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पिता के साथ कॉलेज में पढ़ते थे और एक ही रूम में रहते थे अटल, पढ़िए उनके कॉलेज टाइम का किस्सा

Fri, 17 Aug 2018 02:16 PM IST
यूपी डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
यूपी डेस्क, अमर उजाला, कानपुर Updated Fri, 17 Aug 2018 02:16 PM IST
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Atal bihari vajpai college time story
atal bihari - फोटो : अमर उजाला
क्या आपने कोई ऐसा कॉलेज देखा या सुना है कि जिसमें पिता और पुत्र एक ही साथ और एक ही कक्षा में पढ़ते हों? यदि नहीं, तो कानपुर के डीएवी कालेज के संबंध में आपकी जानकारी अधूरी ही मानी जाएगी। यह ऐसा कालेज है जिसने पिता और पुत्र को सहपठन का दृश्य न केवल देखा है अपितु उसके लिए रंगमंच का काम भी किया है।
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बात सन 1945-46 की है। मैं विक्टोरिया कॉलेज ग्वालियर से बीए करने के बाद भविष्य के बारे में चिंतित था। प्रश्न यह था कि आगे पढ़ूं या नहीं। इससे भी बड़ा प्रश्न था कि पढ़ूं तो कैसे पढ़ूं? पिता जी सरकारी सेवा से अवकाश प्राप्त कर चुके थे। दो बहिनें विवाह योग्य थीं। दहेज की समस्या एक अभिशाप बनकर मुंह बाए खड़ी थी। स्नातकोत्तर पढ़ाई के लिए साधन कहां से आते? एक बार लगा भविष्य के सारे द्वार बंद होने वाले हैं। किंतु उसी समय भगवान ने एक खिड़की खोल दी।
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75 रुपये आज के 200 रुपये के बराबर थे

Atal bihari vajpai college time story
atal bihari - फोटो : अमर उजाला
ग्वालियर रियासत के महाराजा श्रीमन्त जीवाजी राव सिंधिया ने, जो मुझे एक विद्यार्थी के नाते भली-भांति जानते थे, 75 रुपये प्रतिमास की छात्रवृत्ति देने का फैसला कर दिया। उन दिनों 75 रुपये आज के 200 रुपये के बराबर थे। मित्रगण मुझे बधाइयां देने लगे। पिता जी के माथे पर घिरी हुयी चिंता की बदलियां छट गई। परिवार ने राहत की सांस ली। मैं एक बार पुन: भविष्य के सुखद सपनों में खो गया।
ग्वालियर रियासत से छात्रवृत्ति पाने वाले अधिकांश छात्र डीएवी कालेज कानपुर में अध्ययन करते थे। मुझे भी कानपुर ही जाने के लिए कहा गया। मैने सहर्ष स्वीकार कर लिया। मेरे बड़े भाई श्री प्रेम बिहारी वाजपेयी वहां पहले से कानून का अध्ययन कर रहे थे। कानून की कक्षाएं शाम को होने के कारण पढ़ने वालों को यह सुविधा थी कि वे दिन में उदर-भरण के लिए नौकरी या धंधा और रात को विद्याध्यन करें।

50 से ऊपर की आयु, सिर के सभी बाल सफेद

Atal bihari vajpai college time story
atal bihari vajpayee
किंतु इसी समय एक अनहोनी घटना घटी। अचानक पिता जी ने फैसला कर लिया कि वे भी आगे पढ़ेंगे। उनके फैसले ने हम सब को आश्चर्य में डाल दिया। 30 वर्ष तक शिक्षा के क्षेत्र में अपना योगदान देने के बाद वे रिटायर हुए थे। जब उन्होंने देखा कि मैं एमए तथा कानून की पढ़ाई के लिए कानपुर जा रहा हूं तो सहसा उन्होंने फैसला कर लिया कि वे मेरे साथ कानपुर जाएंगे और कानून का अध्ययन करेंगे। यह घटना कितनी आकस्मिक और आश्चर्यजनक थी, इसका अनुभव मुझे उस समय हुआ जब पिता जी डीएवी कालेज के तत्कालीन प्रिंसिपल श्री कालका प्रसाद भटनागर केकार्यालय में उपस्थित हुए। 50 से ऊपर की आयु, सिर के सभी बाल सफेद, हाथ में डंडा। पिता जी पं. कृष्ण बिहारीलाल वाजपेयी जब प्रिंसिपल के कमरे में पहुंचे तो श्री भटनागर साहब समझे कि यह वयोवृद्ध सज्जन या तो प्रोफेसर के किसी पद के लिए आए हैं अथवा उन्हें कालेज में किसी अन्य को प्रवेश दिलाना है। किंतु जब भटनागर साहब को यह पता लगा कि ये सज्जन स्वयं प्रवेश लेने के लिए आए हैं तो वे कुर्सी पर से उछल पड़े और कहने लगे कि आपने तो कमाल ही कर दिया।
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झुंड के झुंड विद्यार्थी हमारी जोड़ी देखने के लिए आने लगे

Atal bihari vajpai college time story
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शीघ्र ही यह बात सारे कालेज में फैल गई। छात्रावास में जहां पिता और पुत्र एक ही कमरे में रहते थे, झुंड के झुंड विद्यार्थी हमारी जोड़ी देखने के लिए आने लगे। पहले हम कानून की पढ़ाई के लिए एक ही सेक्शन में थे, किंतु बाद में सेक्शन बदलना पड़ा। हुआ यह कि जब कभी मैं देर से पहुंचता तो प्रोफेसर ठहाकों के बीच पूछते-कहिए, आपके पिता जी कहां गायब हैं? और जब कभी मुझे देर हो जाती तो उनसे जवाब-तलब किया जाता कि आपके साहबजादे क्यों नदारत हैं? यह स्थिति हम दोनों को परेशान करने वाली थी। तय हुआ कि पिता जी एक सेक्शन में रहेंगे और मैं दूसरे सेक्शन में।
डीएवी कालेज का छात्रावास आज भी मेरी स्मृति के आकाश में एक नक्षत्र की तरह से चमकता रहता है। जीवन के दो वर्ष मैंने वहां बिताए। अनेक खट्टी-मीठी तथा चरपरी स्मृतियां हृदय के किसी कोने में सुरक्षित हैं। छात्रावास में भीड़ बहुत थी, किंतु परिवार जैसा वातावरण था। आज भी मुझे श्री पुरुषोत्तम प्रसाद मिश्र द्वारा संगठित रामायण मंडली का स्मरण है, जो प्रति सप्ताह रामायण का सस्वर पाठ करती थीं और जिसमें पिता जी के छात्रावास में पहुंचते ही शामिल कर लिया गया था। रामायण मंडली के प्राण श्री बेढ़ब थे, जो यदा-कदा अब भी मुझसे रेलगाड़ी में टकरा जाते हैं।

हर्ष और विषाद का एक विचित्र संयोग था उस दिन

Atal bihari vajpai college time story
atal bihari - फोटो : अमर उजाला
मुझे वह दिन भी याद है जब हमने छात्रावास में 15 अगस्त को स्वाधीनता दिवस मनाया था। रक्त से रंगी हुई स्वाधीनता! भारत की अखण्डता की बलि चढ़ा कर प्राप्त की गई स्वाधीनता!! हर्ष और विषाद का एक विचित्र संयोग था उस दिन। हर्ष था 1000 वर्ष की पराधीनता की परिसमाप्ति का और विषाद या मातृभूमि के विभाजन का। उस दिन समारोह में भाग लेने के लिए आगरा विश्व विद्यालय के पूर्व उप कुलपति लाला दीवानचंद पधारे थे। मेरी जोरदार वक्तृता पर उन्होंने अपनी जेब से एक छोटा से पुरस्कार दिया था।
राजनीति विभाग के अध्यक्ष डॉ. शांति नारायण वर्मा थे। नपे-तुले शब्दों में अपनी बात छात्रों के गले उतार देना उनका विशेष गुण था। हम सभी छात्र उनका बड़ा आदर करते थे किंतु उनसे थोड़ा दूर-दूर रहते थे। इसके विपरीत प्रो. प्रधान तथा प्रो. पांडे, जो अब डॉक्टर हो चुके हैं, छात्रों के प्रति बड़े स्नेहशील थे। अपनी कठिनाइयों को लेकर उनके पास जाते हुए किसी को संकोच नहीं होता था। कालेज के पुस्तकालय में बड़ी संख्या में अच्छी पुस्तकों का अभाव था, किंतु छात्रों की सहायता करने के लिए प्राध्यापक सदैव उत्सुक रहते थे। उन दिनों एमए में प्रथम श्रेणी प्राप्त करने की होड़ सी लगी थी। राजनीति विभाग में कुल 11 छात्र थे, जिनमें से तीन प्रथम श्रेणी प्राप्त करने में सफल हुए। यह प्राध्यापकों के मार्ग दर्शन तथा विद्यार्थियों के परिश्रम का ही परिणाम था।
मुझे खेद है कि कानून का अध्ययन समाप्त किए बिना ही मुझे कालेज छोड़ना पड़ा। स्वाधीनता की प्राप्ति और भारत-विभाजन ने एक नई परिस्थिति पैदा कर दी थी। अनेक नौजवान घर-द्वार छोड़कर राष्ट्र सेवा के पथ पर निकल पड़े थे। पढ़ाई छूट गई, सहपाठी बिछुड़ गए, नए सवाल सामने आए। फिर भी डीएवी कालेज में बिताए हुए दो वर्ष भुलाए नहीं भूलते।
स्वामी दयानंद सरस्वती के नाम पर संस्थापित यह कालेज केवल डिग्रियां प्रदान करने का साधन बन कर ही न रहे, अपितु प्रत्येक छात्र-छात्रा के हृदय पर उदात्त भारतीय संस्कृति की छाप छोड़ने में समर्थ हो, यही मेरी कामनाएं हैं।
देश आज तिराहे पर खड़ा है। प्रश्न ‘दक्षिण’ और वाम का नहीं, राष्ट्रता बनाम अधिनायकवाद का है। जो तत्व भारत को विदेशों की कार्बन कापी बनाना चाहते हैं, उनके अपवित्र मंसूबों को चकना चूर करना होगा और वेद काल से लेकर आज तक अपने जीवन प्रवाह को अखंड और अक्षुण्ण बनाए रखने वाले मत्युंजयी राष्ट्र को महान, सुदृढ, शक्तिशाली तथा वैभव सम्पन्न बनाकर विश्व में खड़ा करना होगा। यदि डीएवी कालेज के स्नातक ऐसे भारत की रचना में यतकिंचित भी सहयोग दे सके तो वे इस गुरुकुल के ऋण को उतारने में सफल होंगे।

(यह लेख अटल बिहारी वाजपेयी ने लिखा था। डीएवी कालेज की सन 2002-03 की पत्रिका में प्रकाशित हुआ था। तब जैसा उस पत्रिका में छपा था, वैसा ही पेश है।)
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