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कोरोना वायरस को हराने के लिए विज्ञान एवं तकनीक के साथ कंधे के साथ कंधा मिला कर चल रहा गुरदासपुर 18-27-57
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अब कोरोना संक्रमित नहीं छुपा पाएंगे अपने संपर्क
कोविड हॉटस्पॉट फारकास्टिंग सिस्टम से मिल जाएगी सारी जानकारी
मनन सैनी
गुरदासपुर। जिले में इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के सहयोग से आईआईटी चेन्नई की ओर से बनाई गई कोविड हॉटस्पॉट फारकास्टिंग सिस्टम (इतिहास) के जरिए बटाला में कोरोना के 8 केस ट्रेस किए गए हैं। डीसी मोहम्मद इश्फाक का कहना है कि कुछ जगह देखा गया है कि लोग अपने कांटेक्ट छिपा लेते है। उक्त सभी केस बटाला के हॉटस्पॉट इलाकों से निकले हैं जहां इतिहास साफ्टवेयर की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
ऐसे काम करता है सॉफ्टवेयर
इतिहास साफ्टवेयर आईसीएमआर में दर्ज संक्रमित मरीजों का डाटा एवं कोवा एप, आरोग्य सेतु के जरिए मिला डाटा, 104 नंबर पर आई कॉल, एनालाइज करता है। इसे मोबाइल टावर ट्रेड एनालेसिस कहा जाता है। इसके जरिए संक्रमित मरीजों की पिछले 15 दिन की गतिविधियां एनालाइज की जाती हैं। इससे पता चलता है कि संक्रमित मरीज किस किस मोबाइल टावर के अधीन गया था। इससे मरीज चाहकर भी अपनी लोकेशन नहीं छिपा सकता।
साफ्टवेयर उभरते हुए हॉटस्पॉट संबंधी भी अलर्ट करता है। गुरदासपुर को लाइट ब्लू, डार्क ब्लू, अंबर और पिंक में कैटेगराइज किया गया है। लाइट ब्लू या डार्क ब्लू होने पर साफ्टवेयर दर्शाता है कि कौन सा एरिया एक्शन हॉटस्पॉट बन सकता है। सीधा ऐंबर या पिंक जोन साफ्टवेयर बनाता है तो टेस्टिंग की जरूरत है।
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कितने मरीज कितने समय के लिए किस एरिया में रहे, इसका साफ्टवेयर के जरिए पता चलता है। हाई स्कोर और हाई टाईमिंग के जरिए ही साफ्टवेयर स्कोर बनाता है। 235 से 250 स्कोर होने पर वह एक्शन हॉटस्पॉट बन जाता है। वहां पर तत्काल टेस्टिंग करवाई जाती है। यह बैंक, बाजारों, इत्यादि में बेहद कारगर साबित होता है और बीमारी का पता लगने से पहले ही उसे फैलने से रोका जा सकता है।
पहले प्रशासन को संदिग्ध ट्रेस करने में काफी दिक्कत आती थी और सैंपलिंग भी ज्यादा होती थी। अब दर्शाई गई जगह पर जाकर भी सैंपल लिए जाते हैं और उस एरिया से संक्रमण फैलने से बच जाता है। इस तरह अगर कोई संक्रमित मरीज छिपाए तो भी प्रशासन को साफ्टवेयर के जरिए पता चल जाता है और वहां तत्काल सैंपलिंग की जाती है। संक्रमित मरीज किसी भी जिले या राज्य का हो, उसकी जानकारी प्रशासन को मिल जाती है।
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कोविड हॉटस्पॉट फारकास्टिंग सिस्टम से मिल जाएगी सारी जानकारी
मनन सैनी
गुरदासपुर। जिले में इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के सहयोग से आईआईटी चेन्नई की ओर से बनाई गई कोविड हॉटस्पॉट फारकास्टिंग सिस्टम (इतिहास) के जरिए बटाला में कोरोना के 8 केस ट्रेस किए गए हैं। डीसी मोहम्मद इश्फाक का कहना है कि कुछ जगह देखा गया है कि लोग अपने कांटेक्ट छिपा लेते है। उक्त सभी केस बटाला के हॉटस्पॉट इलाकों से निकले हैं जहां इतिहास साफ्टवेयर की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
ऐसे काम करता है सॉफ्टवेयर
इतिहास साफ्टवेयर आईसीएमआर में दर्ज संक्रमित मरीजों का डाटा एवं कोवा एप, आरोग्य सेतु के जरिए मिला डाटा, 104 नंबर पर आई कॉल, एनालाइज करता है। इसे मोबाइल टावर ट्रेड एनालेसिस कहा जाता है। इसके जरिए संक्रमित मरीजों की पिछले 15 दिन की गतिविधियां एनालाइज की जाती हैं। इससे पता चलता है कि संक्रमित मरीज किस किस मोबाइल टावर के अधीन गया था। इससे मरीज चाहकर भी अपनी लोकेशन नहीं छिपा सकता।
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साफ्टवेयर उभरते हुए हॉटस्पॉट संबंधी भी अलर्ट करता है। गुरदासपुर को लाइट ब्लू, डार्क ब्लू, अंबर और पिंक में कैटेगराइज किया गया है। लाइट ब्लू या डार्क ब्लू होने पर साफ्टवेयर दर्शाता है कि कौन सा एरिया एक्शन हॉटस्पॉट बन सकता है। सीधा ऐंबर या पिंक जोन साफ्टवेयर बनाता है तो टेस्टिंग की जरूरत है।
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कितने मरीज कितने समय के लिए किस एरिया में रहे, इसका साफ्टवेयर के जरिए पता चलता है। हाई स्कोर और हाई टाईमिंग के जरिए ही साफ्टवेयर स्कोर बनाता है। 235 से 250 स्कोर होने पर वह एक्शन हॉटस्पॉट बन जाता है। वहां पर तत्काल टेस्टिंग करवाई जाती है। यह बैंक, बाजारों, इत्यादि में बेहद कारगर साबित होता है और बीमारी का पता लगने से पहले ही उसे फैलने से रोका जा सकता है।
पहले प्रशासन को संदिग्ध ट्रेस करने में काफी दिक्कत आती थी और सैंपलिंग भी ज्यादा होती थी। अब दर्शाई गई जगह पर जाकर भी सैंपल लिए जाते हैं और उस एरिया से संक्रमण फैलने से बच जाता है। इस तरह अगर कोई संक्रमित मरीज छिपाए तो भी प्रशासन को साफ्टवेयर के जरिए पता चल जाता है और वहां तत्काल सैंपलिंग की जाती है। संक्रमित मरीज किसी भी जिले या राज्य का हो, उसकी जानकारी प्रशासन को मिल जाती है।