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जंजीरों से मिली आजादी: कलंदर के इशारों पर नहीं अब अपनी मर्जी से नाचते हैं भालू

Sun, 22 Dec 2019 02:47 PM IST
Abhishek Saxena न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा Published by: Abhishek Saxena Updated Sun, 22 Dec 2019 02:47 PM IST
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Bears Rescued In Keetham Ten Years Update News Agra
भालू
कीठम स्थित रेस्क्यू सेंटर में आप जाएंगे तो आपको दो-चार भालू दो पैरों पर नाचते हुए मिल जाएंगे। यह नाच उनकी आजादी के जश्न का है। नाचते वे पहले भी थे, लेकिन तब मर्जी नहीं, मजबूरी थी। कलंदरों की रस्सियों में जकड़े हुए थे, जिंदगी तमाशा बनी हुई थी। ऐसे 628 भालुओं को पिछले 10 साल में कलंदरों से छुड़ाया जा चुका है। संस्था वाइल्ड लाइफ एसओएस ने यह अभियान 18 दिसंबर 2009 को शुरू किया था।
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कीठम लाए गए पांच भालू - फोटो : अमर उजाला
वन विभाग के सहयोग से वाइल्ड लाइफ एसओएस और उनके इंटरनेशनल एनिमल रेस्क्यू (आईएआर), यूके ने इस मौके पर खुशी जाहिर की है। संस्था का मानना है कि इन संरक्षण प्रयासों के परिणामस्वरूप आज जंगल में स्लॉथ बीयर सुरक्षित हैं। भालुओं को नचाकर तमाशा दिखाने की परंपरा मुगलों के जमाने से चली आ रही थी। महज कुछ दिन के भालू के बच्चों को जंगल से निकाल कर, बोरियों में भर के कलंदरों को बेच दिया जाता था।
 
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कीठम के भालू संरक्षण गृह में तरबूज का आनंद लेते भालू (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
लोहे की छड़ से उनके दांतों को तोड़ने के बाद, लाल गर्म लोहे की नुकीली धार वाली सरिया से उनकी नाजुक थूथन में छेद कर के एक मोटी रस्सी को मांस को पार किया जाता था। उनके घाव को कच्चा रखा जाता था, ताकि भालू को हर पल, हर वक्त दर्द का एहसास हो। यह दर्द और डर ही था, जो भालू को कूदने के लिए मजबूर करता था। ऐसे एक जंगली भालू को नाचने वाला भालू बनने के लिए प्रशिक्षित किया जाता था और सड़कों पर प्रदर्शन के लिए उपयोग किया जाता था।

 
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तीन महीने के शिशु को कीठम स्थित भालू संरक्षण गृह लाया गया - फोटो : अमर उजाला
डांसिंग बीयर्स के अभ्यास या उनके शरीर के अंगों के लिए स्लॉथ भालू के शिकार का खतरा अभी भी जारी है। नेपाल में अभी भी डांसिंग बीयर की मौजूदगी है और इन्हें कभी-कभी सीमाओं का उपयोग कर के भारत में प्रवेश करते हुए भी पाया जाता है। हाल ही में वाइल्ड लाइफ एसओएस की एंटी-पोचिंग यूनिट को खुफिया जानकारी मिली थी जिसमें वन्यजीव ट्रैफिकर्स के कब्जे में पांच स्लॉथ भालू के साथ एक समूह भारत-नेपाल बॉर्डर के पास एक फॉरेस्ट एरिया में छिपे थे। उन्हें तस्करों से छुड़ाया गया।
 
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मोनाली नाम का भालू पानी के कुंड में मस्ती करता दिखा - फोटो : अमर उजाला
फतेहपुर सीकरी के पास कोरई में कलंदर समुदाय के लोगों के पास 100 से अधिक भालू थे। ये ही इनकी रोजी रोटी का जरिया था। इन्हें सड़क किनारे नचाते थे और सैलानियों को तमाशा दिखाते थे। अब ये कलंदर बंदरों का तमाशा दिखाते हैं।
 
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