Kargil Diwas: 25 दुश्मनों को ढेर कर शहीद हुए थे नायक अजायब सिंह, डरे पाकिस्तान ने धोखे से पीठ पर किया था वार
शहीद अजायब सिंह की पत्नी मनजीत कौर कहती हैं कि उनके पति सच्चे देशभक्त थे। उनकी कमी जरूर महसूस होती है, लेकिन देश की रक्षा के लिए दी शहादत पर उन्हें फख्र है। उन्होंने बताया कि मुझे डीसी कार्यालय में क्लर्क की नौकरी मिली, पर दो बच्चों राविंदर सिंह व बेटी प्रभजोत कौर की परवरिश के कारण नौकरी छोड़ दी।
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वतन पर मिटने वाले इन शहीदों को नमन। कारगिल विजय दिवस पर एक ऐसे जांबाज की वीरगाथा का वर्णन कर रहे हैं, जिसकी शहादत के बाद शहीद के गांव के कई युवाओं ने भारतीय सेना ज्वाइन की। 1999 में टाइगर हिल पर तिरंगा फहराने से चंद मिनट पहले 8-सिख रेजिमेंट के नायक अजायब सिंह दुश्मनों से लोहा ले रहे थे।
पीठ पर चलाई थीं गोलियां
नायक अजायब सिंह ने पाकिस्तान के 25 सैनिकों को ढेर कर दिया था। अजायब सिंह ने जब अपने पीछे खड़े भारतीय सैनिकों की ओर मुंह कर अपने दोनों हाथ उठाकर फतह बुलाई। तभी सीमा के उस पार से पाकिस्तानी सैनिक ने उनकी पीठ पर गोलियां चला दीं। दुश्मन की इस कायराना हरकत के बाद अजायब सिंह ने टाइगर हिल के नजदीक आखिरी सांस ली। आंखें बंद करने से पहले उनके मुंह से जय हिंद निकला।
बेटे की मौत के दो साल माता-पिता ने तोड़ा दम
7 जुलाई 1999 को शहीद हुए गांव जहांगीर के इस सपूत का तिरंगे में लिपटा शव जब उनके पैतृक गांव जहांगीर पहुंचा तो सभी की आंखें नम हो गईं। शहीद अजायब के बड़े भाई जोगिंदर सिंह बताते हैं कि अजायब सिंह 1984 में सेना में भर्ती हुए थे। अजायब सिंह की मौत के दो वर्ष बाद ही माता-पिता का भी देहांत हो गया। अजायब सिंह के साथ ही उनके ताया का बेटा जसपाल सिंह भी जंग-ए-मैदान (टाइगर गिल) में था। वहां जसपाल को गोली लगी तो अजायब सिंह ने उसे अस्पताल पहुंचाया और फिर से वीरभूमि पर लौट गया। सरकार ने गांव के एलिमेंटरी स्कूल को उनके शहीद भाई अजायब सिंह सरकारी एलिमेंटरी स्कूल का नाम दिया है।
पति की शहादत पर फख्र : मनजीत कौर
शहीद अजायब सिंह की पत्नी मनजीत कौर कहती हैं कि उनके पति सच्चे देशभक्त थे। उनकी कमी जरूर महसूस होती है, लेकिन देश की रक्षा के लिए दी शहादत पर उन्हें फख्र है। उन्होंने बताया कि मुझे डीसी कार्यालय में क्लर्क की नौकरी मिली, पर दो बच्चों राविंदर सिंह व बेटी प्रभजोत कौर की परवरिश के कारण नौकरी छोड़ दी। इसके बाद उन्हें सरकार ने गैस एजेंसी अलॉट कर दी। सरकार से रंज है कि कई सालों के बाद उनके पति के नाम पर गांव का यादगारी गेट बनाया गया।
टाइगर हिल की तरफ बढ़ते हुए वन टू वन करते हुए घुटना और कोहनी छिल चुकी थीं। शरीर के पास से गोलियां निकलने पर शरीर में सिहरन दौड़ जाती। ऐसे हालातों में भी डिगे नहीं बल्कि और हौसले के साथ आगे बढ़ते जा रहे थे। सीधी चढ़ाई के कारण मुश्किल तो पहाड़ जैसी थी पर न रुके न थके, दुश्मन की गोलियों का जवाब देते हुए आगे ही बढ़ते रहे, आखिरकार मिशन कंप्लीट कर 21 जुलाई 1999 को टाइगर हिल की एक पोस्ट पर तिरंगा फहराने में सफलता हासिल की।
अमृतसर के कारगिल युद्ध के विजेता 8 सिख लाइट इंफेंटरी रेजिमेंट के नायब हवलदार अंग्रेज सिंह उस समय को याद कर रोमांचित हो जाते हैं। घातक प्लाटून (कमांडोज) ने टाइगर हिल पर मौजूद पाकिस्तानी सैनिकों में दहशत भर दी। आपरेशन विजय 21 मई को शुरू हुआ। उनकी रेजिमेंट के जवानों ने दुश्मन को जवाब देते हुए लेफ्टिनेंट कनद भट्टाचार्य, सूबेदार निर्मल सिंह, नायब सूबेदार करनैल सिंह, सूबेदार जोगिंदर सिंह और नायब सूबेदार रवैल सिंह समेत रेजिमेंट के 30 से ज्यादा जांबाजों ने शहादत पाई। टाइगर हिल पर कब्जा करने में सिख रेजिमेंट के साथ 18 ग्रेनेडियर रेजिमेंट ने बहादुरी से लड़ते हुए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और टाइगर हिल पर सभी भारतीयों पोस्टों को पाकिस्तान से मुक्त करवा वहां तिरंगा फहराया।
सूबेदार अंग्रेज सिंह ने बताया कि उनकी रेजिमेंट मामून (पठानकोट) में तैनात थी, तो वहां से 6 मई को उनकी रेजिमेंट श्रीनगर के लिए रवाना हुई। आठ मई को द्रास और नौ मई को उनकी कंपनी टाइगर गिल की पहाड़ियों के नीचे पहुंच गए। यह वही दिन था जब पाकिस्तानी सैनिकों ने टाइगर हिल की पहाड़ियों पर भारत की 52 पोस्टों पर कब्जा किया। इन्हें मुक्त करवाने तथा पाकिस्तानी सैनिकों को भगाने के लिए 21 मई 1999 को आपरेशन विजय शुरू हुआ। बोले सौ निहाल सतश्री अकाल के जयघोष के बीच रेजिमेंट के जवान और अधिकारी लगातार टाइगर हिल की पहाड़ी पर चढ़ते रहे और 26 जुलाई को उक्त सभी पोस्टों को मुक्त करवा लिया। सूबेदार अंग्रेज सिंह कहते हैं, कि उन्हें गर्व है कि वह उस रेजिमेंट और कंपनी का हिस्सा बने, जिसने टाइगर हिल पर फतेह पाई।