उत्तराखंड के देवाल स्थित पर्यटन एवं धार्मिक स्थल वाण के लाटू मंदिर में श्रद्धालु अंदर प्रवेश नहीं करते, बल्कि मंदिर से 30 मीटर दूर परिसर में ही रहकर पूजा करते हैं। मंदिर के अंदर केवल पुजारी प्रवेश करता है वो भी आंख पर पट्टी बांधकर। इसी रहस्य और आस्था से यहां हर साल हजारों श्रद्धालु जुटते हैं।
तस्वीरें, इस मंदिर में भगवान को देखने पर भक्त हो जाते हैं अंधे
वाण गांव हर बारह साल में होने वाली सबसे लंबी पैदल यात्रा श्रीनंदा देवी राजजात यात्रा का 12वां पड़ाव है। लाटू देवता को मां
नंदा का धर्म भाई माना जाता है और वह यात्रा के दौरान वाण से लेकर होमकुंड तक यात्रा की अगुवानी करते हैं। हर साल
बैशाख पूर्णिमा के दिन लाटू देवता मंदिर के कपाट खोले जाते हैं।
तस्वीरें, इस मंदिर में भगवान को देखने पर भक्त हो जाते हैं अंधे
ग्रामीण हीरा सिंह ने बताया कि 5 से 7 की संख्या में गांव के लोग, कुल पुरोहित तथा लाटू के पुजारी देव स्तुति करते हैं। यहां से मंदिर में प्रवेश केवल मंदिर के पुजारी आंख पर पट्टी बांधकर ही करते आए हैं।
तस्वीरें, इस मंदिर में भगवान को देखने पर भक्त हो जाते हैं अंधे
अगर मंदिर के अंदर पुजारी बिना आंखों पर पट्टी पर बांधकर जाता है तो वहां से एक तेज रोशनी निकलती है जिससे व्यक्ति अंधा हो जाता है। इसलिए यहां पुजारी हमेशा आंखों पर पट्टी पर अंदर जाता है।
तस्वीरें, इस मंदिर में भगवान को देखने पर भक्त हो जाते हैं अंधे
हीरा सिंह, खीम सिंह ने बताया कि लोककथाओं के अनुसार लाटू को मां नंदा का धर्म भाई माना गया है। जब मां नंदा अपने
धर्म भाई लाटू के साथ वाण से कैलाश की ओर जा रही थी तब वाण में लाटू को प्यास लगने पर उसने गलती से एक घड़े में
रखे जाम को पानी समझकर पी लिया था। इससे कुपित होकर लाटू ने अपनी जीभ काट दी। इसी दिन से इनकी पूजा की
जाती है।