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विभाजन की विभीषिका: जिस ट्रेन में पाकिस्तान से आई थीं लाशें.. उसके गार्ड के परिवार की यादों में आज भी दहशत

Fri, 15 Aug 2025 08:27 AM IST
निवेदिता वर्मा आशीष तिवारी, अमर उजाला, चंडीगढ़
आशीष तिवारी, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: निवेदिता वर्मा Updated Fri, 15 Aug 2025 08:27 AM IST
सार

1947 में जब भारत आजाद हुआ था, तब खुशी के साथ पंजाब से विभाजन की सिसकारी भी उठी थी। लाखों लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा था। ट्रेनों से लोगों को भारत और पाकिस्तान लाया और ले जाया गया था। ऐसी ही एक ट्रेन के गार्ड बालकृष्ण के बेटे ने अमर उजाला से खास बातचीत की। 

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Partition train in which bodies came from Pakistan guard talks with amar ujala
गार्ड बालकृष्ण और उनके बेटे अशोक कुमार - फोटो : अमर उजाला/फाइल

विस्तार

हुसैनीवाला बॉर्डर (फिरोजपुर) से पाकिस्तान की तरफ बिछी रेल पटरी दोनों देशों के बीच हुए बंटवारे के समय के कत्लेआम की याद दिलाती है। पाकिस्तान से इसी रेल पटरी पर आई ट्रेन में हिंदुओं और सिखों की खून से लथपथ लाशें लदी थीं। उस समय मेरे पिता बाल कृष्ण ट्रेन के गार्ड और पंडित रतन लाल ट्रेन पायलट थे। उन दोनों ने ट्रेन को तेज रफ्तार से दौड़ा कर सैकड़ों लोगों की जानें बचाईं थीं। ये बातें रोते हुए ट्रेन के गार्ड के बेटे अशोक कुमार ने अमर उजाला से विशेष बातचीत में बताईं।
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मक्खू से मुसलमानों को छोड़ने गए थे पाकिस्तान

फिरोजपुर के रहने वाले अशोक कुमार ने बताया कि बंटवारे के दौरान रेल अधिकारियों ने उनके पिता को आदेश दिया था कि मक्खू रेलवे स्टेशन पर मुसलमान मौजूद हैं, उन्हें ट्रेन से पाकिस्तान छोड़कर आना है। उनके गार्ड पिता और ट्रेन पायलट रतन लाल 24 बोगी वाली ट्रेन लेकर मक्खू स्टेशन पहुंचे और वहां से मुसलमानों को ट्रेन में बैठाकर पाकिस्तान छोड़ने जा रहे थे कि फिरोजपुर के पास बस्ती निजामुद्दीन में कुछ दहशतगर्द ट्रेन में घुस आए और कई लोगों को जख्मी कर लूटपाट की।
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लाइन क्लियर करने के बहाने भागे 

फिरोजपुर छावनी रेलवे स्टेशन पहुंचने के बाद उनके पिता ट्रेन लेकर पाकिस्तान के गंडा सिंह रेलवे स्टेशन को रवाना हुए। ट्रेन में सवार लोगों ने पाकिस्तानी रेल अधिकारियों से कहा कि गार्ड और ट्रेन पायलट ने उनके लोगों को मरवाया है। यह सुनकर दोनों को पकड़कर वहीं बैठा लिया था। अशोक कुमार ने बताया कि उनके पिता के मुताबिक कुछ देर बाद अनाउंसमेंट हुई कि उक्त रेलवे स्टेशन पर ट्रेन पहुंच रही है। लाइन पर फिरोजपुर से गई ट्रेन खड़ी थी। लाइन क्लियर करने के लिए वहां पर कोई गार्ड व ट्रेन पायलट नहीं था। उन्हें ही लाइन क्लियर करने को कहा गया। उनके पास बचने के लिए इससे अच्छा मौका नहीं था। उन्होंने ट्रेन की रफ्तार तेज कर सीधा फिरोजपुर शहर रेलवे स्टेशन आकर रोकी। 

सेना की टुकड़ी के साथ दोबारा गए थे पाकिस्तान

यहां पहुंचने पर अधिकारियों ने पूछा कि ट्रेन में हिंदुस्तानियों और सिखों को आना था, वे कहां हैं तो उनके पिता ने आपबीती सुनाईं। इसके बाद फिरोजपुर के रेल अधिकारियों ने ट्रेन में सेना की एक टुकड़ी के साथ फिर उनके पिता और ट्रेन पायलट को कसूर रेलवे स्टेशन भेजा। वे वहां से हिंदू व सिखों को ट्रेन से फिरोजपुर ला रहे थे कि पाकिस्तान के गंडा सिंह के पास मुसलमानों ने हमला कर दिया। ट्रेन के ऊपर और अंदर खचाखच लोग भरे हुए थे। हमले में बहुत लोग मारे गए। किसी तरह ट्रेन की रफ्तार बढ़ा कर सैकड़ों लोगों की जान बचाई। ये बातें उनके पिता बाल कृष्ण उन्हें अक्सर बताया करते थे।

1945 में गार्ड के पद पर हुई थी नियुक्ति

बाल कृष्ण की 25 अप्रैल 1945 में रेलवे में ट्रेन गार्ड के पद पर नियुक्ति हुई थी। 1947 में ट्रेन लेकर पाकिस्तान गए थे और वहां से लाशों से भरी ट्रेन लेकर फिरोजपुर आए थे। वर्ष 1965 तक गार्ड की नौकरी की। 31 मई 1984 को रेलवे से चीफ कंट्रोलर पद से सेवानिवृत्त हुए। आठ सितंबर 2019 को बाल कृष्ण का निधन हो गया। 

 
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