बरेली की सांस्कृतिक विरासत काफी समृद्ध रही है। महाभारतकालीन इतिहास को समेटे पांचाल नगरी के सप्त नाथ मंदिर शहर के शक्ति केंद्र के रूप में विख्यात हैं। ये अपने आप में पौराणिक और सांस्कृतिक थाती को सहेजे हुए हैं। लोक आस्था का केंद्र होने के साथ ही ये शिवालय शहर को नाथ नगरी की पहचान भी दे रहे हैं। कहा जाता है कि आक्रांताओं से शहर को सुरक्षित रखने के लिए इन नाथ मंदिरों की स्थापना हुई थी। मान्यता है कि यहां पहुंचने वाले भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है। सातों नाथ मंदिरों की स्थापना के पीछे भी कई रोचक पहलू हैं। आइए, सावन के मौके पर हम इन सातों नाथ के महात्म्य को जानें।
{"_id":"669e24d6b7e71efeb10b1d85","slug":"sawan-2024-seven-nath-temples-in-bareilly-know-the-history-2024-07-22","type":"photo-gallery","status":"publish","title_hn":"Sawan 2024: संस्कृति के वाहक हैं आस्था के ये सात केंद्र, जानिए बरेली के नाथ मंदिरों का इतिहास","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Sawan 2024: संस्कृति के वाहक हैं आस्था के ये सात केंद्र, जानिए बरेली के नाथ मंदिरों का इतिहास
Mon, 22 Jul 2024 02:53 PM IST
मुकेश कुमार
संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली
संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली
Published by: मुकेश कुमार
Updated Mon, 22 Jul 2024 02:53 PM IST
विज्ञापन
Sawan 2024
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बाबा अलखनाथ मंदिर
- फोटो : अमर उजाला
अलखनाथ मंदिर: नागा साधुओं ने संभाली थी जिम्मेदारी
किला स्थित प्राचीन बाबा अलखनाथ मंदिर का पुराना इतिहास है। महंत कालू गिरि महाराज के अनुसार इस स्थान पर अलखिया बाबा ने 926 साल पहले तपस्या की थी। उनकी समाधि के बाद यहां की सेवा की जिम्मेदारी नागा साधुओं ने संभाल ली थी। उन्होंने ही इस स्थान को अलखनाथ बाबा के नाम से पहचान दिलाई। आज भी उन्हीं के समुदाय के हम सब लोग मंदिर में सेवा दे रहे हैं। महाराज ने बताया कि यहां जो भी श्रद्धालु 40 दिन लगातार जल चढ़ाए तो उसकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है। महंत कालू गिरि आनंद अखाड़े के अध्यक्ष भी हैं।
किला स्थित प्राचीन बाबा अलखनाथ मंदिर का पुराना इतिहास है। महंत कालू गिरि महाराज के अनुसार इस स्थान पर अलखिया बाबा ने 926 साल पहले तपस्या की थी। उनकी समाधि के बाद यहां की सेवा की जिम्मेदारी नागा साधुओं ने संभाल ली थी। उन्होंने ही इस स्थान को अलखनाथ बाबा के नाम से पहचान दिलाई। आज भी उन्हीं के समुदाय के हम सब लोग मंदिर में सेवा दे रहे हैं। महाराज ने बताया कि यहां जो भी श्रद्धालु 40 दिन लगातार जल चढ़ाए तो उसकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है। महंत कालू गिरि आनंद अखाड़े के अध्यक्ष भी हैं।
बाबा त्रिवटीनाथ मंदिर
- फोटो : अमर उजाला
त्रिवटीनाथ मंदिर: तीन वट वृक्षों के बीच प्रकटे
प्रेमनगर स्थित बाबा त्रिवटीनाथ मंदिर का 600 साल पुराना इतिहास है। यहां स्वयंभू शिवलिंग है, जो तीन वट वृक्षों के बीच स्थित है। इसीलिए इस मंदिर को त्रिवटीनाथ के नाम से जाना जाता है। मंदिर के मीडिया प्रभारी संजीव औतार अग्रवाल ने बताया कि इस स्थान पर पहले घना जंगल था। अब यह मंदिर उत्तर प्रदेश के सभी सनातन प्रेमियों और भक्तों की आस्था का केंद्र है। भक्तों का प्रबल विश्वास है कि यहां सभी के मनोरथ पूर्ण होते हैं। लोग शिवलिंग के सामने स्थित नंदी के कान में अपने मन की बात कहकर भोलेनाथ तक पहुंचाते हैं।
प्रेमनगर स्थित बाबा त्रिवटीनाथ मंदिर का 600 साल पुराना इतिहास है। यहां स्वयंभू शिवलिंग है, जो तीन वट वृक्षों के बीच स्थित है। इसीलिए इस मंदिर को त्रिवटीनाथ के नाम से जाना जाता है। मंदिर के मीडिया प्रभारी संजीव औतार अग्रवाल ने बताया कि इस स्थान पर पहले घना जंगल था। अब यह मंदिर उत्तर प्रदेश के सभी सनातन प्रेमियों और भक्तों की आस्था का केंद्र है। भक्तों का प्रबल विश्वास है कि यहां सभी के मनोरथ पूर्ण होते हैं। लोग शिवलिंग के सामने स्थित नंदी के कान में अपने मन की बात कहकर भोलेनाथ तक पहुंचाते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
बाबा वनखंडी नाथ मंदिर
- फोटो : अमर उजाला
वनखंडीनाथ मंदिर: हाथी भी न हिला सके शिवलिंग
जोगी नवादा स्थित बाबा वनखंडीनाथ मंदिर महाभारत कालीन है। मान्यता है कि द्रौपदी ने इस शिवलिंग की स्थापना की थी। मुगलों ने कई बार इस जगह पर हमला किया। औरंगजेब के सिपाहियों ने शिवलिंग को जंजीरों से बांधकर सैकड़ों हाथियों से खिंचवाने की कोशिश की पर यह टस से मस न हुआ। ऐसा मनाना है कि यह इलाका पहले वन क्षेत्र में था। इसी कारण यह मंदिर वनखंडीनाथ के नाम से विख्यात हुआ। मंदिर कमेटी के संरक्षक हरि ओम राठौर ने बताया कि यहां शिवगंगा सरोवर में स्नान करने से सूखा रोग से ग्रस्त रोगी ठीक हो जाते हैं।
जोगी नवादा स्थित बाबा वनखंडीनाथ मंदिर महाभारत कालीन है। मान्यता है कि द्रौपदी ने इस शिवलिंग की स्थापना की थी। मुगलों ने कई बार इस जगह पर हमला किया। औरंगजेब के सिपाहियों ने शिवलिंग को जंजीरों से बांधकर सैकड़ों हाथियों से खिंचवाने की कोशिश की पर यह टस से मस न हुआ। ऐसा मनाना है कि यह इलाका पहले वन क्षेत्र में था। इसी कारण यह मंदिर वनखंडीनाथ के नाम से विख्यात हुआ। मंदिर कमेटी के संरक्षक हरि ओम राठौर ने बताया कि यहां शिवगंगा सरोवर में स्नान करने से सूखा रोग से ग्रस्त रोगी ठीक हो जाते हैं।
विज्ञापन
बाबा धोपेश्वरनाथ मंदिर
- फोटो : अमर उजाला
धोपेश्वरनाथ मंदिर: धूम्र ऋषि की तपस्थली है
कैंट स्थित बाबा धोपेश्वरनाथ मंदिर द्वापरकालीन है। यहां पर बाबा धूम्र ऋषि का आश्रम हुआ करता था। इसके इतिहास में दो बार भगवान शिव के श्रद्धालुओं को दर्शन देने का वर्णन मिलता है। बताते हैं कि यहां पर धूम्र ऋषि के शिष्य ने उनकी समाधि पर शिवलिंग की स्थापना की थी। इसीलिए यह स्थान धूम्रेश्वरनाथ के नाम से जाना गया और बाद में लोग धोपेश्वरनाथ कहने लगे। मंदिर कमेटी के सदस्य सतीश मेहता ने बताया कि मंदिर परिसर में स्थित सरोवर में स्नान करने से लोगों के चर्म रोग नष्ट हो जाते हैं।
कैंट स्थित बाबा धोपेश्वरनाथ मंदिर द्वापरकालीन है। यहां पर बाबा धूम्र ऋषि का आश्रम हुआ करता था। इसके इतिहास में दो बार भगवान शिव के श्रद्धालुओं को दर्शन देने का वर्णन मिलता है। बताते हैं कि यहां पर धूम्र ऋषि के शिष्य ने उनकी समाधि पर शिवलिंग की स्थापना की थी। इसीलिए यह स्थान धूम्रेश्वरनाथ के नाम से जाना गया और बाद में लोग धोपेश्वरनाथ कहने लगे। मंदिर कमेटी के सदस्य सतीश मेहता ने बताया कि मंदिर परिसर में स्थित सरोवर में स्नान करने से लोगों के चर्म रोग नष्ट हो जाते हैं।