफ जैटलैंड, लुईसडेन व लार्ड लैमिंगटन पर छह गोलियां चलाई थी। उडवायर मौके पर मर गया था जबकि बाकी जख्मी हो गए थे। ये सभी भारत के गवर्नर रह चुके थे। भारत की आजादी के विरुद्ध थे। डेली मिरर 14 मार्च 1940 की खबर अनुसार ऊधम सिंह ने पहली दो गोलियां जैटलैंड के मारी थी। ऊधम सिंह जब मौके पर पकड़ा गया तो उसने पूछा कि जैटलैंड मर गया। लेखक ने बताया कि माइकल उडवायर पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर होते हुए विशेष अदालतों के जरिए गदर लहर के महान सूरवीरों जैसे करतार सिंह सराभा, विष्णु गणेश पिंगले, भाई जगत सिंह, भाई हरनाम सिंह व डा. मथुरा दास व अन्य को फांसी दी थी। उडवायर ने भारत की कौमी मुक्ति लहर को कुचलने के लिए लोगों पर बेतहासा जुर्म ढाया था। कई इलाकों में मार्शल ला लागू किया था।
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ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ थे ऊधम सिंह
लेखक ने बताया कि ऊधम सिंह गदर लहर से जुड़े थे व ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ थे, वह भारत के लोगों के हित और सामाजिक बराबरी के हक की बात करते थे और देश को आजाद देखना चाहता थे। लेखक ने कहा कि बुद्धिजीवी, इतिहासकार व लेखक ऊधम सिंह संबंधी प्रमाणित तथ्यों पर गंभीर विचार चर्चाएं होनी चाहिए ताकि ऊधम सिंह की सही सोच सबके सामने आए, जिसके लिए उसने अपनी जिंदगी कुर्बान की थी। उसकी सही सोच के बारे में नये गीत, कविताएं, नाटक लिखे जाएं और उसकी सही सोच पर फिल्में बने।