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Ground Report: पाकिस्तानी सरहद से 500 मीटर दूर सरकारी स्कूल में बच्चे पढ़ रहे देशभक्ति का पाठ, आधुनिक सुविधाओं से लैस है गट्टी राजोके का स्कूल  

Mon, 13 Jun 2022 05:00 PM IST
निवेदिता वर्मा अनिल कुमार, संवाद न्यूज एजेंसी, हुसैनीवाला बार्डर/फिरोजपुर (पंजाब)
अनिल कुमार, संवाद न्यूज एजेंसी, हुसैनीवाला बार्डर/फिरोजपुर (पंजाब) Published by: निवेदिता वर्मा Updated Mon, 13 Jun 2022 05:00 PM IST
सार

गट्टी राजोके स्कूल में बच्चों को अलग तरीके से शिक्षा ग्रहण करवाई जा रही है। खेलकूद पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। स्कूल में कई मेडिकल कैंप आयोजित किए हैं, ताकि बार्डर एरिया में रहने वाले ग्रामीणों का मुफ्त में इलाज हो सके।

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Government Senior Secondary School Rajoke in Firozpur is an example in itself
गट्टी राजोके का सरकारी स्कूल। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी।

विस्तार

पाकिस्तान की सरहद से महज 500 मीटर दूर स्थित फिरोजपुर का सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल राजोके अपने आप में एक मिसाल है। यहां पढ़ने वाले सीमांत गांवों के विद्यार्थी बीएसएफ और सेना में भर्ती होकर देश की सेवा कर रहे हैं। सीमांत गांवों में आतंकी गतिविधियां, नशे व हथियारों की तस्करी का दंश झेल रहे परिवार अपनी बर्बादी के लिए पाकिस्तान को ही जिम्मेदार मानते हैं। यही वजह है कि सीमांत गांवों के बेटे पढ़ लिखकर सेना और बीएसएफ में भर्ती होना चाहते हैं। 

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सतलुज दरिया पार कर सुनसान बॉर्डर के रास्ते जब सीमांत गांव गट्टी राजोके में पहुंचते हैं तो सरकारी स्कूल की सुंदर इमारत दिखती है। स्कूल में प्रवेश करते ही सैटेलाइट व मिसाइल और साइंस से जुड़ी तमाम वस्तुएं रखी हैं। इनके नाम बच्चों को जुबानी रटे हुए हैं। स्कूल की प्रत्येक सीढ़ी पर अंग्रेजी की पंक्तियां लिखी गई हैं। इन्हें देखकर बच्चा आसानी से सीख सकता है। चढ़ते समय इन पंक्तियों का उच्चारण सभी बच्चे करते हैं। कंप्यूटर लैब में 10वीं की छात्रा फर्राटेदार अंग्रेजी में किसी विषय पर बोल रही थी। पंजाबी कक्ष में पंजाब के सभ्याचार और विरासत से जुड़ी वस्तुएं करीने से सजी हैं। दीवारों पर पंजाबी में महान व्यक्तियों की जीवनी अंकित है। 

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स्कूल की सभी कक्षाएं स्मार्ट है

प्रिंसिपल डॉ. सतिंदर सिंह कई अवार्ड से सम्मानित हो चुके हैं। उन्होंने बताया कि वर्ष 2017 में बतौर प्रिंसिपल तैनाती हुई तो स्कूल की हालत बहुत खस्ता थी। करीब चार सौ बच्चे पढ़ते थे और शिक्षक सिर्फ सात। अब इस स्कूल में आठ सौ से अधिक बच्चे पढ़ते हैं, जिन्हें 24 शिक्षक पढ़ाते हैं। सरकार के अलावा दानी सज्जनों के सहयोग से इमारत में सुधार किया है, छह नए कमरे बनाए हैं। स्कूल की सभी कक्षाएं स्मार्ट हैं। स्कूल में आरओ लगवाया है। 12वीं पास करने वाले ज्यादातर विद्यार्थी बीएसएफ व सेना में भर्ती हो रहे हैं। लड़कियां ईटीटी करके शिक्षक बन रही हैं। स्कूल में ऐसी साइंस लैब तैयार की है जो किसी प्राइवेट स्कूल में नहीं होगी। लाइब्रेरी है, जहां बैठकर बच्चे विभिन्न पुस्तकें पढ़ते हैं। 

टापू से घिरे स्कूल में पहुंचने के लिए नाव ही जरिया

प्रिंसिपल ने बताया कि इस इलाके में एक टापू है, जो सतलुज दरिया से घिरा हुआ है, जिसका नाम कालू वाला है। यहां से स्कूल पहुंचने के लिए नाव ही एकमात्र जरिया है। पहले एक छात्र पढ़ने आता था, अब पंद्रह बच्चे आते हैं। इसीलिए इस टापू पर प्राइमरी स्कूल स्थापित किया है ताकि छोटे बच्चे पढ़-लिख सकें। 

शिक्षा के साथ खेलकूद भी जरूरी

प्रिंसिपल ने बताया कि गट्टी राजोके स्कूल में बच्चों को अलग तरीके से शिक्षा ग्रहण करवाई जा रही है। खेलकूद पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। स्कूल में कई मेडिकल कैंप आयोजित किए हैं, ताकि बार्डर एरिया में रहने वाले ग्रामीणों का मुफ्त में इलाज हो सके। तीन सौ से ज्यादा ग्रामीणों की आंखों का ऑपरेशन करवा चुके हैं। सतलुज दरिया के प्रदूषित पानी के चलते लोग चमड़ी रोग से पीड़ित हैं। ऐसे ग्रामीणों का इलाज स्कूल में मेडिकल कैंप लगाकर किया गया है।

सिर्फ परीक्षा देने आते थे बच्चे, करते थे मजदूरी

प्रिंसिपल ने बताया कि जब उन्होंने स्कूल ज्वाइन किया तब स्कूल में बच्चों की संख्या चार सौ थी। बच्चे परीक्षा के दौरान स्कूल आते थे और बाकी दिन मजदूरी करते थे। इन बच्चों को स्कूल से जोड़ने के लिए समाजसेवी संस्थाओं की मदद ली गई। स्कूल में बच्चों को नशे और प्रदूषित वातावरण के प्रति जागरूक किया जा रहा है। स्कूल की प्रत्येक कक्षा को नाम दिया है। मैथ लैब तैयार की गई है, जिसके जरिये बहुत आसानी से बच्चों को गणित सिखाया जाता है।

गांव के लोग लड़कियों को स्कूल में नहीं पढ़ाना चाहते थे

प्रिंसिपल ने बताया कि बार्डर से सटे गांवों के लोग लड़कियों को स्कूल में पढ़ाना सही नहीं समझते थे। उन्हें बड़ी मुश्किल से समझाया गया। इसके बाद ग्रामीण लड़कियों को स्कूल भेजने लगे। लड़कियां 12वीं के बाद ईटीटी कर शिक्षक बन रही हैं। शिक्षक भी करिअर चुनने में बच्चों की मदद करते हैं। यहां की लड़कियां राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं में शिरकत कर चुकी हैं। 
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