करवाचौथ पर बादलों के कारण चंद्रमा के दर्शन न हों तो व्रत रखने वाली महिलाओं के मन में पूजा और व्रत पारण को लेकर सवाल उठ सकते हैं। मेरठ में चंद्रोदय का समय रात 8:09 बजे बताया गया है। आचार्यों के अनुसार, ऐसी स्थिति में संकल्प के साथ पूजा-अर्चना का विधान अपनाया जा सकता है।
करवाचौथ पर चंद्रमा के दर्शन और अर्घ्यदान का विशेष महत्व माना जाता है। हालांकि, बादलों के कारण चंद्रमा दिखाई न देने पर व्रत रखने वाली महिलाओं को पूजा और व्रत के पारण को लेकर चिंता हो सकती है। मेरठ में चंद्रोदय का समय रात 8:09 बजे बताया गया है। आचार्यों ने ऐसी परिस्थिति में संकल्प लेकर विधि-विधान से पूजा करने की सलाह दी है।
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करवा चौथ पर तैयारियों में जुटी सुहागिनें
- फोटो : अमर उजाला
चंद्रमा न दिखे तो चावल की वेदी पर बनाएं आकृति
इंडियन काउंसिल ऑफ एस्ट्रोलॉजिकल साइंस के सचिव आचार्य कौशल वत्स ने बताया कि बादलों के कारण चंद्रमा के दर्शन न होने पर व्रती चावल की वेदी पर चंद्रमा की आकृति बनाकर पूजा कर सकती हैं। उन्होंने ईशान कोण में पूर्व दिशा की ओर पूजन करने और निर्धारित समय के बाद संकल्प लेकर अर्घ्य देने की बात कही।
आचार्य के अनुसार, इस दौरान भगवान शिव और लक्ष्मी-नारायण का स्मरण करना चाहिए। अपने पितरों को याद कर उनका आशीर्वाद लेने की परंपरा भी निभाई जा सकती है।
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करवा चौथ पर तैयारियों में जुटी सुहागिनें
- फोटो : अमर उजाला
सास-ससुर और परिवार के बड़ों का करें सम्मान
आचार्य कौशल वत्स ने बताया कि परंपरा के अनुसार करवाचौथ पर सबसे पहले सास-ससुर को भोजन की थाली परोसने की परंपरा है। यदि वे मौजूद न हों तो परिवार के किसी बड़े को भोजन कराया जा सकता है। परिवार में कोई ऐसा न हो तो किसी जरूरतमंद या भूखे व्यक्ति को भोजन कराने का सुझाव भी उन्होंने दिया।
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करवा चौथ पर तैयारियों में जुटी सुहागिनें
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चंद्रदर्शन न होने पर व्रत पारण को लेकर क्या कहे आचार्य
आचार्य मनीष स्वामी के अनुसार, करवाचौथ का व्रत सामान्यतः चंद्रदेव के दर्शन के बाद खोला जाता है। यदि विपरीत परिस्थितियों में चंद्रमा के दर्शन संभव न हों तो संकल्प लेकर भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए विधि-विधान से व्रत का पारण किया जा सकता है।
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करवा चौथ पर तैयारियों में जुटी सुहागिनें
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उन्होंने परिवार के सास-ससुर, जेठानी और अन्य बड़े सदस्यों के सम्मान की परंपरा का पालन करने की बात भी कही। हालांकि, चंद्रदर्शन न होने पर पूजा और पारण की विधि को लेकर स्थानीय परंपराओं या अपने पुरोहित से मार्गदर्शन लेना उपयोगी हो सकता है।