DPDP: क्या जनहित पर भारी पड़ेगा निजता का अधिकार? RTI में बदलाव को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को भेजा नोटिस
DPDP Vs RTI Act:
सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम के उन प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है, जो सूचना के अधिकार (RTI) अधिनियम को कमजोर करते हैं। अदालत अब इस मामले में पारदर्शिता और गोपनीयता के बीच संतुलन की बारीकी से जांच करेगी।

सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में एक बेहद महत्वपूर्ण संवैधानिक मुद्दे पर सुनवाई हुई। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची की पीठ ने 'डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023' (DPDP Act) के कुछ विवादित प्रावधानों को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) पर संज्ञान लिया। वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान की दलीलों को सुनने के बाद, बेंच ने केंद्रीय कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय (DoPT) और कानून एवं न्याय मंत्रालय से जवाब मांगा है। इसके अलावा, अदालत ने इस कानूनी प्रक्रिया में राजस्थान सरकार को भी एक पक्ष के रूप में शामिल करने का निर्देश दिया है।

क्या है विवाद की असली जड़?
भारत में पिछले दो दशकों से 'सूचना का अधिकार' भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मजबूत हथियार रहा है। लेकिन अब इस हथियार की धार को लेकर बहस छिड़ गई है। विवाद का केंद्र 'डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम' (DPDP Act) की धारा 44(3) है। याचिकाकर्ताओं का मानना है कि यह धारा RTI कानून के उस बुनियादी ढांचे को बदल रही है, जो जनता को सरकारी कामकाज की जानकारी देने की गारंटी देता था। दरअसल, यह पूरा मामला गोपनीयता और पारदर्शिता के बीच के नाजुक संतुलन के बिगड़ने का है।
यह कानूनी लड़ाई 'मजदूर किसान शक्ति संगठन' समेत प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा रॉय, निखिल डे और शंकर सिंह रावत द्वारा शुरू की गई है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि यह धारा 2005 के सूचना के अधिकार (RTI) कानून की धारा 8(1)(j) में बदलाव करती है, जिससे सरकारी कामकाज में पारदर्शिता कम हो जाएगी। याचिका में कहा गया है कि यह बदलाव असंवैधानिक है और भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता), 19(1)(a) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और 21 (जीवन का अधिकार) का सीधा उल्लंघन करता है।

पारदर्शिता पोर्टल्स और जनहित पर मंडराता खतरा
नए बदलाव से पहले, RTI अधिनियम की धारा 8(1)(j) के तहत व्यक्तिगत जानकारी देने से छूट तभी मिलती थी जब वह जानकारी किसी सार्वजनिक गतिविधि या व्यापक जनहित से संबंधित न हो। इसमें एक 'बैलेंसिंग मैकेनिज्म' यानी संतुलन का तरीका था। नियम यह था कि यदि जानकारी देने से किसी की निजता का अनावश्यक उल्लंघन होता है, तो उसे छिपाया जा सकता था, लेकिन अगर बड़े जनहित की बात आती थी, तो वह जानकारी सार्वजनिक करनी ही पड़ती थी। इसी नियम के कारण सरकारी अधिकारियों के खर्चों, उनके द्वारा लिए गए फैसलों और अन्य महत्वपूर्ण विवरणों को उजागर किया जा सका था। डीपीडीपी एक्स की इस एक धारा से पारदर्शिता पोर्टल्स और जनहित के लिए काम करने वाले संगठनों पर खतरा मंडराने लगा है।
पुराने RTI प्रावधान बहाल करने की मांग
याचिकाकर्ताओं ने अदालत से यह भी अनुरोध किया है कि RTI कानून की मूल धारा 8(1)(j) और उससे जुड़े प्रावधानों को 13 नवंबर 2025 से प्रभावी तरीके से फिर से लागू किया जाए।
साथ ही, RTI की धारा 4 के तहत आने वाली ‘प्रोएक्टिव डिस्क्लोजर’ व्यवस्था को जारी रखने की मांग की गई है। इस व्यवस्था के तहत लाभार्थियों का डेटा, मस्टर रोल, सोशल ऑडिट रिकॉर्ड जैसी महत्वपूर्ण जानकारी सार्वजनिक की जाती है, जो नागरिकों के अधिकारों से जुड़ी होती है।
- AI Clone: नौकरी छोड़ दी, फिर भी काम करता रहा कर्मचारी; डिजिटल अवतार संभाल रहा ऑफिस की जिम्मेदारियां
- FBI की बड़ी कार्रवाई: करोड़ों की ठगी कराने वाला ग्लोबल फिशिंग गैंग ध्वस्त, हजारों अकाउंट हुए थे हैक
- Green Cooking: मात्र 100ml पानी और एक यूनिट बिजली में 6 घंटे तक बनेगा खाना, जानिए क्या है यह जादुई तकनीक
- Tips: UPI से गलत खाते में चले गए पैसे? घबराएं नहीं, अपनी मेहनत की कमाई वापस पाने के लिए तुरंत अपनाएं ये तरीके