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Emergency@50: पंजाब से उठी थी खिलाफत की पहली आवाज... विरोध का खामियाजा आज तक भुगत रहा प्रदेश
Wed, 25 Jun 2025 08:15 AM IST
निवेदिता वर्मा
सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर (पंजाब)
सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर (पंजाब)
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Wed, 25 Jun 2025 08:15 AM IST
सार
जून 1975 में भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू कर दिया था। आपातकाल की घोषणा होते ही इंदिरा गांधी के आदेश पर शिरोमणि अकाली दल को छोड़कर लगभग सभी विपक्षी दलों के नेताओं सहित लगभग तीन हजार राजनीतिक नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया था।
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- फोटो : Adobe Stock
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विस्तार
आजादी से पहले और बाद में भी पंजाब हमेशा जुल्म के खिलाफ आवाज बुलंद करता रहा है। इमरजेंसी को 50 साल बीत चुके हैं। इमरजेंसी के खिलाफ पहली आवाज पंजाब की धरती से बुलंद हुई थी और 43 हजार पंजाबियों ने गिरफ्तारी देकर तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी को झुका दिया था।
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देश में 25 जून 1975 को आपातकाल लागू हुआ था। उन दिनों गुरुद्वारा अधिनियम-1971 के अनुसार दिल्ली गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के पहले आम चुनाव हुए थे। यह चुनाव शिरोमणि अकाली दल ने दिल्ली सिख नेता संतोख सिंह के नेतृत्व में लड़े थे, जो उस समय शिरोमणि अकाली दल के वरिष्ठ उपाध्यक्ष थे। इन चुनावों में शिरोमणि अकाली दल को किसी चुनौती का सामना नहीं करना पड़ा। वह दिल्ली गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की सत्ता पर पूरी तरह से कब्जा करने में सफल रहा। जसवंत सिंह कोचर को गुरुद्वारा कमेटी का अध्यक्ष और संतोख सिंह को गुरुद्वारा कमेटी में अकाली दल का नेता नियुक्त किया गया।
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संतोख सिंह के माध्यम से इंदिरा गांधी ने अकाली नेताओं को संदेश भेजा कि यदि वह उनका समर्थन करें, तो वह उनकी सभी मांगों को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं। संतोख सिंह ने जत्थेदार गुरचरण सिंह टोहरा को इस संबंध में सारी बातें बताईं और उनसे विस्तार से बातचीत की और इंदिरा गांधी को समर्थन देने पर आम सहमति बन रही थी लेकिन शिरोमणि अकाली दल ने प्रकाश सिंह बादल के दबाव में आपातकाल के खिलाफ मोर्चा खोलने का फैसला किया।
जत्थेदार संतोख सिंह को ही इसके लिए दोषी ठहराया गया तथा उन्हें अकाली दल से निकाल दिया गया। संतोख सिंह ने आपातकाल के मुद्दे पर इंदिरा गांधी को समर्थन देने के बारे में अपने साथियों को बताया कि जो कुछ अकाली दल लंबी लड़ाई लड़ने के बाद भी हासिल नहीं कर पा रहा था, उसे बिना किसी लड़ाई के हासिल किया जा सकता है। इस समय उनके एक साथी ने पूछा कि क्या इंदिरा गांधी पर भरोसा किया जा सकता है कि वह अपने वादों को पूरा करने में ईमानदार होंगी? तब संतोख सिंह ने जवाब दिया कि आपातकाल खत्म नहीं हो रहा है, यह अभी शुरू हुआ है। यदि इंदिरा गांधी अपने किए वादे से मुकर जातीं तो पंथ के पास उनके खिलाफ मोर्चा खोलने के लिए मजबूत आधार होगा। शिरोमणि अकाली दल ने संयुक्त घोषणा जारी करके मोर्चा खोला।
नाश्ता करते समय मिली आपातकाल लागू होने की खबर
देश में आपातकाल लागू होने की खबर तत्कालीन एसजीपीसी अध्यक्ष जत्थेदार गुरचरण सिंह टोहरा को 26 जून 1975 की सुबह उस समय मिली, जब वह गुरु नानक देव विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार प्रिंसिपल भरपूर सिंह के घर पर नाश्ता कर रहे थे। उनके निजी सहायक अविनाश सिंह ने टेलीफोन पर यह खबर दी और कहा कि देश भर में विपक्षी दलों के नेताओं की सामूहिक गिरफ्तारियां हो रही हैं, इसलिए वे श्री दरबार साहिब आएं। जत्थेदार टोहरा नाश्ता करने के बाद तुरंत श्री दरबार साहिब के लिए रवाना हो गए। जब वह भंडारी पुल से गुजर रहे थे, तो एक मीडिया कर्मी ने उनकी गाड़ी को रुकने का इशारा किया। आपातकाल पर प्रतिक्रिया देने के लिए पूछे जाने पर जत्थेदार टोहरा ने कहा कि इंदिरा गांधी को इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट द्वारा बरकरार रखे जाने के तुरंत बाद इस्तीफा दे देना चाहिए था, लेकिन इस्तीफा देने की बजाय उन्होंने आपातकाल लगाकर तानाशाही काम किया है, जिसके परिणाम इस देश और इंदिरा गांधी दोनों के लिए बहुत बुरे होंगे।अगले दिन अखबारों में आपातकाल के खिलाफ सिर्फ एक बयान छपा, वह जत्थेदार गुरचरण सिंह टोहरा का था। श्री दरबार साहिब पहुंचकर जत्थेदार टोहरा ने अपने स्टाफ से सलाह-मशविरा करने के बाद फैसला किया कि शिरोमणि अकाली दल की वर्किंग कमेटी की तुरंत मीटिंग बुलाई जाए। जब वे शिरोमणि अकाली दल के दफ्तर में गए तो वहां ताला लगा हुआ था। वर्किंग कमेटी के सदस्यों के नाम-पते टूटे हुए थे।
जत्थेदार टोहरा ने अपनी तरफ से आपातकाल से पैदा हुए हालात पर चर्चा करने के लिए 29 जून को अकाली दल की वर्किंग कमेटी की मीटिंग बुलाई। 29 जून की मीटिंग काफी जोशपूर्ण रही। मीटिंग में मौजूद लगभग सभी लोगों ने कहा कि अकाली दल को मोर्चा नहीं निकालना चाहिए। भूपिंदर सिंह मान ने तो यहां तक कह दिया कि हमारी यही हालत है, हमें कुएं में कूदना है। हमें पहले मारना है और जो कुआं पहले आए, उसमें मारना है। उन्होंने कहा कि जब कोई अकाली नेता गिरफ्तार ही नहीं हुआ तो अकालियों को मोर्चा निकालने की क्या जरूरत है? सभी ने कहा कि मोर्चे की बात ही नहीं होनी चाहिए, हां, अगर गिरफ्तारियां होती हैं तो कोई बहाना नहीं बनाया जाना चाहिए। इस बैठक में जनसंघ के नेता यज्ञ दत्त द्वारा जत्थेदार टोहरा को लिखा गया पत्र भी पढ़ा गया जिसमें उन्होंने बहुत भावुक लहजे में अकालियों से मोर्चा निकालने को कहा था।
बैठक में अपने सुझाव देने के बाद सभी ने अकाली दल के अध्यक्ष मोहन सिंह तूर, शिरोमणि कमेटी के अध्यक्ष गुरचरण सिंह टोहरा और प्रकाश सिंह बादल को अंतिम फैसला सुनाया। उस रात हुई बैठक में जत्थेदार टोहरा अपने साथ पार्टी के एक अन्य वरिष्ठ नेता जगदेव सिंह तलवंडी को भी लेकर गए थे। बैठक में जब सबसे पहले जत्थेदार टोहरा की राय पूछी गई तो उन्होंने कहा, "मैंने आपकी अनुपस्थिति में पार्टी कार्यसमिति की बैठक बुलाकर केवल अपना कर्तव्य पूरा किया है। अब फैसला अकाली दल को करना है, मुझे शिरोमणि कमेटी के अध्यक्ष के तौर पर इसकी पुष्टि करनी है। आप जो भी फैसला लेंगे, मैं वही करूंगा।" लेकिन तीनों अकाली नेता कहने लगे कि आप अपनी राय दें। जत्थेदार टोहरा ने पूछा कि क्या आप मोर्चा बनाना चाहते हैं? जब बाकी लोगों ने हां कहा तो जत्थेदार टोहरा ने कहा कि आम कार्यकर्ताओं और लोगों की बजाय सिर्फ 500-1000 चुनिंदा नेताओं को ही गिरफ्तार किया जाना चाहिए क्योंकि आपातकाल लंबे समय तक चल सकता है।
सार्वजनिक मार्च निकालने पर बनी सहमति
प्रकाश सिंह बादल ने असहमति जताते हुए कहा कि हमें सार्वजनिक मार्च निकालना चाहिए। सार्वजनिक मार्च निकालने के फैसले के बाद पहला जत्था ले जाने के बारे में चर्चा के दौरान जत्थेदार टोहरा ने बीर देविंदर सिंह का नाम सुझाया, लेकिन प्रकाश सिंह बादल ने कहा कि हम तीनों को जत्थेदार जगदेव सिंह तलवंडी के बिना पहले जत्थे में जाना चाहिए। जत्थेदार टोहरा इस प्रस्ताव पर सहमत हो गए, लेकिन जत्थेदार तलवंडी ने कहा कि वे बाहर रहकर अकेले मार्च नहीं चला पाएंगे। उन्होंने शर्त रखी कि अगर उन्हें मार्च चलाने की जिम्मेदारी दी जाती है तो जत्थेदार टोहरा उनकी मदद के लिए बाहर रहें। अंत में यह निर्णय लिया गया कि 9 जुलाई को श्री अकाल तख्त साहिब से पहले जत्थे का नेतृत्व मोहन सिंह तूर और प्रकाश सिंह बादल करेंगे।अलग-अलग जिलों की दी गई जिम्मेदारी
मोहन सिंह तूर को गुरदासपुर और अमृतसर जिले दिए गए, ताकि वे अकाली कार्यकर्ताओं को मोर्चे के लिए प्रेरित कर सकें। जत्थेदार गुरचरण सिंह टोहरा को कहा गया कि वे जालंधर, लुधियाना, रोपड़, पटियाला और संगरूर के कार्यकर्ताओं को प्रेरित करेंगे। प्रकाश सिंह बादल ने कपूरथला, फरीदकोट, मुक्तसर और बठिंडा जिलों की जिम्मेदारी ली। 6 जुलाई को अगली बैठक करने के बाद ये अकाली नेता अपने-अपने क्षेत्रों के लिए रवाना हो गए।छह जुलाई को जब जत्थेदार गुरचरण सिंह टोहरा अमृतसर लौटे, तो उन्होंने वहां अकाली नेताओं में उनके खिलाफ यह दुष्प्रचार सुना कि इंदिरा गांधी के साथ उनकी अंदरूनी सांठगांठ है, जिसके चलते वे आपातकाल के खिलाफ मोर्चा नहीं होने देना चाहते। जत्थेदार टोहरा के खिलाफ यह दुष्प्रचार मोहन सिंह तूर और प्रकाश सिंह बादल से जुड़े लोगों द्वारा किया जा रहा था। प्रकाश सिंह बादल 6 जुलाई को बैठक में भी नहीं आए। जब जत्थेदार टोहरा ने मोहन सिंह तूर से सख्त लहजे में उनके खिलाफ किए जा रहे दुष्प्रचार के बारे में पूछा तो पहले तो उन्होंने इससे इनकार कर दिया। जब जत्थेदार टोहरा ने एक व्यक्ति विशेष का नाम लेकर कहा कि आपने खुद इस व्यक्ति से ये बातें कही हैं तो वह भड़क गए और कहने लगे, चलो, गुस्सा छोड़ो। मुझे आज अपने अकाल तख्त साहिब पर लगने वाले दीवान में अपनी पूरी स्थिति स्पष्ट करनी है।
शिरोमणि अकाली दल द्वारा आयोजित मोर्चे के पहले दिन प्रकाश सिंह बादल,गुरचरण सिंह टोहरा, जगदेव सिंह तलवंडी, आत्मा सिंह, बसंत सिंह खालसा आदि नेताओं ने गिरफ्तारी के लिए खुद को पेश किया और उन्हें अनिश्चित काल के लिए जेल भेज दिया गया। 19 महीने तक चले इस मोर्चे के दौरान लगभग 43,000 सिखों को गिरफ्तार किया गया।
हालांकि शुरुआती दौर पर अकालियों व एसजीपीसी के सदस्यों में इसको लेकर एकजुटता नहीं थी लेकिन जैसे ही जुल्म के खिलाफ बिगुल बजा, सभी एकजुट हो गए और पूरी ताकत के साथ इमरजेंसी का विरोध किया गया।