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पंजाब में सीमा पर खेती, किसानों की चुनौती: मनचाही फसल नहीं, जंगली जानवरों का भी डर; काम के घंटे भी तय
Mon, 02 Nov 2026 07:57 AM IST
Nivedita
संवाद न्यूज एजेंसी, पंजाब
संवाद न्यूज एजेंसी, पंजाब
Published by: Nivedita
Updated Mon, 02 Nov 2026 07:57 AM IST
सार
पंजाब के छह सीमावर्ती जिलों में करीब 21,500 एकड़ कृषि भूमि तारबंदी और अंतरराष्ट्रीय सीमा के बीच स्थित है। करीब 220 गांवों के किसानों की खेती इस जमीन पर निर्भर है। सीमित समय के अलावा फसल चयन, सिंचाई, मजदूरों की उपलब्धता और जंगली जानवरों से फसल बचाने की समस्याएं भी उनकी मुश्किलें बढ़ा रही हैं।
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सीमा पर खेती की जंग
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे पंजाब के किसानों के लिए अपनी ही जमीन पर खेती करना बड़ी चुनौती बन गया है। सीमा पर लगी कंटीली तारबंदी के पार स्थित खेतों तक पहुंचने के लिए किसानों को रोजाना सुरक्षा जांच से गुजरना पड़ता है। बीएसएफ की निगरानी में निर्धारित समय के दौरान ही खेतों में काम करने की अनुमति मिलती है।
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सुबह पहचान पत्रों की जांच और कृषि उपकरणों की तलाशी में समय निकल जाता है, जबकि शाम को गेट बंद होने से पहले लौटना जरूरी होता है। ऐसे में किसानों को दिन में मुश्किल से 5-6 घंटे ही खेती के लिए मिल पाते हैं। पांच सीमावर्ती केंद्रों से सामने आई तस्वीर बताती है कि सुरक्षा व्यवस्था के बीच खेती करना किसानों के लिए रोजाना की जद्दोजहद बन गया है।
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अमृतसर : मजदूरों से मशीनरी तक, हर कृषि कार्य पर समय की बंदिश
सीमावर्ती खेतों में गर्मियों में आमतौर पर सुबह 9 से शाम 5 बजे तक और सर्दियों में सुबह 10 से शाम 4 बजे तक काम करने का समय निर्धारित रहता है। हालांकि, अलग-अलग बीएसएफ बटालियन और क्षेत्र की परिस्थितियों के अनुसार इसमें बदलाव हो सकता है। गेट पर पहचान पत्र दिखाने, सुरक्षा जांच और उपकरणों की तलाशी के बाद ही खेतों में जाने दिया जाता है। वापसी पर भी जांच होती है। कई बार सुबह की औपचारिकताओं में एक-दो घंटे निकल जाते हैं।
मजदूरों की उपलब्धता और लागत प्रभावित
खेतों में काम करने वाले स्थानीय मजदूरों के साथ बिहार और उत्तर प्रदेश से आने वाले प्रवासी श्रमिकों को भी पहचान पत्र सत्यापन और सुरक्षा प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। सीमित समय के कारण मजदूर पूरे दिन काम नहीं कर पाते। कई बार किसान पूरे दिन की मजदूरी देने के बावजूद उनसे पूरा काम नहीं करवा पाते। कटाई के दौरान कंबाइन और ट्रैक्टर के संचालन में भी समय की बाधा आती है।
रात में सिंचाई और मरम्मत मुश्किल
कई बार बिजली की उपलब्धता रात में होती है या ट्यूबवेल चलाने के लिए अधिक समय चाहिए होता है। लेकिन रात में आवाजाही की अनुमति नहीं होने से किसान सिंचाई नहीं कर पाते। दिन में पानी नहीं लगा तो अगली उपलब्धता का इंतजार करना पड़ता है। ट्यूबवेल खराब होने पर मरम्मत करवाना भी मुश्किल है। बिजली की सुविधा नहीं होने वाले खेतों में डीजल पंपसेट और जनरेटर ले जाने के लिए भी सुरक्षा अनुमति की जरूरत पड़ सकती है।
तीन फीट से ऊंची फसलों पर आपत्ति
कुछ क्षेत्रों में सुरक्षा एजेंसियां दृश्यता बनाए रखने के उद्देश्य से तीन फीट से अधिक ऊंचाई वाली फसलें उगाने पर आपत्ति करती रही हैं। इससे गन्ना, मक्का, ज्वार, बाजरा और सूरजमुखी की बिजाई प्रभावित होती है। किसानों के अनुमान के मुताबिक, गन्ने से प्रति एकड़ करीब 1.20 लाख रुपये तक कमाई हो सकती है, जबकि गेहूं और धान से यह 40 से 50 हजार रुपये तक रहती है। वास्तविक आमदनी लागत और बाजार भाव पर निर्भर करती है।
जंगली जानवर और मशीनरी भी चुनौती
जंगली सूअर, नीलगाय और आवारा मवेशी रात में खेतों में घुसकर फसलें बर्बाद करते हैं। किसान रात में रखवाली नहीं कर सकते। वहीं, तेज रोशनी, शोर और पटाखों से जानवर भगाने में भी सुरक्षा संबंधी सीमाएं परेशानी पैदा करती हैं। बड़े ट्रैक्टर, कंबाइन हार्वेस्टर और लेजर लैंड लेवलर ले जाने के लिए भी अनुमति जरूरी है। अप्रैल 2025 में तरनतारन के खेमकरण क्षेत्र में एक गेट से एक कंबाइन मशीन को अनुमति देने संबंधी निर्देशों पर किसानों ने आपत्ति जताई थी।
सीमावर्ती खेतों में गर्मियों में आमतौर पर सुबह 9 से शाम 5 बजे तक और सर्दियों में सुबह 10 से शाम 4 बजे तक काम करने का समय निर्धारित रहता है। हालांकि, अलग-अलग बीएसएफ बटालियन और क्षेत्र की परिस्थितियों के अनुसार इसमें बदलाव हो सकता है। गेट पर पहचान पत्र दिखाने, सुरक्षा जांच और उपकरणों की तलाशी के बाद ही खेतों में जाने दिया जाता है। वापसी पर भी जांच होती है। कई बार सुबह की औपचारिकताओं में एक-दो घंटे निकल जाते हैं।
मजदूरों की उपलब्धता और लागत प्रभावित
खेतों में काम करने वाले स्थानीय मजदूरों के साथ बिहार और उत्तर प्रदेश से आने वाले प्रवासी श्रमिकों को भी पहचान पत्र सत्यापन और सुरक्षा प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। सीमित समय के कारण मजदूर पूरे दिन काम नहीं कर पाते। कई बार किसान पूरे दिन की मजदूरी देने के बावजूद उनसे पूरा काम नहीं करवा पाते। कटाई के दौरान कंबाइन और ट्रैक्टर के संचालन में भी समय की बाधा आती है।
रात में सिंचाई और मरम्मत मुश्किल
कई बार बिजली की उपलब्धता रात में होती है या ट्यूबवेल चलाने के लिए अधिक समय चाहिए होता है। लेकिन रात में आवाजाही की अनुमति नहीं होने से किसान सिंचाई नहीं कर पाते। दिन में पानी नहीं लगा तो अगली उपलब्धता का इंतजार करना पड़ता है। ट्यूबवेल खराब होने पर मरम्मत करवाना भी मुश्किल है। बिजली की सुविधा नहीं होने वाले खेतों में डीजल पंपसेट और जनरेटर ले जाने के लिए भी सुरक्षा अनुमति की जरूरत पड़ सकती है।
तीन फीट से ऊंची फसलों पर आपत्ति
कुछ क्षेत्रों में सुरक्षा एजेंसियां दृश्यता बनाए रखने के उद्देश्य से तीन फीट से अधिक ऊंचाई वाली फसलें उगाने पर आपत्ति करती रही हैं। इससे गन्ना, मक्का, ज्वार, बाजरा और सूरजमुखी की बिजाई प्रभावित होती है। किसानों के अनुमान के मुताबिक, गन्ने से प्रति एकड़ करीब 1.20 लाख रुपये तक कमाई हो सकती है, जबकि गेहूं और धान से यह 40 से 50 हजार रुपये तक रहती है। वास्तविक आमदनी लागत और बाजार भाव पर निर्भर करती है।
जंगली जानवर और मशीनरी भी चुनौती
जंगली सूअर, नीलगाय और आवारा मवेशी रात में खेतों में घुसकर फसलें बर्बाद करते हैं। किसान रात में रखवाली नहीं कर सकते। वहीं, तेज रोशनी, शोर और पटाखों से जानवर भगाने में भी सुरक्षा संबंधी सीमाएं परेशानी पैदा करती हैं। बड़े ट्रैक्टर, कंबाइन हार्वेस्टर और लेजर लैंड लेवलर ले जाने के लिए भी अनुमति जरूरी है। अप्रैल 2025 में तरनतारन के खेमकरण क्षेत्र में एक गेट से एक कंबाइन मशीन को अनुमति देने संबंधी निर्देशों पर किसानों ने आपत्ति जताई थी।
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पठानकोट : अपनी जमीन पर मनचाही फसल भी नहीं उगा पा रहे किसान
पठानकोट जिले के सीमावर्ती किसानों के लिए तारबंदी पार खेती करना मुश्किल होता जा रहा है। सैकड़ों एकड़ कृषि भूमि होने के बावजूद वे अपनी मर्जी से फसल नहीं उगा पा रहे। किसानों के मुताबिक, गन्ना, मक्का, ज्वार, बाजरा और सूरजमुखी जैसी लंबी ऊंचाई वाली फसलों की बिजाई को लेकर सुरक्षा एजेंसियों की आपत्तियों के कारण खेती के विकल्प सीमित हो गए हैं। ऐसे में गेहूं, धान और कम ऊंचाई वाली सब्जियों पर निर्भरता बढ़ रही है। इससे फसल विविधीकरण प्रभावित होने के साथ प्रति एकड़ आमदनी पर भी असर पड़ता है।
सुरक्षा जांच में लगता है समय
किसानों और मजदूरों को खेतों में प्रवेश से पहले पहचान पत्र सत्यापन, मेटल डिटेक्टर जांच और कृषि उपकरणों की तलाशी से गुजरना पड़ता है। सुबह 9 से शाम 5 बजे तक निर्धारित समय में इन औपचारिकताओं के कारण खेती के काम के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाता। इससे बुआई, सिंचाई और कटाई प्रभावित होती है।
फिरोजपुर : फसलें उजड़ने के डर से बंद की बिजाई, खेतों में उग आया सरकंडों का जंगल
हुसैनीवाला बॉर्डर के आसपास तारबंदी पार कई इलाकों में जंगली सूअर और नीलगाय किसानों की फसलें तबाह कर रहे हैं। लगातार नुकसान के कारण कुछ किसानों ने धान, गेहूं और सब्जियों की बिजाई तक बंद कर दी है। कभी लहलहाती फसलों से भरी रहने वाली जमीन पर अब सरकंडों का जंगल उग आया है।
किसान बलविंदर सिंह ने बताया कि सीमा के नजदीक पाकिस्तान की तरफ सतलुज दरिया के बीच बने एक टापू पर जंगली सूअरों का बसेरा है। वहां से सूअर भारतीय क्षेत्र में आकर फसलें बर्बाद कर देते हैं। तारबंदी पार उनकी करीब 30 एकड़ जमीन है। धान, गेहूं या सब्जियों की खेती करने पर जंगली सूअर और नीलगाय फसल नष्ट कर देते हैं। लगातार नुकसान के कारण खेती घाटे का सौदा बन गई है।
किसान बलवीर सिंह ने बताया कि पाकिस्तान के गांव भिखी पिंड के आसपास उनकी जमीन है। सतलुज के बीच बने टापू से जंगली सूअर सीमा पार कर भारतीय खेतों में पहुंचते हैं। इसी कारण उन्होंने भी जमीन पर फसलें उगाना बंद कर दिया है।
देसी बम के इस्तेमाल पर पाबंदी
किसानों के मुताबिक, पहले कुछ लोग जंगली जानवरों को मारने के लिए पोटाश और आटे से बने देसी बम खेतों में रखते थे। इन्हें खाने पर धमाका होता था। हालांकि, इस खतरनाक तरीके से किसानों को भी नुकसान हुआ। इसके बाद जिला प्रशासन ने ऐसे देसी बम बनाने और इस्तेमाल करने पर पाबंदी लगा दी। अब किसान इनका इस्तेमाल नहीं करते।
पठानकोट जिले के सीमावर्ती किसानों के लिए तारबंदी पार खेती करना मुश्किल होता जा रहा है। सैकड़ों एकड़ कृषि भूमि होने के बावजूद वे अपनी मर्जी से फसल नहीं उगा पा रहे। किसानों के मुताबिक, गन्ना, मक्का, ज्वार, बाजरा और सूरजमुखी जैसी लंबी ऊंचाई वाली फसलों की बिजाई को लेकर सुरक्षा एजेंसियों की आपत्तियों के कारण खेती के विकल्प सीमित हो गए हैं। ऐसे में गेहूं, धान और कम ऊंचाई वाली सब्जियों पर निर्भरता बढ़ रही है। इससे फसल विविधीकरण प्रभावित होने के साथ प्रति एकड़ आमदनी पर भी असर पड़ता है।
सुरक्षा जांच में लगता है समय
किसानों और मजदूरों को खेतों में प्रवेश से पहले पहचान पत्र सत्यापन, मेटल डिटेक्टर जांच और कृषि उपकरणों की तलाशी से गुजरना पड़ता है। सुबह 9 से शाम 5 बजे तक निर्धारित समय में इन औपचारिकताओं के कारण खेती के काम के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाता। इससे बुआई, सिंचाई और कटाई प्रभावित होती है।
फिरोजपुर : फसलें उजड़ने के डर से बंद की बिजाई, खेतों में उग आया सरकंडों का जंगल
हुसैनीवाला बॉर्डर के आसपास तारबंदी पार कई इलाकों में जंगली सूअर और नीलगाय किसानों की फसलें तबाह कर रहे हैं। लगातार नुकसान के कारण कुछ किसानों ने धान, गेहूं और सब्जियों की बिजाई तक बंद कर दी है। कभी लहलहाती फसलों से भरी रहने वाली जमीन पर अब सरकंडों का जंगल उग आया है।
किसान बलविंदर सिंह ने बताया कि सीमा के नजदीक पाकिस्तान की तरफ सतलुज दरिया के बीच बने एक टापू पर जंगली सूअरों का बसेरा है। वहां से सूअर भारतीय क्षेत्र में आकर फसलें बर्बाद कर देते हैं। तारबंदी पार उनकी करीब 30 एकड़ जमीन है। धान, गेहूं या सब्जियों की खेती करने पर जंगली सूअर और नीलगाय फसल नष्ट कर देते हैं। लगातार नुकसान के कारण खेती घाटे का सौदा बन गई है।
किसान बलवीर सिंह ने बताया कि पाकिस्तान के गांव भिखी पिंड के आसपास उनकी जमीन है। सतलुज के बीच बने टापू से जंगली सूअर सीमा पार कर भारतीय खेतों में पहुंचते हैं। इसी कारण उन्होंने भी जमीन पर फसलें उगाना बंद कर दिया है।
देसी बम के इस्तेमाल पर पाबंदी
किसानों के मुताबिक, पहले कुछ लोग जंगली जानवरों को मारने के लिए पोटाश और आटे से बने देसी बम खेतों में रखते थे। इन्हें खाने पर धमाका होता था। हालांकि, इस खतरनाक तरीके से किसानों को भी नुकसान हुआ। इसके बाद जिला प्रशासन ने ऐसे देसी बम बनाने और इस्तेमाल करने पर पाबंदी लगा दी। अब किसान इनका इस्तेमाल नहीं करते।
फाजिल्का : धान-गेहूं और चारे तक सिमटी खेती, नरमे से भी कर रहे परहेज
फाजिल्का के सीमावर्ती गांवों में किसान सुरक्षा नियमों और जंगली जानवरों के कारण खेती के सीमित विकल्पों से जूझ रहे हैं। हरजीत सिंह कबूल साह, असफवाला के मंगत सिंह, नानक सिंह और किसान श्रीराम ग्रोवर के अनुसार, खेतों में काम करने के लिए सीमित समय मिलने से ऐसी फसलें उगाना मुश्किल हो जाता है, जिनकी नियमित देखभाल जरूरी होती है।
लंबी ऊंचाई वाली फसलों की बिजाई में आने वाली दिक्कतों के चलते किसान धान, गेहूं और पशुओं के चारे तक सीमित होते जा रहे हैं। किसान कपास यानी नरमे की बिजाई से भी गुरेज करने लगे हैं, क्योंकि इसकी देखभाल और समय पर कृषि कार्य पूरे करना उनके लिए चुनौती है।
किसानों के मुताबिक, सिंचाई, निराई और दूसरे जरूरी काम समय पर नहीं हो पाते। जंगली सूअर, नीलगाय और आवारा पशुओं से फसलों को नुकसान पहुंचता है। रात में खेतों में जाकर रखवाली नहीं कर पाने से नुकसान का खतरा बढ़ जाता है। किसानों ने मांग की है कि सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखते हुए खेतों में काम करने के लिए पर्याप्त समय और जंगली जानवरों से फसल बचाने के उचित प्रबंध किए जाएं।
तरनतारन : खालड़ा के किसानों को लंबी फसलों की बिजाई में दिक्कत
तरनतारन जिले के सीमावर्ती गांवों में किसानों की जमीन तारबंदी और अंतरराष्ट्रीय सीमा के बीच स्थित है। खालड़ा के किसान सुरजीत सिंह, हरपाल सिंह, सतनाम सिंह और गुरदीप सिंह के अनुसार, गन्ना, मक्का, ज्वार, बाजरा और सूरजमुखी जैसी लंबी फसलों की बिजाई को लेकर सुरक्षा संबंधी आपत्तियों का सामना करना पड़ता है। इसके चलते किसान गेहूं, दलहन और सब्जियों जैसी कम ऊंचाई वाली फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। इससे फसल चक्र और प्रति एकड़ आमदनी प्रभावित होने की आशंका है।
मजदूरों को लाने में भी परेशानी
किसान बलकार सिंह, अमनदीप सिंह और जोबन प्रीत सिंह के मुताबिक, मजदूरों को खेतों तक ले जाना आसान नहीं है। सुरक्षा जांच और सीमित समय के कारण मजदूरों को काम के लिए कम वक्त मिलता है। कई बार स्थानीय और प्रवासी मजदूर भी ऐसी परिस्थितियों में काम करने से कतराते हैं। इससे मजदूरी की लागत बढ़ती है और कृषि कार्यों में देरी होती है।
सिंचाई और मशीनरी के लिए मंजूरी जरूरी
रात में आवाजाही की अनुमति नहीं होने से सिंचाई प्रभावित होती है। बिजली और ट्यूबवेल की उपलब्धता के अलावा डीजल पंपसेट, जनरेटर और ईंधन ले जाने के नियम भी किसानों की परेशानी बढ़ाते हैं। कंबाइन हार्वेस्टर, बड़े ट्रैक्टर और लेजर लैंड लेवलर खेतों तक पहुंचाने के लिए सुरक्षा मंजूरी और प्रशासनिक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।
सुरक्षा और आजीविका के बीच संतुलन की मांग
सीमावर्ती किसानों की मांग है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के नियमों का पालन करते हुए खेती के लिए व्यावहारिक सुविधाएं दी जाएं। फसल चयन को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश, खेतों में आने-जाने के समय में जरूरत के अनुसार सुविधा और कृषि मशीनरी व ईंधन ले जाने की पारदर्शी व्यवस्था होनी चाहिए।
फाजिल्का के सीमावर्ती गांवों में किसान सुरक्षा नियमों और जंगली जानवरों के कारण खेती के सीमित विकल्पों से जूझ रहे हैं। हरजीत सिंह कबूल साह, असफवाला के मंगत सिंह, नानक सिंह और किसान श्रीराम ग्रोवर के अनुसार, खेतों में काम करने के लिए सीमित समय मिलने से ऐसी फसलें उगाना मुश्किल हो जाता है, जिनकी नियमित देखभाल जरूरी होती है।
लंबी ऊंचाई वाली फसलों की बिजाई में आने वाली दिक्कतों के चलते किसान धान, गेहूं और पशुओं के चारे तक सीमित होते जा रहे हैं। किसान कपास यानी नरमे की बिजाई से भी गुरेज करने लगे हैं, क्योंकि इसकी देखभाल और समय पर कृषि कार्य पूरे करना उनके लिए चुनौती है।
किसानों के मुताबिक, सिंचाई, निराई और दूसरे जरूरी काम समय पर नहीं हो पाते। जंगली सूअर, नीलगाय और आवारा पशुओं से फसलों को नुकसान पहुंचता है। रात में खेतों में जाकर रखवाली नहीं कर पाने से नुकसान का खतरा बढ़ जाता है। किसानों ने मांग की है कि सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखते हुए खेतों में काम करने के लिए पर्याप्त समय और जंगली जानवरों से फसल बचाने के उचित प्रबंध किए जाएं।
तरनतारन : खालड़ा के किसानों को लंबी फसलों की बिजाई में दिक्कत
तरनतारन जिले के सीमावर्ती गांवों में किसानों की जमीन तारबंदी और अंतरराष्ट्रीय सीमा के बीच स्थित है। खालड़ा के किसान सुरजीत सिंह, हरपाल सिंह, सतनाम सिंह और गुरदीप सिंह के अनुसार, गन्ना, मक्का, ज्वार, बाजरा और सूरजमुखी जैसी लंबी फसलों की बिजाई को लेकर सुरक्षा संबंधी आपत्तियों का सामना करना पड़ता है। इसके चलते किसान गेहूं, दलहन और सब्जियों जैसी कम ऊंचाई वाली फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। इससे फसल चक्र और प्रति एकड़ आमदनी प्रभावित होने की आशंका है।
मजदूरों को लाने में भी परेशानी
किसान बलकार सिंह, अमनदीप सिंह और जोबन प्रीत सिंह के मुताबिक, मजदूरों को खेतों तक ले जाना आसान नहीं है। सुरक्षा जांच और सीमित समय के कारण मजदूरों को काम के लिए कम वक्त मिलता है। कई बार स्थानीय और प्रवासी मजदूर भी ऐसी परिस्थितियों में काम करने से कतराते हैं। इससे मजदूरी की लागत बढ़ती है और कृषि कार्यों में देरी होती है।
सिंचाई और मशीनरी के लिए मंजूरी जरूरी
रात में आवाजाही की अनुमति नहीं होने से सिंचाई प्रभावित होती है। बिजली और ट्यूबवेल की उपलब्धता के अलावा डीजल पंपसेट, जनरेटर और ईंधन ले जाने के नियम भी किसानों की परेशानी बढ़ाते हैं। कंबाइन हार्वेस्टर, बड़े ट्रैक्टर और लेजर लैंड लेवलर खेतों तक पहुंचाने के लिए सुरक्षा मंजूरी और प्रशासनिक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।
सुरक्षा और आजीविका के बीच संतुलन की मांग
सीमावर्ती किसानों की मांग है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के नियमों का पालन करते हुए खेती के लिए व्यावहारिक सुविधाएं दी जाएं। फसल चयन को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश, खेतों में आने-जाने के समय में जरूरत के अनुसार सुविधा और कृषि मशीनरी व ईंधन ले जाने की पारदर्शी व्यवस्था होनी चाहिए।