अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाराणसी में मेहनत से मुकाम पाने वाली नारी शक्ति को सम्मानित किया। बड़ा लालपुर स्थित हस्तकला संकुल में स्वयं सहायता समूह की महिलाएं पीएम के सामने अपने सफलता की कहानी भी सुनाई और प्रधानमंत्री ने प्रशस्ति पत्र देकर उनका सम्मान किया। पढ़िए इन सबलाओं की कहानी जिनको पीएम मोदी ने किया सम्मानित। पढ़ें आगे की स्लाइड्स में...
मेहनत से पाया मुकाम, पीएम मोदी ने भी किया सम्मान, पढ़ें इन महिलाओं के संघर्ष की दास्तां
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाराणसी की नीलम प्रधान को सबसे सफल समूह सखी श्रेणी और लाजवंती को सबसे सफल बैंक सखी के रुप में सम्मानित किया। सबसे बेहतर फेडरेशन के लिए सोनभद्र की रिंकी देवी को पुरस्कृत किया गया। बेस्ट इंटरपेन्योर अंडर एसवीईपी के तहत मिर्जापुर की पानकली और सोनभद्र की रेनू देवी को पीएम ने सम्मानित किया।
इसके अलावा वाराणसी की तीन महिलाओं को खादी ग्रामोद्योग बोर्ड की ओर से जरूरी उपकरण दिया दिया। सुषमा सिंह को सोलर चरखा, मनीषा देवी को इलेक्ट्रिक चॉक और संतरी देवी को हनी बी बॉक्स दिया गया। वहीं वाराणसी की सुमन पाल और गृहस्वामिनी डेमो चेक दिया, तो वहीं रीना सिंह और लक्ष्मी देवी ‘भारत के वीर चेक’ प्रदान किया।
वाराणसी की नीलम प्रधान ने अपने गांव विकासखंड अराजीलाइन की वंचित महिलाओं को समूह से जोड़कर अपने गांव की तरक्की में योगदान दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नीलम को प्रशस्तिपत्र दिया। नीलम ने बताया कि घर की चार दीवारियों में जिंदगी सामान्य तरीके से चल रही थी। आर्थिक समस्याएं थी जिससे केवल पति जूझते और सांत्वना देते की सब ठीक हो जाएगा। कुछ रिश्तेदारों से महिला समूह के बारे में पता चला। 2016 में नीलम रोशनी महिला ग्राम संगठन से जुड़ीं। उसके काम करने का तरीका समझा। फिर खुद आस-पास के गांव की महिलाओं को समूह से जोड़ने में जुट गई। आज आलम यह है कि बच्चों की पढ़ाई से सखियों के बेटी की शादी तक का खर्च हम सब मिलकर उठाते हैं। किसी भी समूह सदस्य की जरूरत पर तन-मन और धन से खड़े रहते हैं। आस-पास के 10-15 गांवों में पहचान है और एक दूसरे के सहयोग और बल पर हम अपने परिवार की हर कदम पर मदद करते हैं।
वाराणसी के आदर्श ग्राम जयापुर की रहने वाली लाजवंती को सिंडिकेट बैंक में बैंक सखी के रूप में कार्य कर रही हैं। उनके द्वारा कुल 60 समूहों को बैंकिंग सेवाएं प्रदान की जा रही हैं। उन्होंने अनुभव साझा करते हुए कहा कि जीवन में बहुत संघर्ष और समस्याएं थीं। 27 मई 2017 चंदापुर के एक ग्राम संगठन से जुड़ी। शुरू-शुरू में बैंक में खाता खुलवाने जाने पर लोग या तो हटा देते थे या फिर ‘कल आना’ कहकर टाल मटोल करते थे। फिर बैंक सखी बनने की ठानी और शुरुआत में ही 30 समूह के खाते खोल दिए। 12वीं तक की पढ़ाई की है और बैंक में पूरे सम्मान के साथ लोगों के खाते बैंक कर्मियों के कंधे से कंधा मिलाकर खुलवाती हूं। महिला सखियों के खाते खोलने, पैसे जमा करने आदि को लेकर अब कोई समस्या नहीं झेलनी पड़ती। अब महिलाएं बाहर निकल रही हैं और पुरुषों के साथ कदम ताल कर रही हैं। 10 से 15 गांव से परिचित हूं। लोगों से बहुत सम्मान भी मिलता है।