महाभारत के इतिहास से उठेगा पर्दा: दूसरे दिन उत्खनन के दौरान टेराकोटा रिंगवेल और शंख की बनीं चूड़ियां मिलीं, इस काल के होने की संभावना
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मंगलवार शाम अचानक मौसम ने करवट बदली। तेज हवाओं के साथ आसमान में काले बादल छाए रहे। उत्खनन के दौरान मिले अवशेष भी मौसम में नमी रही और आसमान में बादल छाए रहे। ऐसे में उत्खनन कार्य प्रभावित हो सकता है।
तीसरी से छठी शताब्दी तक रहा गुप्त काल
नेचुरल साइंसेज ट्रस्ट के चेयरमैन प्रियंक भारती ने बताया कि गुप्त काल तीसरी से छठी शताब्दी तक रहा। यह युग टेराकोटा के प्रयोग के लिए स्वर्णिम युग रहा है। इसी काल में हिंदुओं में पूजे जाने वाली मूर्तियों का भी आविष्कार हुआ था। गंगा के क्षेत्र में जितने भी उत्खनन हुए हैं उनमें विष्णु, कार्तिकेय, सूर्य, गंगा, यमुना की मूर्तियां प्राप्त हुई हैं। इस काल से संबंधित बरेली क्षेत्र के आंवला तहसील के अहि क्षेत्र, बिहार के राजगीर, हस्तिनापुर में पूर्व में हुए उत्खनन में भी टेराकोटा फिगराइन, मूर्तियां प्राप्त की जा चुकी हैं। इस काल में रेडवेयर पोटरी का प्रचलन था। यह प्रचलन कुषाण काल तक रहा। चौथी शताब्दी के मध्य से छठी शताब्दी तक मेरठ के आसपास का क्षेत्र गुप्तकाल के शासकों के अधीन रहा।
मेरठ में मौजूद हैं गुप्तकाल के मंदिर
मेरठ व आसपास के क्षेत्रों में गुप्त काल के कई मंदिर आज भी मौजूद हैं। मेरठ में बुढ़ाना गेट के समीप सहगासा नामक स्थान पर मौजूद शीतला माता मंदिर में गुप्तकालीन मूर्ति है। जिनमें मगरमच्छ पर सवार गंगा व कछुए पर सवार यमुना की मूर्तियां हैं। संभावना जताई जा रही है कि उत्खनन के दौरान मिले अवशेष गुप्तकाल के हो सकते हैं।