क्रांतिधरा मेरठ में स्थित श्री औघड़नाथ शिव मंदिर एक प्राचीन सिद्धपीठ है। यहां प्राचीन काल से शिव की अराधना की जाती है। इस मंदिल में शिवलिंग स्वयंभू हैं। भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करने वाले औघड़दानी शिवस्वरूप हैं। इसी कारण इसका नाम औघड़नाथ शिव मंदिर पड़ा।
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औघड़नाथ मंदिर
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बाबा औघड़नाथ मंदिर के पुजारी पंडित श्रीधर त्रिपाठी ने बताया कि रुद्र के नेत्र ही रुद्राक्ष कहलाते हैं। रुद्राक्ष मानव के जीवन में सकारात्मक प्रभाव लाते है। शनि पीठ के महामंडलेश्वर महेंद्र दास जी ने बताया कि महाशिवरात्रि में केवल पांच प्रकार की पूजा से ही पंच तत्वों का संतुलन हो जाता है। शास्त्रों में पूजा के पांच प्रकार बताए गए है। अभिगमन, उपादान, योग, स्वाध्याय और इज्या।
वहीं जब पंडित जी से औघड़नाथ मंदिर के स्थापना दिवस के बारे में पूछा गया तो उन्होंने बताया कि 1857 की क्रांति के समय से ही यह मंदिर यहां स्थित हैं। हालांकि कुछ लोग यह भी मानते हैं कि औघड़नाथ मंदिर प्रथम क्रांति के समय से पहले ही यहां स्थित हैं।
उन्होंने बताया कि यहां देश-विदेश से भक्त आते हैं। पंडित जी ने कहा कि जो लोग यहां सच्ची श्रृद्धा से आते हैं और उनकी मनोकामना पूरी होती है।
राजराजेश्वरी मंडिर के पुजारी दिव्यानंद जी महाराज और मंदिर महादेव के पुजारी संजय त्रिपाठी ने बताया कि फूल और फल व पत्ते पेड़ों पर जिस तरह उगते हैं ठीक उसी तरह से दाहिने हाथ की हथेली को सीधा करके मध्यमा अनामिका और अंगूठे की सहायता से इस प्रकार चढ़ाए तकि फूल व फल के मुख ऊपर की तरफ हो।